पुरुलिया महाजुटान के बाद कुड़मी ST मांग पर गरमाई बहस, रमा खलखो ने बताई अपनी राय
“पुरुलिया में कुर्मी समाज के बड़े महाजुटान के बाद झारखंड में कुर्मी को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग फिर चर्चा में है. इसी मुद्दे पर कांग्रेस से जुड़ी रमा खलखो ने आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों का जिक्र करते हुए अपनी राय रखी.”

झारखंड में कुड़मी समाज को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने की मांग एक बार फिर चर्चा में है. पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में हुए कुड़मी समाज के बड़े महाजुटान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है. कार्यक्रम में कुड़मी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के साथ कुड़मी समाज को एसटी दर्जा देने की मांग भी उठी. इस आयोजन में झारखंड के कई नेताओं की मौजूदगी ने भी इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया. इसी मुद्दे पर कांग्रेस से जुड़ी रमा खलखो ने अपनी राय रखते हुए आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान, परंपरा और संवैधानिक अधिकारों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि किसी भी समुदाय को अपनी मांग रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है लेकिन एसटी दर्जे का विषय ऐतिहासिक और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा है. उन्होंने आदिवासी और अन्य समुदायों के बीच सामाजिक मेल-जोल को स्वीकार करते हुए कहा कि आपसी भाईचारे और संवैधानिक पहचान को अलग-अलग संदर्भ में देखना जरूरी है.
पुरुलिया महाजुटान के बाद फिर गरमाया मुद्दा
पुरुलिया में हुए महाजुटान में बड़ी संख्या में कुड़मी समाज के लोग जुटे. कार्यक्रम में करम वृक्ष लगाए जाने और प्रकृति पूजा की परंपरा का उल्लेख करते हुए कुड़मी समाज की ओर से अपनी सांस्कृतिक पहचान को आदिवासी परंपराओं से जोड़ने की बात सामने आई. साथ ही कुर्माली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी दोहराई गई.
एसटी दर्जे की मांग पर रमा खलखो की राय
रमा खलखो ने कहा कि लोकतंत्र में हर समुदाय को अपनी मांग रखने और आंदोलन करने का अधिकार है. हालांकि, उनके अनुसार किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने का सवाल केवल प्रकृति पूजा या खेती-किसानी से जुड़ा होने के आधार पर तय नहीं किया जा सकता. इसके लिए ऐतिहासिक, सामाजिक और संवैधानिक पहलुओं को देखना जरूरी होगा.
आदिवासी समाज की परंपरा और पहचान का जिक्र
उन्होंने आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए करम, सरहुल, पाहन व्यवस्था और अखड़ा जैसी परंपराओं की बात कही. उनका कहना था कि झारखंड के अलग-अलग समुदायों के बीच पर्व-त्योहारों में भागीदारी और सामाजिक मेल-जोल पुरानी परंपरा है, लेकिन इससे संवैधानिक श्रेणी स्वतः नहीं बदलती.
राजनीतिक समर्थन और व्यक्तिगत बयान में अंतर
कुड़मी समाज की एसटी मांग के समर्थन में अलग-अलग नेताओं के बयानों का भी जिक्र हुआ. रमा खलखो ने कहा कि किसी नेता का व्यक्तिगत बयान और किसी राजनीतिक दल का आधिकारिक रुख अलग-अलग विषय है. उनके अनुसार उनकी जानकारी में पार्टी की ओर से इस मांग पर स्पष्ट आधिकारिक समर्थन उनके सामने नहीं आया है.
जनगणना, आरक्षण और हिस्सेदारी की मांग
रमा खलखो ने आदिवासी और ओबीसी समुदायों की जनगणना में सही संख्या दर्ज करने की जरूरत पर भी जोर दिया. उन्होंने आदिवासी पहचान के लिए अलग कोड और ओबीसी की संख्या स्पष्ट करने जैसी मांगों का उल्लेख किया. उनका कहना है कि सामाजिक समूहों की वास्तविक संख्या सामने आने से प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी से जुड़े सवालों पर बेहतर तरीके से चर्चा हो सकती है.



