JSSC-CGL समेत TDPL की सभी भर्ती परीक्षाएं रद्द: छात्र आंदोलन के दबाव में सरकार का बड़ा फैसला, अब जांच और भर्ती सुधार की अग्निपरीक्षा

रांची: झारखंड में JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं को लेकर करीब 24 दिनों से चल रहा छात्र आंदोलन सोमवार को एक बड़े मोड़ पर पहुंच गया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कैबिनेट बैठक के बाद बड़ा ऐलान करते हुए JSSC-CGL परीक्षा समेत TDPL के माध्यम से आयोजित कराई गई सभी परीक्षाओं, उनके परिणामों और TDPL के जरिए हुई चयन प्रक्रिया को रद्द करने की घोषणा की। सरकार ने भर्ती प्रक्रिया में सुधार के लिए IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में कमेटी बनाने का भी फैसला किया है। साथ ही पूरे मामले की जांच रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कराने की बात कही गई है। इससे पहले सरकार 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा और दो बैकलॉग परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला कर चुकी थी।
24 दिन के आंदोलन के बाद सरकार का बड़ा यू-टर्न
इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने की खबर मानना शायद अधूरा होगा। दरअसल, पिछले कई सप्ताह से रांची में JPSC और JSSC अभ्यर्थी परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों, पारदर्शिता की कमी और भर्ती प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। छात्रों की सबसे बड़ी मांगों में JSSC-CGL को रद्द करना, TDPL से जुड़ी परीक्षाओं की जांच और भर्ती व्यवस्था में व्यापक सुधार शामिल था।
16 अगस्त को आंदोलनकारियों ने सरकार पर दबाव और बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री आवास घेराव की चेतावनी तक दे दी थी। इससे पहले प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक नेताओं के पुतले भी जलाए और सरकार को समयसीमा दी थी। ऐसे माहौल में 17 अगस्त का दिन निर्णायक साबित हुआ।
सरकार ने पहले छात्रों से बातचीत की कोशिश की, लेकिन सोमवार को छात्रों और सरकार के मंत्रियों के बीच प्रस्तावित बैठक निर्णायक रूप से आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल के साथ लंबी बैठक की और परीक्षा रद्द करने के तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर चर्चा की। अंततः सरकार ने सबसे बड़ा फैसला लेते हुए TDPL से जुड़ी पूरी परीक्षा प्रक्रिया को ही कठघरे में खड़ा कर दिया।
JSSC-CGL ही नहीं, TDPL से जुड़ी पूरी प्रक्रिया पर कैंची
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ऐलान का सबसे अहम हिस्सा TDPL को लेकर है। सरकार के मुताबिक TDPL द्वारा आयोजित परीक्षाएं, उसके जरिए जारी परिणाम और उससे जुड़ी चयन प्रक्रिया को रद्द किया जाएगा। यानी मामला सिर्फ JSSC-CGL की परीक्षा तक सीमित नहीं है।
JSSC-CGL 2023 परीक्षा 2025 पदों के लिए सितंबर 2024 में आयोजित हुई थी। इसका परिणाम दिसंबर 2025 में जारी किया गया था और सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र भी दिए जा चुके थे। ऐसे में परीक्षा रद्द करने का फैसला केवल उन अभ्यर्थियों को प्रभावित नहीं करेगा जो दोबारा परीक्षा देंगे, बल्कि उन उम्मीदवारों की स्थिति पर भी सवाल खड़े करेगा जो पहले ही चयनित होकर नियुक्त हो चुके हैं।
यही वजह है कि सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल परीक्षा दोबारा कराने की नहीं, बल्कि पुराने चयन की कानूनी और प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट करने की भी होगी। किस अभ्यर्थी की नियुक्ति पर क्या असर पड़ेगा, नई परीक्षा में उम्र सीमा और अवसर का क्या प्रावधान होगा और पूरी प्रक्रिया कितने समय में पूरी होगी—इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में बेहद महत्वपूर्ण होगा।
2014 से हुई गड़बड़ियों की होगी समीक्षा, लेकिन दायरा कितना बड़ा?
मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया है कि भर्ती परीक्षाओं में 2014 से हुई छोटी-बड़ी गलतियों की समीक्षा की जाएगी। यह घोषणा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जांच का दायरा किसी एक परीक्षा या किसी एक एजेंसी तक सीमित नहीं रह जाता। सरकार अब भर्ती परीक्षा प्रणाली की खामियों को व्यापक रूप से देखने की बात कर रही है।
यहीं से इस फैसले का असली राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व सामने आता है। अगर जांच केवल TDPL तक सीमित रहती है, तो सवाल उठ सकता है कि परीक्षा प्रक्रिया में एजेंसी के अलावा जिम्मेदार सरकारी अधिकारी और निगरानी तंत्र की भूमिका क्या थी। लेकिन अगर जांच पूरी व्यवस्था की जवाबदेही तक जाती है, तो कई पुराने फैसले और प्रक्रियाएं भी जांच के दायरे में आ सकती हैं।
सरकार ने सुधार के लिए अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में कमेटी बनाने की बात कही है। इसका उद्देश्य परीक्षा प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए नए नियम और SOP तैयार करना बताया जा रहा है।
रिटायर्ड जज की जांच से बढ़ी जवाबदेही की उम्मीद
सरकार का दूसरा बड़ा कदम पूरे मामले की जांच रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में कराने का फैसला है। यही वह बिंदु है जहां छात्र आंदोलन की अगली दिशा तय होगी।
छात्र लंबे समय से केवल परीक्षा रद्द करने की मांग नहीं कर रहे थे। उनकी मांग यह भी रही है कि कथित गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए। आंदोलनकारियों की ओर से केंद्रीय एजेंसी से जांच की मांग भी लगातार उठती रही है।
ऐसे में न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति की अध्यक्षता में जांच समिति बनने से सरकार को एक मौका मिला है कि वह परीक्षा विवाद को संस्थागत तरीके से सुलझाए। लेकिन यहां भी असली सवाल जांच की घोषणा नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता, समयसीमा और रिपोर्ट पर होने वाली कार्रवाई का है।
अगर जांच रिपोर्ट आती है और जिम्मेदारी तय होती है, तभी छात्रों के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार ने केवल आंदोलन शांत कराने के लिए परीक्षा रद्द नहीं की, बल्कि व्यवस्था में वास्तविक सुधार की शुरुआत की है।
छात्रों की बड़ी जीत, लेकिन आंदोलन की अगली लड़ाई अब नई परीक्षा और नई व्यवस्था की
सरकार के फैसले के बाद आंदोलनकारी छात्रों के बीच खुशी का माहौल देखने को मिला। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने भी परीक्षा रद्द होने के फैसले का स्वागत किया, हालांकि छात्रों की लड़ाई को लेकर आगे भी सतर्क रहने की बात सामने आई है।
लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है—क्या परीक्षा रद्द होना आंदोलन का अंत है?
संभवतः नहीं। क्योंकि अब छात्रों की नजर तीन चीजों पर होगी। पहली, नई परीक्षा कब होगी। दूसरी, पुरानी परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों का क्या होगा। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण, भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए इसके लिए सरकार क्या ठोस सिस्टम तैयार करती है।
सरकार के सामने अब समय का दबाव भी है। लंबे समय से तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए परीक्षा रद्द होने का मतलब फिर से महीनों की तैयारी, अनिश्चितता और आर्थिक दबाव है। इसलिए केवल रद्दीकरण को समाधान मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। नई परीक्षा की स्पष्ट तारीख, निष्पक्ष प्रक्रिया और अभ्यर्थियों के हितों की सुरक्षा जरूरी होगी।
असली परीक्षा अब सरकार की—क्या भर्ती सिस्टम बदलेगा?
पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि छात्र आंदोलन ने सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। कुछ ही दिन पहले तक JSSC-CGL को लेकर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। अब सरकार ने उसी परीक्षा को रद्द करने के साथ TDPL से जुड़ी अन्य परीक्षाओं पर भी कार्रवाई का फैसला कर लिया है।
लेकिन अब सरकार की अपनी परीक्षा शुरू हो गई है।
क्या नई भर्ती व्यवस्था ऐसी होगी जिसमें पेपर तैयार करने से लेकर प्रिंटिंग, ट्रांसपोर्टेशन, परीक्षा केंद्र, CCTV, बायोमेट्रिक, OMR और रिजल्ट तक हर स्तर पर जवाबदेही तय हो? क्या एजेंसी चयन की प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी होगी? क्या परीक्षा एजेंसी और सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट होगी? और अगर भविष्य में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो कार्रवाई कितनी तेजी से होगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में झारखंड की भर्ती राजनीति की दिशा तय करेंगे। फिलहाल इतना जरूर है कि JSSC-CGL विवाद में सरकार ने छात्रों की सबसे बड़ी मांगों में से एक को स्वीकार कर लिया है। अब आंदोलन की सफलता का पैमाना सिर्फ परीक्षा रद्द होना नहीं, बल्कि नई परीक्षा कितनी निष्पक्ष होती है और पुरानी गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदारी कितनी तय होती है, यही होगा।



