गिरिडीह की सियासत से हेमंत सरकार के मंत्री तक, सुदिव्य सोनू की आखिरी कहानी

गिरिडीह से झारखंड सरकार तक का राजनीतिक सफर तय करने वाले सुदिव्य कुमार सोनू अब नहीं रहे। झारखंड सरकार में मंत्री और गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र से विधायक सुदिव्य कुमार सोनू का रविवार तड़के निधन हो गया। उन्होंने गिरिडीह के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सामने आते ही झारखंड की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई।
सुदिव्य कुमार सोनू झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख नेताओं में अपनी पहचान बना चुके थे। गिरिडीह की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने 2019 के विधानसभा चुनाव में पहली बार जीत दर्ज की। इसके बाद 2024 में भी उन्होंने गिरिडीह विधानसभा सीट से जीत हासिल की और लगातार दूसरी बार विधायक बने।
विधायक से मंत्री तक का सफर
लगातार दो चुनावों में जीत के बाद सुदिव्य कुमार सोनू को हेमंत सोरेन सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। वह झारखंड सरकार में नगर विकास एवं आवास, उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
सरकार में उनकी भूमिका लगातार बढ़ती गई। खासकर नगर विकास और शिक्षा जैसे अहम विभागों से जुड़े फैसलों और योजनाओं को लेकर वह लगातार सक्रिय नजर आते थे।
निधन से कुछ घंटे पहले तक थे सक्रिय
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन की खबर इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर वह सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। गिरिडीह के इस्लामिया उर्दू मिडिल स्कूल के शताब्दी समारोह में उन्होंने हिस्सा लिया था।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर बात की और स्कूलों को कंप्यूटर उपलब्ध कराने की बात भी कही थी। किसी ने शायद नहीं सोचा होगा कि यह उनका आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम साबित होगा।
अचानक बिगड़ी तबीयत
जानकारी के अनुसार शनिवार देर रात उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें गिरिडीह के निजी अस्पताल ले जाया गया। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक उन्हें कार्डियक अरेस्ट की शिकायत हुई थी। चिकित्सकों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
उनके निधन की खबर फैलते ही गिरिडीह समेत पूरे झारखंड में उनके समर्थकों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में शोक की लहर दौड़ गई।
झारखंड की राजनीति में बड़ी क्षति
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन को झारखंड मुक्ति मोर्चा और राज्य की राजनीति के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है। एक जनप्रतिनिधि के तौर पर गिरिडीह में उनकी सक्रियता और सरकार में मंत्री के तौर पर उनकी जिम्मेदारियों ने उन्हें राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण चेहरा बनाया था।
गिरिडीह की सियासत से शुरू हुआ उनका सफर झारखंड सरकार के मंत्री पद तक पहुंचा, लेकिन अचानक आई इस दुखद खबर के साथ उनका राजनीतिक सफर हमेशा के लिए थम गया।

