VIDEO: 3000 जवानों की घेराबंदी तोड़कर कोल्हान के जंगलों तक कैसे पहुंचा मिसिर बेसरा? समझिए ऑपरेशन, रणनीति और आगे की चुनौती
झारखंड, बिहार और ओडिशा बेल्ट का कुख्यात इनामी माओवादी कमांडर मिसिर बेसरा एक बार फिर सुरक्षा बलों की घेराबंदी तोड़कर फरार हो गया है। सारंडा में चल रहे बड़े ऑपरेशन के बावजूद वह कोल्हान क्षेत्र में पहुंच गया, जिसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने अभियान का दायरा बढ़ा दिया है।

झारखंड, बिहार और ओडिशा बेल्ट का सबसे बड़ा सक्रिय माओवादी कमांडर और एक करोड़ रुपये का इनामी नक्सली मिसिर बेसरा एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन गया है. पिछले कई सप्ताह से सारंडा के घने जंगलों में केंद्रीय सुरक्षा बल, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस का संयुक्त अभियान चल रहा था. सुरक्षा एजेंसियों का दावा था कि उन्होंने मिसिर बेसरा और उसके साथियों को सीमित इलाके में घेर लिया है. इतना ही नहीं, नक्सलियों तक पहुंचने वाली रसद और अन्य जरूरी आपूर्ति भी काफी हद तक बाधित कर दी गई थी. इसके बावजूद मिसिर बेसरा सुरक्षा घेराबंदी तोड़कर सारंडा से निकलने और कोल्हान के जंगलों तक पहुंचने में सफल रहा. अब उसके नए ठिकाने की जानकारी मिलने के बाद सुरक्षा बलों ने अभियान का दायरा सारंडा से आगे बढ़ाकर कोल्हान और दलमा क्षेत्र तक विस्तारित कर दिया है.
जानकारी के अनुसार, सुरक्षा बलों ने पिछले महीने चाईबासा के सारंडा जंगल के जराइकेला, गोइलकेरा और बलिबा इलाके के बीच बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाया था. यह इलाका पहाड़ी, दुर्गम और घने जंगलों से घिरा हुआ है. जगह-जगह बारूदी सुरंगों का खतरा होने के कारण सुरक्षा बलों की आवाजाही आसान नहीं थी. इसी चुनौती का फायदा उठाते हुए मिसिर बेसरा ने अपने पूरे दस्ते के साथ एक साथ निकलने के बजाय छोटे-छोटे समूहों में बंटकर घेरा तोड़ने की रणनीति अपनाई. बताया जा रहा है कि वह सबसे पहले केवल एक सहयोगी के साथ इलाके से बाहर निकला, जबकि उसके अन्य साथी अलग-अलग रास्तों से धीरे-धीरे नए ठिकानों तक पहुंचे. यही वजह रही कि महीनों की घेराबंदी के बावजूद वह सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ से बाहर निकल गया.
हालांकि सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि इस घटना को केवल नक्सलियों की बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. उनके अनुसार मिसिर बेसरा पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुका है. कभी बड़े नेटवर्क और मजबूत कैडर के साथ सक्रिय रहने वाला यह माओवादी संगठन अब छोटे-छोटे समूहों में बंट गया है. पुलिस का कहना है कि उसका नेटवर्क फिलहाल तीन हिस्सों में विभाजित है. पहला कोर ग्रुप है, जिसमें मिसिर बेसरा और उसके सबसे करीबी सहयोगी शामिल हैं. दूसरा समूह सारंडा और ओडिशा सीमा के जंगलों में सक्रिय है, जबकि तीसरा समूह पोड़ाहाट क्षेत्र में मौजूद बताया जा रहा है. लगातार अभियान, रसद आपूर्ति बाधित होने, ठिकानों के ध्वस्त होने और नए कैडरों की कमी ने संगठन की क्षमता को पहले की तुलना में काफी सीमित कर दिया है.
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर बेसरा अब बड़े हमलों की योजना बनाने के बजाय लगातार सुरक्षित ठिकाने तलाशने और गिरफ्तारी से बचने की कोशिश कर रहा है. कोल्हान और दलमा के जंगल उसके लिए नए नहीं हैं. दबाव बढ़ने पर वह पहले भी इन इलाकों का इस्तेमाल शरणस्थली के रूप में करता रहा है. घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां और सीमावर्ती इलाकों की भौगोलिक स्थिति ऐसे क्षेत्रों को नक्सलियों के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल बनाती है. हालांकि पुलिस का कहना है कि अब उसकी गतिविधियों पर नजर रखना पहले की तुलना में आसान होगा, क्योंकि वह सारंडा के उस हिस्से से बाहर निकल चुका है जहां बारूदी सुरंगों और दुर्गम भूभाग के कारण कार्रवाई बेहद चुनौतीपूर्ण थी.
अब सुरक्षा बलों ने अभियान को और व्यापक कर दिया है. सारंडा से लेकर कोल्हान और दलमा तक कई जिलों की पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बल और विशेष इकाइयां संयुक्त रूप से अभियान चला रही हैं. ड्रोन निगरानी, ग्राउंड इंटेलिजेंस और तकनीकी सूचनाओं के आधार पर नए सिरे से घेराबंदी की जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि मानसून के दौरान लगातार जंगलों में छिपे रहना, रसद जुटाना और संपर्क बनाए रखना नक्सलियों के लिए पहले से ज्यादा कठिन होगा. ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों को उम्मीद है कि लगातार बढ़ते दबाव के बीच मिसिर बेसरा के सामने विकल्प लगातार सीमित होते जाएंगे. फिलहाल ऑपरेशन जारी है और सुरक्षा एजेंसियां उसके नए ठिकानों की पुष्टि कर आगे की कार्रवाई में जुटी हुई हैं.

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