40 साल के ‘लाल साम्राज्य’ पर सबसे बड़ा प्रहार! 2.20 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी से माओवादी नेटवर्क की टूटी रीढ़, सरेंडर से ऑपरेशन तक ऐसे बिछा जाल
पहले टूटा नेटवर्क, फिर खुला राज और आखिर में बिछा गिरफ्तारी का जाल… मिसिर बेसरा तक पहुंचने की कहानी किसी बड़े ऑपरेशन से कम नहीं है।


Ranchi: झारखंड के जंगलों में चार दशक से ज्यादा समय तक माओवादी गतिविधियों का बड़ा चेहरा रहे भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेता मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को सुरक्षा एजेंसियां बड़ी रणनीतिक सफलता के तौर पर देख रही हैं। 2.20 करोड़ रुपये के इनामी और संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य रहे बेसरा तक पहुंचना सुरक्षा बलों के लिए आसान नहीं था। लंबे समय से वह ठिकाने बदलकर पुलिस और एजेंसियों को चकमा देता रहा था। लेकिन इस बार हालात बदले। लगातार कमजोर होते संगठन, टूटते कैडर नेटवर्क और उसके करीबियों के आत्मसमर्पण से मिले इनपुट ने सुरक्षा एजेंसियों को वह रास्ता दिखाया, जिसके बाद धनबाद-गिरिडीह सीमा के मनियाडीह इलाके में देर रात बड़ा ऑपरेशन चलाया गया। इस कार्रवाई ने नक्सल विरोधी अभियान में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।
सरेंडर से गिरफ्तारी तक की कहानी: जब अपने ही लोगों से मिलने लगे बड़े सुराग
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी अचानक हुई कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से चल रही रणनीति और खुफिया निगरानी थी। सुरक्षा एजेंसियां लगातार उसके नेटवर्क, संपर्कों और गतिविधियों पर नजर बनाए हुए थीं। सबसे अहम मोड़ तब आया जब उसके दस्ते से जुड़े कई नक्सलियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। हाल ही में 16 माओवादियों के आत्मसमर्पण ने सुरक्षा बलों को संगठन की अंदरूनी गतिविधियों और नेतृत्व की हलचल से जुड़े कई महत्वपूर्ण इनपुट दिए। इन आत्मसमर्पण करने वालों में मिसिर बेसरा के करीबी सहयोगी और बॉडीगार्ड शनिचरवा के शामिल होने की बात सामने आई। माना जा रहा है कि इन जानकारियों ने ऑपरेशन की रणनीति तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई।
जिसे जंगलों का ‘अदृश्य कमांडर’ कहा जाता था, आखिर कैसे पहुंचा सुरक्षा बलों के शिकंजे में
मिसिर बेसरा लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की सबसे बड़ी चुनौती में शामिल था। वह संगठन के शीर्ष फैसले लेने वाले नेताओं में गिना जाता था और झारखंड के अलावा बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में उसका प्रभाव माना जाता था। सूचना मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने बेहद गोपनीय तरीके से ऑपरेशन की तैयारी की। राज्य पुलिस, केंद्रीय बलों और विशेष इकाइयों के बीच तालमेल बनाकर कार्रवाई को अंजाम दिया गया। जानकारी के अनुसार, मनियाडीह इलाके में उसे वाहन से जाते समय घेरा गया। ऑपरेशन इतना सटीक था कि उसे संभलने या भागने का मौका नहीं मिला। उसके साथ मौजूद दो सहयोगियों को भी पकड़ा गया, जबकि कुछ अन्य लोगों से पूछताछ की गई।
माओवादी संगठन की कमर पर सबसे बड़ा वार, क्योंकि बचा था नेतृत्व का आखिरी मजबूत चेहरा
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को इसलिए भी बड़ी सफलता माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में माओवादी संगठन लगातार कमजोर हुआ है। संगठन के कई बड़े नेताओं की मौत, गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण के बाद शीर्ष नेतृत्व सीमित होता गया। ऐसे दौर में मिसिर बेसरा का सक्रिय रहना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था। उसकी गिरफ्तारी से संगठन के नेतृत्व ढांचे, रणनीतिक फैसलों और जमीन पर सक्रिय नेटवर्क को बड़ा झटका लगने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां यह भी मानती हैं कि किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी के बाद भी स्थानीय स्तर पर सक्रिय छोटे समूहों और समर्थकों के खिलाफ अभियान जारी रखना जरूरी है।
150 से ज्यादा केस, करोड़ों का इनाम और सालों की तलाश: क्यों इतना अहम था बेसरा
मिसिर बेसरा पर कई राज्यों में गंभीर मामले दर्ज बताए जाते हैं। झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में उसके खिलाफ 150 से अधिक केस होने की जानकारी सामने आई है। उस पर झारखंड सरकार ने एक करोड़ रुपये और ओडिशा सरकार ने 1.20 करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया था। यही वजह थी कि वह देश के सबसे ज्यादा इनामी माओवादी नेताओं में शामिल था। उसका नाम कई बड़े नक्सली मामलों में सामने आता रहा। सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से उसकी तलाश में अभियान चला रही थीं।
2007 में पकड़ा गया, 2009 में छुड़ाया गया, फिर जंगल बना ठिकाना
बेसरा का सुरक्षा एजेंसियों से बचने का इतिहास भी लंबा रहा है। उसे पहली बार 2007 में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर पर हुए हमले के दौरान माओवादियों ने उसे छुड़ा लिया था। इसके बाद वह दोबारा भूमिगत हो गया और झारखंड के जंगल क्षेत्रों में संगठन की गतिविधियों से जुड़ा रहा। सारंडा, कोल्हान और अन्य इलाकों में उसकी सक्रियता की चर्चा होती रही। कई बार सुरक्षा बल उसके करीब पहुंचे, लेकिन वह बच निकलता रहा।
अब पूछताछ से खुलेगा माओवादी नेटवर्क का राज
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद अब जांच एजेंसियों की नजर उससे मिलने वाली जानकारी पर है। सुरक्षा एजेंसियां संगठन के वित्तीय नेटवर्क, हथियार सप्लाई चैन, सक्रिय कैडर और पुराने मामलों से जुड़े सुराग जुटाने की कोशिश करेंगी। पूछताछ में यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि पिछले वर्षों में उसने किन इलाकों में संगठन को सक्रिय बनाए रखा और उसके संपर्क किन लोगों से थे।
नक्सल विरोधी अभियान में मील का पत्थर, लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी निश्चित रूप से सुरक्षा बलों के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह कार्रवाई दिखाती है कि लगातार दबाव, खुफिया नेटवर्क और आत्मसमर्पण नीति के जरिए माओवादी संगठन को कमजोर किया जा सकता है। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के सामने अब भी चुनौती है कि बचे हुए छोटे नेटवर्क को खत्म किया जाए और प्रभावित इलाकों में विकास और विश्वास बहाली को मजबूत किया जाए। फिलहाल, 2.20 करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश के नक्सल विरोधी अभियान की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।

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