सुप्रीम कोर्ट का बिहार सरकार से सवाल: बिना विधायक या MLC बने अब तक मंत्री कैसे हैं दीपक प्रकाश?
“सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से पूछा है कि पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर किस संवैधानिक आधार पर बने हुए हैं. मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी, जिस पर सभी की नजरें टिकी हैं.”

Deepak Prakash: बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की मंत्री पद पर नियुक्ति अब सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे में आ गई है. गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने बिहार सरकार से पूछा कि जब दीपक प्रकाश न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के, तब वे छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर किस संवैधानिक आधार पर बने हुए हैं. अदालत ने इस मामले को पूरी तरह संविधान और कानून से जुड़ा बताते हुए राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है. इस सुनवाई के बाद दीपक प्रकाश के मंत्री पद और बिहार सरकार की संवैधानिक स्थिति पर नए सवाल खड़े हो गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा स्पष्ट जवाब
सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हुई. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि दीपक प्रकाश को मंत्री बने छह महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन वे अब तक न विधायक बने हैं और न ही विधान परिषद के सदस्य. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी प्रश्न है. अदालत ने बिहार सरकार से पूछा कि जब कोई व्यक्ति किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, तब उसे छह महीने की निर्धारित अवधि के बाद भी मंत्री पद पर बनाए रखने का संवैधानिक आधार क्या है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार को इस प्रश्न का विस्तृत जवाब देना होगा. सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी और न्यायालय के निर्देशों का पालन किया जाएगा.
जनहित याचिका और अनुच्छेद 164(4) का मुद्दा
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता और व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिहार में नई सरकार बनने के बाद दीपक प्रकाश को दोबारा पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया गया, जबकि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार कोई भी गैर-विधायक अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है. इस अवधि के भीतर उसे विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना अनिवार्य होता है. यदि ऐसा नहीं होता, तो संवैधानिक रूप से मंत्री पद पर बने रहने का अधिकार समाप्त हो जाता है. इसी प्रावधान की व्याख्या और वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से जवाब मांगा है, जिससे यह मामला संवैधानिक बहस का विषय बन गया है.
बिना चुनाव लड़े दो बार बने मंत्री
दीपक प्रकाश राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे हैं. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में पंचायती राज मंत्री बनाया गया था. उस समय वे न तो विधानसभा चुनाव लड़े थे और न ही किसी सदन के सदस्य थे. इसके बावजूद उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई. बाद में सरकार में बदलाव होने के बाद सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में भी उन्हें दोबारा पंचायती राज विभाग सौंप दिया गया. हालांकि, दोनों कार्यकालों के दौरान वे अब तक विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं बन सके. इसी कारण उनकी नियुक्ति को लेकर संवैधानिक सवाल खड़े हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया. अब अदालत के समक्ष यह प्रमुख प्रश्न है कि क्या ऐसी परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का मंत्री पद पर बने रहना संविधान के अनुरूप है.
27 अगस्त की सुनवाई पर टिकी निगाहें
अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी, जिस पर बिहार की राजनीति और कानूनी विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं. यदि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 164(4) की सख्त व्याख्या करता है, तो दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर असर पड़ सकता है. वहीं, यदि राज्य सरकार अदालत के समक्ष कोई संवैधानिक या कानूनी आधार प्रस्तुत करती है, तो मामले की दिशा बदल सकती है. यह फैसला केवल एक मंत्री की नियुक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में गैर-विधायकों को मंत्री बनाए जाने से जुड़े मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है. फिलहाल सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और बिहार सरकार के जवाब पर टिकी हुई हैं, जिससे इस संवैधानिक विवाद की तस्वीर साफ हो सकेगी.


