सर जेसी बोस की तिजोरी कब खुलेगी? बदहाली का शिकार महान वैज्ञानिक का ऐतिहासिक धरोहर भवन
गिरिडीह के बरगंडा में आचार्य जगदीश चंद्र बोस का ऐतिहासिक भवन बंद पड़ा है. यहां रखी उनकी लोहे की तिजोरी आज तक नहीं खुली. जानिए इस ऐतिहासिक धरोहर और विज्ञान केंद्र बनाने की मांग की पूरी कहानी.

(report : suman kumari )
Giridih :- भारत के महान वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चंद्र बोस की विरासत को लेकर झारखंड के गिरिडीह में एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है. बरगंडा स्थित वह ऐतिहासिक भवन, जहां आचार्य बोस ने 23 नवंबर 1937 को अंतिम सांस ली थी, आज बंद पड़ा है. जिस भवन को विज्ञान और वैज्ञानिक चेतना के केंद्र के रूप में विकसित करने की उम्मीद थी, वहां अब उपेक्षा का सन्नाटा है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस भवन में आचार्य बोस की एक लोहे की तिजोरी भी रखी हुई है, जो वर्षों से बंद है. इस तिजोरी में क्या है, यह जानने की उत्सुकता आज भी बनी हुई है. कभी इसे खोलने की योजना पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के गिरिडीह दौरे के दौरान बनी थी, लेकिन उनके निधन के बाद यह योजना अधूरी रह गई. अब सवाल है कि सर जेसी बोस की इस धरोहर को आखिर कब खोला जाएगा और कब इसे वह सम्मान मिलेगा, जिसकी यह हकदार है?
जीर्णोद्धार के बाद भी बंद पड़ा है ऐतिहासिक भवन
आचार्य जगदीश चंद्र बोस का गिरिडीह से गहरा संबंध रहा है. बरगंडा स्थित यह भवन उनकी स्मृतियों से जुड़ा हुआ है और झारखंड के लिए ऐतिहासिक महत्व रखता है. जब गिरिडीह के दिवंगत विधायक सुदिव्य कुमार सोनू मंत्री बने, तब स्थानीय लोगों ने जेसी बोस मेमोरियल सोसाइटी के माध्यम से इस विरासत को बचाने की पहल तेज की. सोसाइटी के अध्यक्ष प्रभाकर कुमार के मुताबिक, इस पहल के बाद दिवंगत मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने भवन के जीर्णोद्धार और इसे बेहतर स्मारक के रूप में विकसित करने के लिए प्रयास किए. उनके प्रयासों से भवन का जीर्णोद्धार भी कराया गया. हालांकि, जीर्णोद्धार के बाद भी इसे नियमित रूप से आम लोगों के लिए खोलने और एक व्यवस्थित स्मारक के रूप में संचालित करने की व्यवस्था नहीं बन सकी. आज भवन बंद पड़ा है और यहां मौजूद ऐतिहासिक विरासत लोगों की पहुंच से दूर है.
लोहे की तिजोरी में क्या है, आज तक नहीं उठा पर्दा
इस ऐतिहासिक भवन का सबसे रहस्यमयी हिस्सा यहां रखी आचार्य जगदीश चंद्र बोस की लोहे की तिजोरी है. जेसी बोस मेमोरियल सोसाइटी के सचिव रितेश सराक के अनुसार, यह तिजोरी आज भी स्मारक भवन में मौजूद है, लेकिन इसे अब तक खोला नहीं गया है. तिजोरी के भीतर क्या है, इसे लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई है. क्या इसमें आचार्य बोस के शोध से जुड़े दस्तावेज हैं, कोई महत्वपूर्ण शोध पत्र या उनकी वैज्ञानिक गतिविधियों से जुड़ी दूसरी सामग्री? फिलहाल इसकी पुष्टि नहीं है. तिजोरी खोले जाने की कोई ठोस प्रशासनिक पहल नहीं होने से यह रहस्य बरकरार है.
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के दौरे पर भी बनी थी योजना
तिजोरी खोलने की चर्चा पहले भी हो चुकी है. सोसाइटी के सचिव रितेश सराक के मुताबिक, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के गिरिडीह प्रवास के दौरान इस तिजोरी को खोलने की योजना बनाई गई थी. लेकिन उनके निधन के कारण प्रस्तावित कार्यक्रम रद्द हो गया. इसके बाद से तिजोरी खोलने को लेकर कोई ठोस पहल नहीं हो सकी.यह मामला अब केवल एक बंद तिजोरी का रहस्य नहीं रह गया है. इससे जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री की पहचान, संरक्षण और उचित तरीके से सार्वजनिक प्रदर्शन की जरूरत भी सामने आ रही है.
स्मारक नहीं, गिरिडीह को चाहिए जीवंत विज्ञान केंद्र
जेसी बोस मेमोरियल सोसाइटी के उपाध्यक्ष आलोक रंजन का कहना है कि गिरिडीह को आचार्य जगदीश चंद्र बोस के नाम पर सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि एक जीवंत विज्ञान केंद्र चाहिए. ऐसा केंद्र, जहां नई पीढ़ी उनके शोध, आविष्कारों और वैज्ञानिक योगदान को समझ सके. इसके लिए जिला प्रशासन, राज्य सरकार, शिक्षा विभाग और स्थानीय नागरिक समाज को मिलकर पहल करनी होगी. भवन को नियमित रूप से खोलने, वहां मौजूद धरोहरों को सुरक्षित रखने और वैज्ञानिक विरासत को प्रदर्शित करने की व्यवस्था जरूरी है.
वैज्ञानिक विरासत पर कब जागेगा प्रशासन?
आचार्य जगदीश चंद्र बोस ने विज्ञान की दुनिया में भारत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई. पौधों की संवेदनशीलता पर उनके प्रयोग और वायरलेस संचार के क्षेत्र में उनके शुरुआती शोध आज भी वैज्ञानिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ऐसे महान वैज्ञानिक से जुड़ा भवन अगर बंद पड़ा रहे और उनकी स्मृतियों को देखने के लिए लोगों को इंतजार करना पड़े, तो यह गिरिडीह की ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण पर सवाल खड़ा करता है. अब जरूरत सिर्फ भवन की मरम्मत की नहीं, बल्कि उसे जीवंत बनाने की है. तिजोरी को विशेषज्ञों की निगरानी में खोलने की पहल हो, भीतर मौजूद सामग्री का वैज्ञानिक तरीके से दस्तावेजीकरण किया जाए और पूरे परिसर को विज्ञान केंद्र के रूप में विकसित किया जाए.


