आरक्षित सीटें, CNT-SPT और जमीन... परिसीमन से पहले आदिवासी संगठनों ने रखी 5 मांगें
परिसीमन को लेकर आदिवासी संगठनों ने पांच सूत्री मांगें रखी हैं.आरक्षित सीटें कम नहीं करने, CNT-SPT एक्ट लागू करने, जमीन वापस दिलाने और पांचवीं अनुसूची के अधिकारों को लागू करने की मांग की गई है.


Ranchi: झारखंड में परिसीमन को लेकर सियासी और सामाजिक हलचल के बीच आदिवासी संगठनों ने अपनी मांगें सामने रख दी हैं. रांची में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में संगठनों ने आरक्षित सीटों, CNT-SPT एक्ट, पांचवीं अनुसूची, जमीन और विस्थापन से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. संगठनों ने साफ कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या कम नहीं की जानी चाहिए. इसके बजाय पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर विचार होना चाहिए. प्रेस कॉन्फ्रेंस में ग्लैडसन डुंगडुंग, लक्ष्मीनारायण मुंडा और अजय तिर्की समेत कई आदिवासी प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे. संगठनों ने अवैध भूमि हस्तांतरण रद्द करने, मूल रैयतों को जमीन वापस दिलाने और पांचवीं अनुसूची के संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावी तरीके से लागू करने की मांग भी रखी. मांगें नहीं मानी गईं तो आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी गई.
आरक्षित सीटों पर साफ रुख
आदिवासी संगठनों की पहली प्रमुख मांग परिसीमन में आरक्षित सीटों से जुड़ी है. उनका कहना है कि आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित सीटों की संख्या किसी भी परिस्थिति में कम नहीं की जानी चाहिए. पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में आदिवासी प्रतिनिधित्व को बनाए रखने के साथ जरूरत के मुताबिक सीटें बढ़ाने की मांग भी की गई. संगठनों ने कहा कि परिसीमन का असर केवल चुनावी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा संबंध राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी होगा. इसलिए प्रक्रिया के दौरान आदिवासी क्षेत्रों और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना जरूरी है.
CNT-SPT और जमीन का मुद्दा
दूसरी बड़ी मांग CNT और SPT एक्ट से जुड़ी है. संगठनों ने इन कानूनों के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने की मांग की. साथ ही अवैध भूमि हस्तांतरण के मामलों को रद्द कर आदिवासी मूल रैयतों को उनकी जमीन वापस दिलाने की बात कही. पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में संविधान के अनुच्छेद 244 और अन्य संबंधित प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू करने की मांग भी रखी गई. संगठनों ने कहा कि इन क्षेत्रों को संविधान के तहत मिले विशेष अधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. इसके साथ ही पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में राज्यपाल को मिले संवैधानिक अधिकारों का पूर्ण इस्तेमाल करने की मांग की गई.
विस्थापन का हिसाब, मुआवजे की मांग
आदिवासी संगठनों ने पिछले 75 वर्षों में हुए विस्थापन, भूमि से जुड़े विवादों और सांस्कृतिक नुकसान का आकलन कराने की मांग भी रखी. उनका कहना है कि प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी मिलनी चाहिए. संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज की जमीन, जंगल, संस्कृति और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था की रक्षा के लिए लंबे समय से संघर्ष होता रहा है. ऐसे में आने वाली पीढ़ियों के संवैधानिक अधिकार और पहचान सुरक्षित रखना जरूरी है.
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘जागो आदिवासी, समझो और लड़ो’, ‘पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करो’, ‘CNT & SPT बचाओ’, ‘परिसीमन की साजिश मुर्दाबाद’ और ‘आदिवासी एकता जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए गए. संगठनों ने कहा कि यदि उनकी मांगों पर गंभीर पहल नहीं हुई तो आंदोलन को आगे बढ़ाया जाएगा. उन्होंने आदिवासी समाज के साथ युवाओं, छात्रों, मजदूरों, किसानों और अन्य लोगों से संवैधानिक अधिकारों के लिए एकजुट होने की अपील की.

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