पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख के सहयोग से सारवां की दुर्गा पूजा को मिली नई पहचान, 1981 में तिरपाल से हुई थी शुरुआत
झारखंड के देवघर जिले के सारवां में सार्वजनिक वैष्णवी दुर्गा पूजा समिति की परंपरा 45 साल पुरानी है. वर्ष 1981 में तिरपाल के नीचे शुरू हुई पूजा आज भव्य मंदिर का रूप ले चुकी है. हर साल यहां तीन दिवसीय मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

Deoghar: झारखंड के देवघर जिले के सारवां में सार्वजनिक वैष्णवी दुर्गा पूजा समिति की ओर से आयोजित दुर्गा पूजा पिछले 45 वर्षों से आस्था और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बनी हुई है. वर्ष 1981 में तिरपाल की छावनी के नीचे शुरू हुई मां दुर्गा की आराधना आज भव्य मंदिर और क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल हो चुकी है. इस परंपरा को आगे बढ़ाने में स्थानीय लोगों के सहयोग के साथ पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख और समिति के पदाधिकारियों की भी अहम भूमिका रही है. समिति पिछले 23 वर्षों से पूजा की जिम्मेदारी संभाल रही है. नवरात्र के दौरान यहां दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. वहीं, पूजा के अवसर पर लगने वाला तीन दिवसीय मेला स्थानीय दुकानदारों और कारोबारियों के लिए रोजगार तथा आमदनी का अवसर लेकर आता है.
तिरपाल की छावनी से भव्य मंदिर तक पहुंची आस्था की यात्रा
सारवां में सार्वजनिक वैष्णवी दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1981 में पंडित स्वर्गीय शिवनारायण झा ने स्थानीय लोगों के सहयोग से की थी. उस समय सीमित संसाधनों के बीच तिरपाल की छावनी बनाकर मां दुर्गा की आराधना की जाती थी. धीरे-धीरे ग्रामीणों, श्रद्धालुओं और समाजसेवियों की भागीदारी बढ़ती गई और मंदिर का स्वरूप भव्य होता चला गया. आज यह पूजा सारवां और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की धार्मिक पहचान बन चुकी है. नवरात्र के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर मां दुर्गा के दर्शन करते हैं. पूजा समिति और स्थानीय लोगों के सामूहिक प्रयासों ने इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया है. 45 वर्षों की यह यात्रा बताती है कि जनसहयोग और सामूहिक आस्था से कोई छोटा धार्मिक आयोजन भी समय के साथ क्षेत्र के प्रमुख उत्सवों में अपनी जगह बना सकता है.
बादल पत्रलेख ने कहा, धार्मिक आयोजन के साथ रोजगार का भी माध्यम है मेला
पूर्व कृषि मंत्री बादल पत्रलेख ने सारवां के दुर्गा पूजा मेले को धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन बताया. उन्होंने कहा कि मेले के दौरान छोटे दुकानदारों और स्थानीय कारोबारियों को व्यापार करने तथा आमदनी बढ़ाने का अवसर मिलता है. उनके अनुसार, यह आयोजन अब क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बन चुका है. बादल पत्रलेख ने मां दुर्गा की आराधना में शामिल होकर देश और झारखंड के लोगों के सुख, समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना की. पूजा के अवसर पर लगने वाले मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानें सजती हैं और आसपास के इलाकों से व्यापारी पहुंचते हैं. इससे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद रहती है. धार्मिक आयोजनों के साथ रोजगार और कारोबार को बढ़ावा देने में ऐसे मेलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है.
2003 से समिति संभाल रही पूजा की जिम्मेदारी
सार्वजनिक वैष्णवी दुर्गा पूजा समिति का वर्ष 2003 में पुनर्गठन किया गया था. इसके बाद से समिति के पदाधिकारी और सदस्य सामूहिक सहयोग से पूजा का आयोजन करते आ रहे हैं. समिति के उपाध्यक्ष संजय राय ने बताया कि पिछले 23 वर्षों से वे लोग पूजा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. स्थानीय लोगों के सहयोग से पूजा को व्यवस्थित तरीके से संपन्न कराने और मंदिर की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने का प्रयास किया जाता है. समिति के सचिव नरेश वर्मा ने कहा कि मां दुर्गा की आराधना सारवां की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है. पूजा के साथ लगने वाले मेले को व्यवस्थित बनाने और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए समिति के सदस्य पुलिस-प्रशासन का सहयोग करते हैं. आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा, धार्मिक कार्यक्रमों की व्यवस्था और मेले के सुचारु संचालन पर विशेष ध्यान दिया जाता है.
षोडशोपचार विधि से होती है मां दुर्गा की पूजा
सारवां स्थित सार्वजनिक वैष्णवी दुर्गा मंदिर की पहचान उसकी पारंपरिक पूजा पद्धति से भी जुड़ी है. यहां मां दुर्गा की आराधना षोडशोपचार विधि से की जाती है. क्षेत्र के प्राचीन बैजनाथपुर-बिशनपुर मंदिर में प्रचलित बलि प्रथा और तांत्रिक विधि-विधान से अलग यहां पूजा की अपनी विशिष्ट परंपरा है. मंदिर के आचार्य पंडित चंद्रकांत झा उर्फ पप्पू पंडित ने बताया कि उनके नाना पंडित स्वर्गीय श्रीनारायण झा मंदिर में पूजा-अर्चना कराते थे. उनके बाद से वे आचार्य की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. श्रद्धालुओं की आस्था और परंपरागत विधि-विधान के अनुसार पूजा संपन्न कराना उनकी प्राथमिकता है. नवरात्र के दौरान मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का केंद्र भी है.
'जब तक सांस है, तब तक माता का भक्त रहूंगा': बाबूराम सोरेन
सारवां क्षेत्र के बेलटिकरी गांव निवासी बाबूराम सोरेन मां दुर्गा के प्रति अपनी गहरी आस्था के लिए जाने जाते हैं. आदिवासी समाज से आने वाले बाबूराम सोरेन और उनकी पत्नी नवरात्र के दौरान व्रत रखते हैं तथा प्रतिदिन मंदिर पहुंचकर मां के दर्शन करते हैं. बाबूराम सोरेन का कहना है कि वे साधारण परिवार से आते हैं, लेकिन मां दुर्गा के प्रति उनकी श्रद्धा अटूट है. उनका मानना है कि मां की भक्ति में उन्हें मानसिक शांति और सुकून मिलता है. उन्होंने कहा कि जब तक शरीर में सांस रहेगी, वे नवरात्र के दौरान व्रत रखकर माता रानी के मंदिर में हाजिरी लगाते रहेंगे. उनकी यह आस्था बताती है कि धार्मिक परंपराएं लोगों को सामाजिक और आर्थिक भिन्नताओं से परे एक साझा विश्वास से जोड़ती हैं. सारवां की दुर्गा पूजा में ऐसे श्रद्धालुओं की भागीदारी आयोजन को सामुदायिक स्वरूप प्रदान करती है.
महानवमी पर हवन और कुमारी पूजन, अब तीन दिवसीय मेले की तैयारी
वर्ष 2026 में महानवमी के अवसर पर मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद हवन, कुमारी पूजन और भोजन का आयोजन किया गया. धार्मिक अनुष्ठानों के संपन्न होने के बाद अब तीन दिवसीय मेले की तैयारियां की जा रही हैं. मेले में विभिन्न प्रकार की दुकानें सजने और आसपास के क्षेत्रों से व्यापारियों के पहुंचने की उम्मीद है. इससे स्थानीय कारोबार को बढ़ावा मिलने की संभावना है. पूजा आयोजन को सफल बनाने में सुधांशु शेखर सिंह, वीरू यादव, दिवाकर वर्मा, केशव बरनवाल, उमेश राणा सहित समिति के अन्य सदस्यों का योगदान रहा है. समिति और स्थानीय लोग मिलकर आयोजन को व्यवस्थित बनाने में जुटे हैं. तिरपाल की छावनी से शुरू हुई सारवां की यह दुर्गा पूजा आज धार्मिक आस्था, सामाजिक एकजुटता और स्थानीय व्यापार से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा बन चुकी है. 45 वर्षों से जारी यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत पहुंचाने का माध्यम भी है.


