हूल दिवस पर सियासत तेज: भोगनाडीह पहुंचे चंपाई सोरेन, हेमंत सरकार पर बोला बड़ा हमला, बताया 'आदिवासी विरोधी'
हूल दिवस पर भोगनाडीह पहुंचे भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने हेमंत सरकार पर तीखा हमला बोला. उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक प्रतिबंधों को लेकर सरकार को आदिवासी विरोधी करार दिया तथा सिद्धो-कान्हू के वंशजों के सम्मान से जुड़े सवाल उठाए.

रांची: एक ओर पूरा झारखंड मंगलवार को हूल दिवस के मौके पर वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो के बलिदान को याद कर रहा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी हूल क्रांति के महानायकों को श्रद्धांजलि देते हुए उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया. लेकिन इसी दिन भोगनाडीह से राजनीतिक घमासान भी तेज हो गया. पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने हेमंत सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए उसे *"आदिवासी विरोधी सरकार"* करार दिया.
भोगनाडीह पहुंचने के बाद चंपाई सोरेन ने वहां की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि हूल दिवस जैसे ऐतिहासिक अवसर पर वीर भूमि भोगनाडीह को पुलिस छावनी में बदल दिया गया. उनके अनुसार, बड़ी संख्या में पुलिस बल और मजिस्ट्रेट की तैनाती कर दी गई, जबकि आदिवासी समाज अपने महानायकों को श्रद्धांजलि देने पहुंचा था. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, *"आखिर सिद्धो-कान्हू की क्या गलती है कि उनके वंशजों को उन्हें नमन करने के लिए भी इजाजत लेनी पड़े और बॉन्ड भरना पड़े?"*
चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि जिस धरती से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हूल क्रांति की शुरुआत हुई, आज उसी स्थान पर आदिवासी समाज को प्रशासनिक बंदिशों का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने कहा कि यह स्थिति आदिवासी अस्मिता और हूल के इतिहास के सम्मान के अनुरूप नहीं है.
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह भी आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार जल, जंगल और जमीन की रक्षा के दावों के बावजूद आदिवासी हितों से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशील नहीं दिख रही. उन्होंने कहा कि सरकार का रवैया आदिवासी समाज के सम्मान के विपरीत है और इसलिए उन्होंने इसे *आदिवासी विरोधी सरकार* बताया.
हूल दिवस पर जहां सरकार स्वतंत्रता संग्राम के आदिवासी नायकों के योगदान को याद कर रही थी, वहीं विपक्ष ने इसी मंच से सरकार की नीतियों और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाकर राजनीतिक बहस को नई दिशा दे दी. ऐसे में स्पष्ट है कि इस बार हूल दिवस केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि झारखंड की राजनीति का नया अखाड़ा भी बन गया.

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