VIDEO: रोटी छोटी थी, सवाल बहुत बड़ा... आखिर भूख से पहले पहचान क्यों?
उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का एक वीडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. वीडियो में एक भंडारे के दौरान प्रसाद लेने पहुंचे एक व्यक्ति से पहले धार्मिक नारा लगाने को कहा जाता है और उसके बाद ही उसे प्रसाद दिया जाता है.

Uttar Pradesh: उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर का एक वीडियो पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. वीडियो में एक भंडारे के दौरान प्रसाद लेने पहुंचे एक व्यक्ति से पहले धार्मिक नारा लगाने को कहा जाता है और उसके बाद ही उसे प्रसाद दिया जाता है. वीडियो में मौजूद लोग हंसते नजर आते हैं और वह व्यक्ति भी मुस्कुराते हुए नारा लगाता दिखाई देता है. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या किसी की भूख, उसकी आस्था या पहचान की मोहताज होनी चाहिए? भंडारा तो उस परंपरा का नाम है जहां देने वाला यह नहीं पूछता कि सामने वाला कौन है. यही वजह है कि यह वीडियो सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़े उस सवाल की तरह है, जिसमें इंसानियत और दिखावे के बीच की दूरी साफ नजर आती है.
भंडारे की परंपरा और बदलता सामाजिक व्यवहार
जानकारी के मुताबिक यह वीडियो सिद्धार्थनगर जिले के डुमरियागंज क्षेत्र का बताया जा रहा है. भंडारे के दौरान प्रसाद वितरण कर रहे भाजपा नेता लवकुश ओझा ने एक मुस्लिम व्यक्ति से कहा कि वह 'जय श्रीराम' बोले, तभी उसे प्रसाद मिलेगा. इसके बाद उस व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए नारा लगाया और उसे प्रसाद दे दिया गया. वीडियो में माहौल हल्का और हंसी-मजाक वाला दिखता है, लेकिन सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर बहस छिड़ गई है. कई लोग इसे सामान्य मजाक बता रहे हैं, वहीं कई लोगों का मानना है कि भोजन या प्रसाद जैसी चीजों को किसी की धार्मिक पहचान से जोड़ना हमारी सामाजिक परंपराओं की मूल भावना के खिलाफ है.
भूख का कोई धर्म नहीं होत
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में भंडारा, लंगर और सामूहिक भोजन हमेशा से बराबरी और सेवा का प्रतीक रहे हैं. यहां देने वाले का धर्म नहीं पूछा जाता और खाने वाले की पहचान मायने नहीं रखती. इसलिए जब किसी को भोजन देने से पहले उससे कोई नारा या पहचान जाहिर करने की अपेक्षा की जाती है, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रह जाता, बल्कि समाज के उस नजरिए का हो जाता है, जहां कभी-कभी इंसान से ज्यादा उसकी पहचान बड़ी हो जाती है. यह घटना हमें याद दिलाती है कि भूख सबसे बड़ी सच्चाई है और इंसानियत सबसे बड़ा धर्म. अगर किसी के चेहरे की मुस्कान के पीछे मजबूरी छिपी हो, तो हमें उस मुस्कान पर ताली नहीं, बल्कि अपने समाज के व्यवहार पर सवाल जरूर उठाना चाहिए.


