रघुवर दास ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से की मुलाकात, ओलचिकी लिपि में संताली पुस्तकों के प्रकाशन की मांग
रघुवर दास ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी से मुलाकात कर संताली भाषा की पाठ्य पुस्तकों और शैक्षणिक सामग्री को ओलचिकी लिपि में प्रकाशित करने की मांग की. उन्होंने इस संबंध में ज्ञापन सौंपते हुए संताली की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने पर जोर दिया.

नई दिल्ली: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी से मुलाकात कर संताली भाषा और उसकी मूल लिपि ओलचिकी को लेकर महत्वपूर्ण मांग रखी. इस दौरान उन्होंने शिक्षा मंत्रालय से संबंधित पाठ्य पुस्तकों, संदर्भ सामग्री और अन्य शैक्षणिक संसाधनों को ओलचिकी लिपि में तैयार और प्रकाशित करने का आग्रह किया. रघुवर दास ने इस संबंध में केंद्रीय मंत्री को एक ज्ञापन भी सौंपा. उन्होंने कहा कि संताली भाषा को देवनागरी लिपि में प्रकाशित करने के बजाय उसकी स्थापित ओलचिकी लिपि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. पूर्व मुख्यमंत्री ने ओलचिकी के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका उपयोग देश के कई राज्यों के अलावा नेपाल और बांग्लादेश में भी किया जाता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि शिक्षा मंत्री इस विषय पर सकारात्मक पहल करेंगे.
शिक्षा मंत्री को सौंपा ज्ञापन
रघुवर दास ने मुलाकात के दौरान केंद्रीय शिक्षा मंत्री के सामने संताली भाषा से जुड़ी अपनी मांग रखी. उन्होंने बताया कि शिक्षा मंत्रालय और उससे जुड़े संस्थानों की ओर से कई पाठ्य पुस्तकों और शैक्षणिक सामग्री का निर्माण किया जा रहा है. ऐसे में संताली भाषा की सामग्री को किस लिपि में प्रकाशित किया जाए, इस पर उन्होंने ओलचिकी को प्राथमिकता देने की मांग की.
ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष का किया जिक्र
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2025 में ओलचिकी लिपि की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए. उन्होंने इस दौरान हुए राष्ट्रीय स्तर के आयोजन का भी उल्लेख किया. उनके मुताबिक, इसी अवसर पर संताली में ओलचिकी लिपि के जरिए तैयार भारत के संविधान का भी लोकार्पण किया गया था.
संविधान की आठवीं अनुसूची में संताली भाषा
रघुवर दास ने संताली भाषा के संवैधानिक महत्व की ओर भी ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था. उनके अनुसार, संताली की अपनी विशिष्ट और वैज्ञानिक लिपि ओलचिकी है, इसलिए शैक्षणिक सामग्री में भी इसका इस्तेमाल होना चाहिए.
कई राज्यों में ओलचिकी के इस्तेमाल का दावा
रघुवर दास ने बताया कि झारखंड में संताल बहुल क्षेत्रों के कई रेलवे स्टेशनों और सरकारी कार्यालयों में ओलचिकी लिपि का इस्तेमाल किया गया है. उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कार और सरकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संताली भाषा के प्रयोग का भी जिक्र किया. उनका कहना है कि झारखंड के अलावा पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और असम सहित अन्य क्षेत्रों में भी ओलचिकी का इस्तेमाल होता है.
पाठ्य पुस्तकों में ओलचिकी को अनिवार्य करने की मांग
ज्ञापन के माध्यम से रघुवर दास ने शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी से जुड़े संस्थानों को संताली भाषा की पाठ्य पुस्तकों, शिक्षक मार्गदर्शिकाओं, संदर्भ सामग्री और डिजिटल संसाधनों को ओलचिकी लिपि में तैयार करने का निर्देश देने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि इससे संताली भाषी समाज की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी. रघुवर दास के अनुसार, केंद्रीय शिक्षा मंत्री के साथ इस मुद्दे पर बातचीत सकारात्मक रही.

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