पोटका में आखिर क्यों नहीं थम रहा ब्रेन मलेरिया? एक और मासूम की मौत ने फिर खड़े किए बड़े सवाल
12 साल की अनिता सरदार की मौत ने फिर याद दिलाया कि पोटका में ब्रेन मलेरिया अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि प्रशासनिक चुनौती बन चुका है. सवाल यह है कि जब जांच, फॉगिंग, सर्वे और अधिकारियों के दौरे लगातार हो रहे हैं, तब भी संक्रमण और मौतें क्यों नहीं रुक रहीं.

Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम के पोटका प्रखंड में ब्रेन मलेरिया का संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है. नारदा गांव की 12 वर्षीय अनिता सरदार की मौत ने एक बार फिर पूरे इलाके में दहशत और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल दोनों खड़े कर दिए हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस घर में बेटी की मौत हुई, उसी परिवार का पांच वर्षीय बेटा भी ब्रेन मलेरिया से संक्रमित मिला और उसे गंभीर हालत में एमजीएम अस्पताल रेफर करना पड़ा. स्वास्थ्य विभाग लगातार जांच, फॉगिंग और जागरूकता अभियान चलाने का दावा कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद संक्रमण और मौतों का सिलसिला जारी है. जिले में अब तक ब्रेन मलेरिया से 10 लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन बीमारी की रफ्तार से पीछे चल रहा है, या फिर जमीनी स्तर पर अब भी ऐसी खामियां हैं, जिनकी वजह से लोगों की जान जा रही है?
एक और मौत ने बढ़ा दी चिंता
नारदा गांव की 12 वर्षीय अनिता सरदार की मौत को परिजन पहले सामान्य बुखार समझते रहे. बीमारी की गंभीरता तब तक सामने नहीं आई, जब तक उसकी हालत बिगड़ नहीं गई. अब आशंका जताई जा रही है कि उसकी मौत ब्रेन मलेरिया से हुई. घटना के बाद जब स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव पहुंची तो जांच में उसके पांच वर्षीय भाई अजय सरदार में भी ब्रेन मलेरिया की पुष्टि हुई और उसे तत्काल एमजीएम अस्पताल भेजना पड़ा. यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि ग्रामीण इलाकों में अब भी शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर इलाज सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.
आंकड़े बता रहे हैं कि खतरा अभी टला नहीं है
स्वास्थ्य विभाग की ताजा रिपोर्ट स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करती है. एक ही दिन में पूर्वी सिंहभूम जिले में 13,143 लोगों की जांच की गई, जिसमें 86 नए मलेरिया मरीज मिले. इनमें सबसे अधिक 29 संक्रमित अकेले पोटका प्रखंड से मिले हैं. इसके अलावा डुमरिया, घाटशिला और मुसाबनी भी संक्रमण की चपेट में हैं. जिले में अब तक ब्रेन मलेरिया से 10 लोगों की मौत हो चुकी है. यानी अभियान चलने के बावजूद संक्रमण की चेन पूरी तरह नहीं टूट पाई है.
प्रशासन सक्रिय, लेकिन क्या जमीनी असर दिख रहा?
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि प्रभावित गांवों में लगातार डोर-टू-डोर सर्वे, ब्लड जांच, फॉगिंग, दवा वितरण और जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं. एनएचएम के मिशन डायरेक्टर शशि प्रकाश झा ने भी पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां का दौरा कर हालात की समीक्षा की. इससे पहले स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही को लेकर कुछ जिम्मेदार कर्मियों पर कार्रवाई भी की गई थी. बावजूद इसके लगातार सामने आ रही मौतें यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या सरकारी प्रयास समय पर गांवों तक प्रभावी तरीके से पहुंच पा रहे हैं? यदि अभियान पूरी क्षमता से चल रहे हैं, तो फिर गंभीर मरीज इलाज मिलने से पहले क्यों दम तोड़ रहे हैं?
बीमारी से बड़ी चुनौती जागरूकता और शुरुआती इलाज की
स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार यह बताते रहे हैं कि ब्रेन मलेरिया में शुरुआती 24 से 48 घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. तेज बुखार, ठंड लगना, उल्टी, बेहोशी या लगातार कमजोरी जैसे लक्षण दिखते ही जांच और इलाज शुरू हो जाना चाहिए. लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी कई परिवार इसे सामान्य वायरल बुखार मानकर घरेलू इलाज या देरी से अस्पताल पहुंचते हैं. अनिता सरदार का मामला भी इसी गंभीर चुनौती की ओर संकेत करता है. यदि समय पर जांच होती, तो शायद स्थिति अलग हो सकती थी.
अब सिर्फ सर्वे नहीं, भरोसा जीतने की भी जरूरत
पोटका की स्थिति यह संकेत दे रही है कि केवल आंकड़े जारी करना या समीक्षा बैठकें करना पर्याप्त नहीं होगा. जरूरत इस बात की है कि हर संवेदनशील गांव तक स्वास्थ्य टीम नियमित पहुंचे, लोगों में शुरुआती लक्षणों को लेकर जागरूकता बढ़े और संदिग्ध मरीजों को तुरंत अस्पताल तक पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हो. क्योंकि हर नई मौत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं होती, बल्कि यह बताती है कि व्यवस्था की किसी न किसी कड़ी में अभी भी कमी मौजूद है. अगर समय रहते संक्रमण की चेन नहीं तोड़ी गई, तो पोटका में ब्रेन मलेरिया का यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है.

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