सुदिव्य सोनू के बाद हेमंत के सामने दोहरा सियासी इम्तिहान, विरासत और कैबिनेट में किसे मिलेगी जगह?
झारखंड सरकार में दो मंत्री पद खाली होने के बाद JMM के भीतर नए सियासी समीकरण को लेकर चर्चा तेज हो गई है. सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद गिरिडीह में उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का सवाल है, तो दूसरी ओर रामदास सोरेन के बेटे सोमेश सोरेन घाटशिला उपचुनाव जीतने के बावजूद अब तक कैबिनेट से बाहर हैं.


हेमंत सोरेन सरकार में अब दो मंत्री पद खाली हैं और इन दोनों पदों ने JMM के भीतर सत्ता के नए समीकरण की गुंजाइश खोल दी है. एक तरफ सुदिव्य सोनू की राजनीतिक विरासत है, जिसे गिरिडीह में आगे बढ़ाने की चर्चा है. दूसरी तरफ रामदास सोरेन के बेटे सोमेश सोरेन हैं, जो घाटशिला उपचुनाव जीतकर विधायक बन चुके हैं, लेकिन अब तक कैबिनेट का हिस्सा नहीं बने. JMM के पुराने उदाहरणों में दिवंगत नेताओं के परिवारों को मंत्री पद और उपचुनाव, दोनों में भूमिका मिलती रही है. मगर रामदास सोरेन के मामले में पार्टी ने अलग रास्ता चुना. अब दो खाली पदों के बीच हेमंत सोरेन के सामने सवाल सिर्फ चेहरों का नहीं, बल्कि विरासत, संगठन और सत्ता के बीच संतुलन तय करने का है.
सुदिव्य के बाद गिरिडीह में विरासत का सवाल
गिरिडीह में सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक विरासत को लेकर सबसे स्वाभाविक चर्चा उनके परिवार के इर्द-गिर्द है. सुदिव्य हेमंत सोरेन के करीबी नेताओं में थे और सरकार के कई संवेदनशील राजनीतिक मामलों में उनकी भूमिका रही. छात्र आंदोलनों के दौरान सरकार और छात्रों के बीच संवाद से लेकर संगठनात्मक रणनीति तक, उनकी सक्रियता ने उन्हें सामान्य विधायक से अलग राजनीतिक पहचान दी. इसलिए यदि उनकी पत्नी को गिरिडीह उपचुनाव में उतारा जाता है, तो इसे केवल सहानुभूति के आधार पर लिया गया फैसला नहीं माना जाएगा. यह JMM की ओर से सुदिव्य की राजनीतिक पहचान को परिवार के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश भी होगी. लेकिन असली सवाल टिकट से आगे है. क्या परिवार को सिर्फ चुनावी जिम्मेदारी मिलेगी, या सत्ता में भी प्रतिनिधित्व दिया जाएगा? यही फैसला गिरिडीह की राजनीति के साथ JMM के भीतर सुदिव्य परिवार की भविष्य की भूमिका भी तय करेगा.
हाजी-जगरनाथ से रामदास तक बदलता रहा फॉर्मूला
JMM के पिछले कुछ फैसले इस पूरे समीकरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं. हाजी हुसैन अंसारी के निधन के बाद उनके बेटे हफीजुल हसन को मंत्री बनाया गया और फिर मधुपुर उपचुनाव में पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया. जगरनाथ महतो के निधन के बाद उनकी पत्नी बेबी देवी को कैबिनेट में जगह मिली और डुमरी उपचुनाव में भी वही JMM का चेहरा बनीं. इन दोनों मामलों में राजनीतिक विरासत और सत्ता की जिम्मेदारी एक ही परिवार के सदस्य के पास गई. लेकिन रामदास सोरेन के निधन के बाद तस्वीर अलग रही. उनके बेटे सोमेश सोरेन को घाटशिला उपचुनाव लड़ाया गया, उन्होंने जीत हासिल की, लेकिन मंत्री पद नहीं मिला. इस बदलाव ने यह संकेत दिया कि JMM के लिए परिवार को चुनावी विरासत सौंपना और कैबिनेट में शामिल करना अब जरूरी तौर पर एक ही फैसला नहीं है. सुदिव्य के बाद इसी पुराने और नए मॉडल के बीच चुनाव होना है.
दो खाली पदों ने खोल दिया नया समीकरण
रामदास सोरेन के निधन के बाद खाली हुआ मंत्री पद पहले से चर्चा में था. अब सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद दूसरा पद भी खाली हो गया है. यही बदलाव इस पूरे मामले को ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है. अब हेमंत सोरेन के सामने ऐसी स्थिति है जिसमें सुदिव्य की पत्नी और सोमेश सोरेन, दोनों को कैबिनेट में जगह देने की संभावना मौजूद है. एक संभावित राजनीतिक संतुलन यह हो सकता है कि सुदिव्य की पत्नी को गिरिडीह उपचुनाव का उम्मीदवार बनाया जाए और उन्हें मंत्री पद भी दिया जाए, जबकि दूसरे पद पर सोमेश सोरेन को शामिल किया जाए. इससे दोनों दिवंगत नेताओं के परिवारों को सत्ता में प्रतिनिधित्व मिल सकता है. राजनीतिक तौर पर यह JMM के लिए संतुलित तस्वीर होगी. लेकिन इसी के साथ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की दावेदारी का सवाल उठेगा. क्योंकि दो पद खाली जरूर हैं, लेकिन उन्हें भरने वाला हर फैसला संगठन के भीतर शक्ति-संतुलन को प्रभावित करेगा.
परिवारों के बजाय वरिष्ठ नेताओं पर भी दांव संभव
हेमंत सोरेन के सामने एक दूसरा रास्ता भी है. सुदिव्य की पत्नी को गिरिडीह से चुनाव लड़ाया जाए, लेकिन मंत्री पद किसी अनुभवी JMM विधायक को दिया जाए. दूसरे पद पर सोमेश सोरेन को जगह देने का विकल्प तब भी खुला रहेगा. इससे पार्टी एक तरफ दिवंगत नेता की राजनीतिक विरासत को चुनावी स्तर पर आगे बढ़ाएगी, वहीं सरकार में अनुभवी चेहरे को जिम्मेदारी देकर प्रशासनिक संतुलन बनाए रख सकती है. इससे भी आगे जाकर दोनों खाली पद वरिष्ठ JMM नेताओं को सौंपने का विकल्प मौजूद है. ऐसे फैसले से पार्टी पर परिवारवाद को लेकर होने वाली आलोचना को सीमित करने की कोशिश की जा सकती है. लेकिन इसके साथ राजनीतिक असंतोष का खतरा भी रहेगा. अगर पहले हाजी हुसैन अंसारी और जगरनाथ महतो के परिवारों को सत्ता में जगह मिली और अब सुदिव्य या रामदास के परिवार को सिर्फ चुनावी भूमिका दी गई, तो JMM के भीतर इस बदलाव की वजह पर सवाल उठ सकते हैं.
फैसला दो मंत्रियों का नहीं, JMM की दिशा का होगा
दो मंत्री पद भरने के साथ हेमंत सोरेन को विभागों का पुनर्विन्यास भी करना होगा. रामदास सोरेन के निधन के बाद उनके विभागों की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री के पास गई थी और अब सुदिव्य के विभागों को लेकर भी यही सवाल खड़ा है. ऐसे में कैबिनेट विस्तार की जरूरत सिर्फ राजनीतिक नहीं, प्रशासनिक भी है. लेकिन असली दिलचस्पी इस बात में रहेगी कि इन दोनों पदों के लिए चेहरे कैसे चुने जाते हैं. अगर सुदिव्य की पत्नी और सोमेश दोनों को जगह मिलती है, तो JMM दो राजनीतिक परिवारों को एक साथ साधने का संदेश देगी. अगर परिवारों की जगह वरिष्ठ नेताओं को प्राथमिकता मिलती है, तो यह संगठन और प्रशासनिक अनुभव पर जोर देने वाला फैसला होगा. और अगर एक परिवार को सत्ता में जगह मिलती है, जबकि दूसरे को सिर्फ चुनावी भूमिका, तो वह भी अपने आप में बड़ा राजनीतिक संदेश होगा. इसलिए अगला फैसला सिर्फ कैबिनेट विस्तार नहीं है. यह तय करेगा कि हेमंत सोरेन की JMM आगे राजनीतिक विरासत को किस तरह परिभाषित करती है

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