Ranchi Sadar Hospital: साढ़े 7 करोड़ का पेमेंट, 4 महीने से आदेश बेअसर! आखिर सिविल सर्जन किस बात का राज नहीं खोल रहे?
रांची सदर अस्पताल में आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान के लिए हर महीने करीब ₹7.5 करोड़ खर्च होते हैं, लेकिन सरकारी आदेश के बावजूद चार महीने से उप आवंटन नहीं हुआ. अब सवाल है कि देरी क्यों हुई और भुगतान व्यवस्था में सामने आई गड़बड़ी क्या है?

Ranchi:- सरकारी आदेश है, करोड़ों का भुगतान है, दो कंपनियां हैं और एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब चार महीने बाद भी नहीं मिला. झारखंड के स्वास्थ्य विभाग में सबकुछ ठीक चल रहा है या फिर करोड़ों के भुगतान की व्यवस्था में कोई ऐसा पेच है, जिसका जवाब सामने आने से बच रहा है? रांची सदर अस्पताल में हर महीने करीब साढ़े सात करोड़ रुपये आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान के लिए खर्च हो रहे हैं. लेकिन जिस व्यवस्था के तहत सिविल सर्जन को उपाधीक्षक को उप आवंटन देना था, वह चार महीने बाद भी लागू नहीं हुई. स्वास्थ्य विभाग की अपर मुख्य सचिव का आदेश 27 मई 2026 को जारी हुआ था, मगर उपाधीक्षक विमलेश सिंह अब तक उप आवंटन का इंतजार कर रहे हैं. दूसरी तरफ, सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद का कहना है कि कुछ गड़बड़ी सामने आई थी और विभाग से मार्गदर्शन मांगा गया है. तो सवाल है कि जब आदेश स्पष्ट है, तो फिर अड़चन कहां है? आखिर भुगतान की कमान उपाधीक्षक को सौंपने में ऐसी कौन-सी परेशानी है, जिसका समाधान चार महीने बाद भी नहीं निकला?
सरकार का आदेश, चार महीने की देरी और सदर अस्पताल में आखिर चल किसकी रही है?
झारखंड में सरकारी आदेश जारी होने के बाद उसके पालन की उम्मीद की जाती है, लेकिन रांची सदर अस्पताल में आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान का मामला एक अलग ही तस्वीर पेश कर रहा है. वित्तीय वर्ष 2026-27 में अस्पतालों में आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान के लिए सरकार ने 325 करोड़ रुपये स्वीकृत किये हैं. इसी व्यवस्था के तहत 27 मई 2026 को स्वास्थ्य विभाग की अपर मुख्य सचिव की ओर से आदेश जारी किया गया कि सिविल सर्जन हर महीने आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान के लिए उपाधीक्षक को उप आवंटन करेंगे. यानी भुगतान की प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय करने का निर्देश विभाग की ओर से दिया जा चुका था. लेकिन आदेश जारी होने के बाद चार महीने गुजर गये और उपाधीक्षक विमलेश सिंह को उप आवंटन नहीं मिला. अब सवाल यह है कि जब आदेश में व्यवस्था स्पष्ट कर दी गई थी, तो फिर उसे लागू करने में इतनी देर क्यों हुई?
दो कंपनियां, करीब 3,600 कर्मी और हर महीने साढ़े सात करोड़ रुपये!
अब जरा उस रकम पर गौर कीजिए, जिसके भुगतान को लेकर यह पूरा मामला चर्चा में है. रांची सदर अस्पताल में आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान के लिए दो कंपनियों को राशि दी जाती है. इनमें समानता सिक्यूरिटी प्राइवेट लिमिटेड और जी अलर्ट शामिल हैं. उपलब्ध भुगतान संबंधी आंकड़ों के मुताबिक, समानता सिक्यूरिटी प्राइवेट लिमिटेड को करीब 2,000 आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान के लिए हर महीने लगभग चार करोड़ रुपये दिये जाते हैं. वहीं, जी अलर्ट को करीब 1,600 कर्मियों के भुगतान के लिए लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपये मिलते हैं. इस तरह दोनों कंपनियों को मिलाकर हर महीने करीब साढ़े सात करोड़ रुपये का भुगतान होता है. यानी हजारों कर्मियों के भुगतान के लिए हर महीने करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन उसी भुगतान व्यवस्था में उप आवंटन को लेकर सरकारी आदेश का पालन नहीं होने का सवाल खड़ा है. आखिर भुगतान की प्रक्रिया में ऐसा क्या हुआ कि उपाधीक्षक को चार महीने बाद भी उप आवंटन नहीं मिला? क्या यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी का मामला है या इसके पीछे कोई ऐसी वजह है, जिसे विभाग को स्पष्ट करना चाहिए?
सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद का जवाब
इस पूरे मामले में जब सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद से सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि यह मुद्दा पूर्व सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार के समय से ही चल रहा है. उनके मुताबिक, कुछ समस्या आई थी, इसलिए विभाग से मार्गदर्शन मांगा गया है. पहली नजर में यह जवाब प्रशासनिक समस्या की ओर इशारा करता है, लेकिन इसके साथ ही कई दूसरे सवाल भी खड़े हो जाते हैं. अगर मामला पूर्व सिविल सर्जन के कार्यकाल से चल रहा था, तो क्या उस दौरान इसे सुलझाने की कोशिश हुई? अगर समस्या का समाधान नहीं निकला, तो मौजूदा अधिकारी के कार्यकाल में क्या कदम उठाये गये? और सबसे अहम सवाल यह कि 27 मई 2026 को विभाग का आदेश जारी होने के बाद भी उप आवंटन की व्यवस्था क्यों लागू नहीं हुई?
आखिर वह गड़बड़ी क्या थी, जिसके कारण विभाग से मार्गदर्शन मांगना पड़ा?
सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद ने यह भी कहा कि कुछ गड़बड़ी सामने आई थी, इसलिए विभाग से उप आवंटन को लेकर मार्गदर्शन मांगा गया. अब यही बयान पूरे मामले में सबसे अहम सवाल खड़ा करता है. आखिर वह गड़बड़ी क्या थी? क्या भुगतान के दस्तावेजों में कोई समस्या सामने आई थी? क्या उप आवंटन की प्रक्रिया को लेकर कोई तकनीकी या प्रशासनिक अड़चन थी? या फिर विभागीय नियमों की व्याख्या को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी? अगर कोई गड़बड़ी सामने आई थी, तो उसकी प्रकृति क्या थी और उसे दूर करने के लिए क्या कार्रवाई की गई? विभाग से मार्गदर्शन कब मांगा गया और उस पर क्या जवाब मिला? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है.
दो सिविल सर्जन के कार्यकाल में गुजरे चार महीने, अब जवाबदेही किसकी?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, पूर्व सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार के कार्यकाल में आदेश के बाद दो महीने तक उपाधीक्षक के माध्यम से भुगतान नहीं हो पाया. इसके बाद मौजूदा सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद के कार्यकाल में भी दो महीने तक यही स्थिति बनी रही. इस तरह कुल चार महीने तक उप आवंटन नहीं मिलने का मामला सामने आया है. यानी मामला केवल एक दिन या कुछ सप्ताह की देरी का नहीं, बल्कि लगातार चार महीने तक निर्धारित व्यवस्था लागू नहीं होने का है. अब स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि इस दौरान आदेश के अनुपालन की समीक्षा हुई या नहीं, उप आवंटन नहीं होने की जानकारी उच्च अधिकारियों तक पहुंची या नहीं और समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाये गये. साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उपाधीक्षक विमलेश सिंह को उप आवंटन कब तक दिया जाएगा. क्योंकि आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान की जिम्मेदारी जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही भी है.
अब विभाग की चुप्पी टूटेगी या नहीं?
रांची सदर अस्पताल में आउटसोर्सिंग कर्मियों के भुगतान का यह मामला अब कुछ सीधे सवालों के जवाब मांग रहा है. स्वास्थ्य विभाग का 27 मई 2026 का आदेश लागू क्यों नहीं हुआ? उपाधीक्षक विमलेश सिंह को चार महीने तक उप आवंटन क्यों नहीं मिला? सिविल सर्जन ने जिस गड़बड़ी का जिक्र किया, वह क्या थी? विभाग से मार्गदर्शन मांगा गया, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? और आखिर इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू करने में कितना समय लगेगा? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि मामला हर महीने करीब साढ़े सात करोड़ रुपये के भुगतान से जुड़ा है. भुगतान करने वाली कंपनियों और उनके कर्मियों की जिम्मेदारियों के साथ-साथ सरकारी आदेश के अनुपालन की स्थिति भी साफ होनी चाहिए. इस पूरे मामले में किसी अनियमितता या निजी लाभ का निष्कर्ष निकालने से पहले संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों की जांच जरूरी है, लेकिन आदेश के अनुपालन में देरी पर सवाल उठाना पूरी तरह जायज है. अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या जवाब देता है, उप आवंटन की व्यवस्था कब लागू होती है और सामने आई समस्या का समाधान कैसे निकाला जाता है. क्योंकि करोड़ों के भुगतान की व्यवस्था में सवाल उठें, तो जवाब भी स्पष्ट होना चाहिए. और यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. इस मामले से जुड़े दूसरे पहलुओं की पड़ताल जारी रहेगी. अगली कड़ी में कुछ और सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे.

