नेपाल फिर बनेगा हिंदू राष्ट्र? देउबा गुट के प्रस्ताव से बढ़ी हलचल, बालेन शाह क्या करेंगे
नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है. पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले नेपाली कांग्रेस गुट ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान के रूप में आगे बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया है.

Nepal Hindu Rashtra: नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग ने एक बार फिर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है. पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले गुट ने सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के रूप में आगे बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया है. 16 अगस्त 2026 को संपन्न राष्ट्रीय सम्मेलन के पांच सूत्रीय फैसले में धार्मिक सहिष्णुता, सामाजिक सद्भाव और सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता बनाए रखने की बात भी कही गई है. इस फैसले के बाद नेपाल में 2015 के संविधान के तहत स्थापित धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है. वहीं, संविधान संशोधन की प्रक्रिया के बीच अब नजर प्रधानमंत्री बालेन शाह सरकार के रुख पर है.
देउबा गुट ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान बनाने का प्रस्ताव किया पारित
शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाले नेपाली कांग्रेस गुट के राष्ट्रीय सम्मेलन में सनातन धर्म को नेपाल की राष्ट्रीय पहचान के तौर पर आगे बढ़ाने का फैसला किया गया. प्रस्ताव में कहा गया कि नेपाल की सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं देश की राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा हैं. इसके साथ ही हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति-आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की प्रतिबद्धता जताई गई. प्रस्ताव में धार्मिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है. यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाली कांग्रेस लंबे समय से मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा रही है. देउबा के इस रुख ने पार्टी के भीतर भी मतभेद पैदा किए हैं. कुछ नेताओं ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई और इसे संविधान की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था से जुड़े सवाल के रूप में देखा.
देउबा बोले- मैं हिंदू हूं, धार्मिक पहचान पर फैसला जनता करे
राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान शेर बहादुर देउबा ने अपनी धार्मिक आस्था को लेकर भी स्पष्ट बयान दिया. उन्होंने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से हिंदू हैं और सनातन परंपरा में विश्वास रखते हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश की धार्मिक पहचान को लेकर अंतिम फैसला जनता का होना चाहिए. देउबा ने अन्य धर्मों और धार्मिक समुदायों के प्रति सम्मान की बात भी कही. देउबा गुट के प्रस्ताव में भी केवल हिंदू धर्म को बढ़ावा देने की बात नहीं है, बल्कि हिंदू, बौद्ध, किरात और प्रकृति-आधारित धार्मिक परंपराओं के संरक्षण का उल्लेख किया गया है. साथ ही हर व्यक्ति और धार्मिक समुदाय को अपनी आस्था मानने की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की बात कही गई है. हालांकि, राजनीतिक स्तर पर इस प्रस्ताव को नेपाल की मौजूदा धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में संभावित बदलाव की दिशा में एक अहम कदम के तौर पर देखा जा रहा है.
नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग क्यों उठ रही है?
नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग नई नहीं है. 2008 से पहले नेपाल हिंदू राजतंत्र के रूप में जाना जाता था. इसके बाद देश में राजनीतिक बदलावों के बीच राजतंत्र समाप्त हुआ और नेपाल को धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया गया. 2015 के संविधान ने इसी व्यवस्था को संवैधानिक आधार दिया. अब हिंदू राष्ट्र समर्थक संगठन संविधान में बदलाव के जरिए देश की धार्मिक पहचान को फिर से परिभाषित करने की मांग कर रहे हैं. इसी बहस के बीच नेपाली कांग्रेस के देउबा गुट का सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. हालांकि, राष्ट्रीय पहचान के रूप में सनातन धर्म को बढ़ावा देने का प्रस्ताव अपने आप में नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं करता. इसके लिए संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रिया से गुजरना होगा.
संविधान संशोधन की प्रक्रिया में 245 अनुच्छेदों में बदलाव का सुझाव
नेपाल में पहले से ही संविधान संशोधन को लेकर व्यापक प्रक्रिया चल रही है. सरकार द्वारा गठित संवैधानिक संशोधन कार्यबल ने 308 में से 245 अनुच्छेदों में बदलाव का सुझाव दिया है. रिपोर्ट में शासन व्यवस्था, चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका और संघीय ढांचे समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर संशोधन की सिफारिश की गई है. इतने बड़े पैमाने पर बदलाव के सुझाव के कारण नेपाल में इसे केवल सामान्य संशोधन के बजाय संविधान के व्यापक पुनर्गठन के रूप में भी देखा जा रहा है. हालांकि, इस प्रक्रिया में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की सहमति नहीं बन पाई है. ऐसे में धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे को संविधान संशोधन के साथ जोड़ना बालेन शाह सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है.
बालेन शाह के सामने अब क्या चुनौती है?
नेपाल में संविधान संशोधन की बहस के बीच प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार के सामने धार्मिक पहचान का मुद्दा भी आ गया है. हिंदू राष्ट्र समर्थक राजनीतिक और सामाजिक समूह चाहते हैं कि संविधान से धर्मनिरपेक्षता से जुड़ी व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जाए. दूसरी ओर, नेपाल के संविधान में सभी धार्मिक समुदायों की स्वतंत्रता और देश की बहुधार्मिक पहचान को महत्व दिया गया है. ऐसे में किसी भी बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी होगी. संविधान संशोधन कार्यबल पहले ही बड़े पैमाने पर बदलावों का सुझाव दे चुका है. लेकिन रिपोर्ट को लेकर कई राजनीतिक दलों और संवैधानिक विशेषज्ञों की आपत्तियां भी सामने आई हैं. इसलिए बालेन शाह सरकार के लिए यह तय करना आसान नहीं होगा कि धार्मिक पहचान जैसे संवेदनशील मुद्दे को संशोधन की प्रक्रिया में किस तरह शामिल किया जाए.
हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर नेपाली कांग्रेस में भी मतभेद
सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान के तौर पर आगे बढ़ाने का प्रस्ताव नेपाली कांग्रेस के भीतर भी विवाद का कारण बना है. रिपोर्टों के अनुसार सम्मेलन में तैयार किए गए शुरुआती 20 सूत्रीय दस्तावेज में इस तरह का प्रस्ताव नहीं था. बाद में पांच सूत्रीय अलग प्रस्ताव में सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान के रूप में आगे बढ़ाने की बात शामिल की गई. इस पर पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने आपत्ति जताई. विरोध करने वाले नेताओं का तर्क है कि नेपाली कांग्रेस ने ही 2015 के संविधान को लागू करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. ऐसे में पार्टी की ओर से धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था से अलग राजनीतिक लाइन अपनाना गंभीर बदलाव होगा. दूसरी ओर, प्रस्ताव के समर्थक इसे नेपाल की ऐतिहासिक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देख रहे हैं. इस मुद्दे ने पार्टी के अंदर चल रहे वैचारिक मतभेद को और गहरा कर दिया है.
क्या नेपाल फिर बनेगा हिंदू राष्ट्र?
फिलहाल नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र घोषित किए जाने का कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. देउबा गुट ने सनातन धर्म को राष्ट्रीय पहचान के रूप में आगे बढ़ाने का प्रस्ताव जरूर पारित किया है, लेकिन इससे सीधे तौर पर संवैधानिक व्यवस्था नहीं बदलती. इसके लिए संविधान में संशोधन और आवश्यक राजनीतिक प्रक्रिया पूरी करनी होगी. अब इस पूरे मुद्दे पर प्रधानमंत्री बालेन शाह सरकार और नेपाल की संसद की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. यदि हिंदू राष्ट्र समर्थक दल इस मांग को संविधान संशोधन की बहस में मजबूती से उठाते हैं, तो आने वाले समय में नेपाल की धार्मिक पहचान एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकती है. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि व्यापक संविधान संशोधन की प्रक्रिया में धर्मनिरपेक्षता के प्रावधान पर क्या रुख अपनाया जाता है और क्या हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बन पाती है.

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.
Related Posts






Leave a comment