ऑपरेशन ‘नव जीवन’: झारखंड में नक्सल नेटवर्क को झटका, 25 माओवादी और 2 JJMP कैडर ने छोड़ा साथ
झारखंड में नक्सल विरोधी अभियान को गुरुवार को एक बड़ी सफलता मिली, जब रांची पुलिस मुख्यालय में डीजीपी तदाशा मिश्रा के सामने 27 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए. इनमें 25 भाकपा (माओवादी) के सदस्य और 2 JJMP कैडर शामिल हैं.

Ranchi: झारखंड में नक्सल विरोधी अभियान को गुरुवार को एक बड़ी सफलता मिली, जब रांची पुलिस मुख्यालय में डीजीपी तदाशा मिश्रा के सामने 27 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए. इनमें 25 भाकपा (माओवादी) के सदस्य और 2 JJMP कैडर शामिल हैं. 16 हथियारों के साथ हुए इस सामूहिक आत्मसमर्पण को केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे नक्सल नेटवर्क में सेंध के तौर पर देखा जा रहा है. खास बात यह है कि आत्मसमर्पण करने वालों में कई इनामी और बड़े कमांडरों के करीबी चेहरे भी बताए जा रहे हैं. पुलिस इसे “ऑपरेशन नव जीवन” कह रही है, जिसका उद्देश्य केवल हथियार छीनना नहीं, बल्कि नक्सलियों को मुख्यधारा में वापस लाना है. सवाल अब यह है कि क्या झारखंड वास्तव में नक्सलवाद के अंतिम दौर में पहुंच चुका है, या यह सिर्फ रणनीतिक पीछे हटना है? हाल के महीनों में सारंडा और पश्चिमी सिंहभूम में लगातार दबाव ने नक्सली संगठनों को कमजोर किया है.
सरेंडर करने वालों में कौन-कौन शामिल?
डीजीपी के सामने आत्मसमर्पण करने वालों में 25 भाकपा (माओवादी) और 2 JJMP सदस्य शामिल थे. इनके पास से कुल 16 हथियार जमा कराए गए. पुलिस के मुताबिक इनमें कई ऐसे चेहरे हैं, जो वर्षों से सक्रिय दस्तों में काम कर रहे थे. कार्यक्रम के दौरान सरेंडर करने वाले नक्सलियों को राज्य की पुनर्वास नीति के तहत आर्थिक सहायता और पुनर्वास पैकेज दिए गए. इस सामूहिक सरेंडर की तस्वीरों में एक महिला नक्सली अपने बच्चे के साथ नजर आई, जिसने इस घटना को केवल सुरक्षा अभियान नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव के रूप में भी सामने रखा.
क्या मिसिर बेसरा का नेटवर्क टूट रहा है?
झारखंड के सबसे बड़े नक्सली चेहरों में शामिल एक करोड़ के इनामी माओवादी नेता मिसिर बेसरा लंबे समय से सारंडा के जंगलों में सक्रिय रहा है. लेकिन पिछले कुछ महीनों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई ने उसके नेटवर्क को कमजोर किया है. रिपोर्टों के अनुसार, 2025 की शुरुआत में सारंडा क्षेत्र में करीब 150 सक्रिय माओवादी थे, जो घटकर लगभग 50 रह गए. पुलिस का दावा है कि अब यह संख्या और तेजी से कम हो रही है. लगातार मुठभेड़, गिरफ्तारी और सरेंडर से शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बढ़ा है. कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि मिसिर बेसरा समेत कई बड़े माओवादी नेताओं के आत्मसमर्पण की कोशिशें जारी हैं. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
बड़े कमांडरों का टूटता घेरा
जानकारी के मुताबिक कई इनामी नक्सली पहले ही सरेंडर कर चुके हैं या पुलिस के संपर्क में हैं. इनमें जोनल कमांडर, सब-जोनल कमांडर और एरिया कमांडर स्तर के सदस्य शामिल बताए जाते हैं. नक्सल संगठन में मिड-लेवल कमांडरों की भूमिका सबसे अहम होती है क्योंकि यही लोग भर्ती, हथियार सप्लाई और स्थानीय नेटवर्क संभालते हैं. ऐसे चेहरों के बाहर आने का मतलब है कि संगठन की जमीनी पकड़ कमजोर हो रही है. विशेषज्ञ मानते हैं कि जब शीर्ष नेता जंगल में रह जाएं और मिड-लेवल कैडर बाहर निकलने लगें, तब संगठन लंबे समय तक टिक नहीं पाता.
सिर्फ गोली नहीं, पुनर्वास नीति भी बनी हथियार
झारखंड सरकार और केंद्रीय एजेंसियां पिछले कुछ वर्षों से “सरेन्डर एंड रिहैबिलिटेशन” मॉडल पर जोर दे रही हैं. सरेंडर करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, आवास, रोजगार प्रशिक्षण और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाती है. देशभर में पिछले एक दशक में 10,000 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. सरकार का दावा है कि पुनर्वास नीति ने हथियार छोड़ने के फैसले को तेज किया है. झारखंड में भी लगातार अपील की जा रही है कि युवा नक्सली पुलिस कैंप में आकर मुख्यधारा से जुड़ें.
क्या नक्सलवाद सच में खत्म होने वाला है?
केंद्र सरकार पहले दावा कर चुकी है कि देश से वामपंथी उग्रवाद को लगभग खत्म करने का लक्ष्य तय किया गया है. कई राज्यों में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटी है. लेकिन जमीनी स्थिति पूरी तरह खत्म होने की तस्वीर नहीं दिखाती. पश्चिमी सिंहभूम और सारंडा जैसे इलाके अब भी चुनौती बने हुए हैं. हाल के महीनों में मुठभेड़ और IED हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं. इसका मतलब है कि संगठन कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं.
‘ऑपरेशन नव जीवन’ जीत है या रणनीतिक विराम?
27 नक्सलियों का सरेंडर निश्चित रूप से बड़ी सफलता है. लेकिन इससे भी बड़ा संकेत यह है कि नक्सली संगठन के भीतर भरोसा टूट रहा है. लगातार ऑपरेशन, जंगलों में घेराबंदी, आर्थिक नेटवर्क पर चोट और पुनर्वास नीति—इन सबने मिलकर दबाव बनाया है. फिर भी इतिहास बताता है कि नक्सली आंदोलन केवल हथियारों से नहीं, बल्कि स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी और सामाजिक दूरी से भी जुड़ा रहा है. यदि विकास, रोजगार और प्रशासनिक पहुंच नहीं बढ़ी, तो खाली हुई जगहों पर नए नेटवर्क बन सकते हैं.
इसलिए ऑपरेशन ‘नव जीवन’ को केवल सरेंडर की घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा और सामाजिक नीति की संयुक्त परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए. आने वाले महीनों में अगर बड़े चेहरे—जैसे मिसिर बेसरा गुट के बचे सदस्य—भी हथियार डालते हैं, तब झारखंड वास्तव में नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ता दिख सकता है.

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