अमित शाह का UCC प्लान, झारखंड में बढ़ेगी सियासी हलचल? घुसपैठ के मुद्दे के साथ 2029 में क्या होगा BJP का नया गेम
“अमित शाह के 2029 से पहले NDA शासित 21 राज्यों में UCC लागू करने के दावे ने झारखंड की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। 2024 में बीजेपी ने UCC, बांग्लादेशी घुसपैठ, आदिवासी पहचान और जमीन के मुद्दे को चुनावी नैरेटिव बनाया था, जबकि हेमंत सोरेन ने UCC और NRC का विरोध किया था। ”

Ranchi: अमित शाह ने 2029 से पहले BJP-NDA शासित सभी 21 राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का दावा किया है. लेकिन इस ऐलान का सबसे दिलचस्प राजनीतिक असर उन राज्यों में दिख सकता है, जहां बीजेपी सत्ता में नहीं है और जहां UCC पहले से ही चुनावी मुद्दा रह चुका है. झारखंड भी उनमें से एक है. यहां 2024 के विधानसभा चुनाव में UCC के साथ बांग्लादेशी घुसपैठ, आदिवासी पहचान और जमीन का मुद्दा बीजेपी के बड़े चुनावी नैरेटिव का हिस्सा था. दूसरी तरफ हेमंत सोरेन ने साफ तौर पर UCC और NRC के खिलाफ मोर्चा खोला था. ऐसे में अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि UCC झारखंड में लागू होगा या नहीं. बड़ा सवाल यह है कि अगर 2029 से पहले देश के NDA शासित राज्यों में UCC की रफ्तार बढ़ती है, तो झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार इसका सामना कैसे करेगी और इसका राजनीतिक फायदा आखिर किसे मिलेगा—हेमंत सोरेन को या बीजेपी को?
झारखंड में पहले ही भिड़ चुके हैं शाह और हेमंत
झारखंड में UCC कोई नया मुद्दा नहीं है. 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले अमित शाह ने बीजेपी का संकल्प पत्र जारी करते हुए झारखंड में सरकार बनने पर UCC लागू करने का वादा किया था. साथ ही उन्होंने कहा था कि आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा जाएगा, ताकि उनकी परंपरा और अधिकार प्रभावित न हों. शाह के इस ऐलान पर तत्कालीन चुनावी माहौल में हेमंत सोरेन ने पलटवार किया था. उन्होंने कहा था कि झारखंड में न UCC और न NRC को अनुमति दी जाएगी. यानी उस वक्त से ही UCC का सवाल सीधे-सीधे बीजेपी बनाम हेमंत सोरेन की राजनीतिक लड़ाई में बदल चुका था. अब अमित शाह का 2029 से पहले 21 NDA राज्यों में UCC लागू करने का नया दावा इस पुराने विवाद को फिर जिंदा कर सकता है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार झारखंड में हेमंत सोरेन सरकार सत्ता में है और बीजेपी विपक्ष में.
अब गेंद हेमंत सरकार के पाले में?
यहीं से झारखंड की असली कहानी शुरू होती है. अगर केंद्र और बीजेपी शासित राज्यों में UCC को तेजी से आगे बढ़ाया जाता है, तो झारखंड में बीजेपी सरकार पर सवाल उठाएगी कि दूसरे राज्यों में कानून लागू हो रहा है, लेकिन झारखंड में क्यों नहीं. हेमंत सोरेन सरकार के सामने दूसरी तरफ आदिवासी समाज का सवाल होगा. बीजेपी खुद पहले कह चुकी है कि आदिवासियों को UCC से बाहर रखा जाएगा. इसलिए झारखंड सरकार के लिए बहस सिर्फ धार्मिक या व्यक्तिगत कानूनों की नहीं होगी, बल्कि यह बताने की भी होगी कि UCC का आदिवासी customary law, सामाजिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा. यही वह जगह है जहां हेमंत सोरेन सरकार बीजेपी के नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश कर सकती है. लेकिन बीजेपी के पास भी पलटवार का रास्ता होगा—कि आदिवासियों को बाहर रखते हुए बाकी नागरिकों के लिए समान कानून का विरोध क्यों?
घुसपैठ का मुद्दा फिर UCC के साथ जुड़ेगा?
झारखंड की राजनीति में UCC को अकेले देखना मुश्किल है. 2024 के चुनाव में बीजेपी ने इसे बांग्लादेशी घुसपैठ, आदिवासी जमीन और संथाल परगना में बदलती जनसांख्यिकी के मुद्दे के साथ जोड़ा था. अमित शाह ने उस दौरान घुसपैठियों की पहचान और आदिवासी जमीन वापस लेने की बात भी उठाई थी. अब 2026 में उन्होंने एक बार फिर अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें बाहर भेजने का संकल्प दोहराया है. यानी बीजेपी के लिए आगे झारखंड में संभावित नैरेटिव सिर्फ UCC बनाम नो-UCC नहीं हो सकता. इसके साथ घुसपैठ, जमीन, आदिवासी पहचान और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसे मुद्दे भी जोड़े जा सकते हैं. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात है—जनगणना में किसी जिले की मुस्लिम आबादी बढ़ना अपने आप में बांग्लादेशी घुसपैठ का प्रमाण नहीं है. इसलिए इस मुद्दे पर राजनीतिक आरोप और आधिकारिक रूप से साबित तथ्य अलग-अलग रखने होंगे.
संथाल परगना फिर बनेगा सबसे बड़ा मैदान?
झारखंड में इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील राजनीतिक क्षेत्र संथाल परगना है. यही वह इलाका है जहां बीजेपी ने 2024 में घुसपैठ का मुद्दा सबसे आक्रामक तरीके से उठाया था और जहां हेमंत सोरेन की JMM की मजबूत राजनीतिक पकड़ रही है. 2024 में बीजेपी ने संथाल परगना की 17 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन केवल जरमुंडी सीट जीत सकी. यानी घुसपैठ का मुद्दा उठाने के बावजूद बीजेपी को उस चुनाव में संथाल में अपेक्षित राजनीतिक सफलता नहीं मिली. यही आंकड़ा अब बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा करता है—क्या 2029 तक UCC और घुसपैठ का मुद्दा उसी तरीके से उठाने पर राजनीतिक समीकरण बदलेंगे या हेमंत सोरेन फिर इस नैरेटिव को रोक पाएंगे?
हेमंत सोरेन के लिए यह सिर्फ कानून का सवाल नहीं
हेमंत सोरेन सरकार के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि बीजेपी UCC को केवल कानून के रूप में नहीं, बल्कि अपने बड़े वैचारिक एजेंडे के हिस्से के तौर पर पेश कर रही है. अगर झारखंड सरकार इसका विरोध करती है तो बीजेपी इसे समान कानून के विरोध के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है. अगर सरकार किसी सीमित या अलग मॉडल पर विचार करती है, तो उसे अपने आदिवासी वोटबैंक और सहयोगी दलों को भी जवाब देना होगा. हेमंत सोरेन के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही होगा कि वह UCC के मुद्दे को केवल बीजेपी विरोध के रूप में लड़ते हैं या इसे आदिवासी अधिकार, संविधान और झारखंड की विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था के सवाल से जोड़कर बड़ा नैरेटिव बनाते हैं.
केंद्र जीतेगा या झारखंड सरकार?
यहीं इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है. एक तरफ केंद्र और बीजेपी के पास राष्ट्रीय स्तर का UCC एजेंडा है. अमित शाह ने इसकी समयसीमा भी 2029 से पहले की रख दी है. दूसरी तरफ झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार है, जिसने पहले ही UCC और NRC के खिलाफ राजनीतिक रुख अपनाया था. ऐसे में आने वाले वर्षों में यह मामला सिर्फ कानून बनाने का नहीं, बल्कि केंद्र की राजनीतिक लाइन बनाम झारखंड सरकार की राजनीतिक लाइन का मुकाबला बन सकता है. बीजेपी के लिए सवाल होगा कि क्या वह UCC, घुसपैठ और आदिवासी जमीन के मुद्दे को मिलाकर 2029 से पहले झारखंड में अपना खोया आधार वापस ला सकती है. हेमंत सोरेन के लिए सवाल उल्टा है—क्या वह इस पूरे नैरेटिव को आदिवासी अधिकार, स्थानीय पहचान और राज्य के अधिकारों की लड़ाई में बदलकर अपनी पकड़ और मजबूत कर सकते हैं?
2029 में होगा असली फैसला
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि झारखंड में UCC कब और किस रूप में लागू होगा. अमित शाह का मौजूदा बयान 21 NDA शासित राज्यों को लेकर है, जबकि झारखंड फिलहाल उस सूची में नहीं है. इसलिए इसे झारखंड में तत्काल UCC लागू करने की घोषणा मानना सही नहीं होगा. लेकिन राजनीतिक संदेश साफ है—2029 से पहले UCC बीजेपी के बड़े चुनावी एजेंडे में रहने वाला है. और झारखंड में इसका असर सिर्फ कानून की बहस तक सीमित नहीं रहेगा. यहां इसका मुकाबला हेमंत सोरेन की राजनीति, आदिवासी पहचान, संथाल परगना, घुसपैठ और जमीन के सवाल से होगा. इसलिए आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि “झारखंड में UCC आएगा या नहीं?” असल सवाल होगा—UCC की इस लड़ाई में झारखंड की जनता किसके साथ खड़ी होगी—हेमंत सोरेन की सरकार के साथ या बीजेपी के उस नैरेटिव के साथ, जिसे अमित शाह 2029 से पहले पूरे देश में आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं?



