आदिवासी एकता के मंच पर नेतृत्व की खींचतान? हेमंत सोरेन को बुलाने के खिलाफ थे बंधू तिर्की, ग्लैडसन डुंगडुंग का दावा
आदिवासी महाजुटान के बाद ग्लाइडसन डुंगडुंग ने बंधू तिर्की की भूमिका पर गंभीर आरोप लगाए. डुंगडुंग का दावा है कि रैली को कांग्रेस के रंग में ढाल दिया गया और हेमंत सोरेन को बुलाने का भी विरोध किया गया था.
Ranchi: झारखंड की आदिवासी राजनीति में शक्ति-संतुलन को लेकर एक नई बहस उभरती दिख रही है. आदिवासी एकता महाजुटान रैली को बंधू तिर्की जहां आदिवासी एकजुटता के प्रदर्शन के तौर पर पेश कर रहे हैं, वहीं आयोजन से जुड़े रहे ग्लैडसन डुंगडुंग के आरोपों ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं. डुंगडुंग का आरोप है कि आदिवासी एकता के नाम पर आयोजित रैली पर कांग्रेस का प्रभाव बढ़ गया और आयोजन को बंधू तिर्की की राजनीतिक छवि मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया गया. इससे भी अहम उनका दावा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रैली में मौजूदगी को लेकर है. डुंगडुंग के मुताबिक, एक बैठक में बंधू तिर्की ने हेमंत सोरेन को बुलाने का विरोध किया था. इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और बंधू तिर्की का पक्ष भी सामने आना बाकी है. ऐसे में रैली अब आदिवासी एकता के साथ-साथ नेतृत्व की राजनीति का भी सवाल बन गई है.
रैली के बाद उठे सवाल, कांग्रेस के प्रभाव का आरोप
आदिवासी एकता महाजुटान रैली का घोषित मकसद आदिवासी समाज को एक मंच पर लाना था. बंधू तिर्की ने इसे आदिवासी एकता और शक्ति प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया. लेकिन रैली में अहम भूमिका निभाने वाले ग्लाइडसन डुंगडुंग अब इसके आयोजन और राजनीतिक स्वरूप पर सवाल उठा रहे हैं. डुंगडुंग का आरोप है कि रैली के जरिए कांग्रेस ने आयोजन पर अपना प्रभाव कायम कर लिया. उनका दावा है कि आदिवासी समाज के लोगों को एक उद्देश्य बताकर रैली में जोड़ा गया, लेकिन बाद में आयोजन को कांग्रेस का रंग देने की कोशिश हुई. उनके मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में बंधू तिर्की की राजनीतिक भूमिका और उनकी छवि को मजबूत करने की कोशिश भी दिखाई दी. यह आरोप महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि झारखंड में आदिवासी राजनीति पहले से ही कई स्तरों पर नेतृत्व और प्रतिनिधित्व के सवालों से गुजर रही है. ऐसे में किसी बड़े आदिवासी मंच का स्वरूप और उसका राजनीतिक इस्तेमाल अपने आप में अहम हो जाता है.
हेमंत सोरेन की गैरमौजूदगी ने बढ़ाई राजनीतिक चर्चा
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की रैली में गैरमौजूदगी है. ग्लैडसन डुंगडुंग का दावा है कि हेमंत सोरेन को रैली में बुलाने को लेकर हुई बैठक में बंधू तिर्की ने इसका विरोध किया था. हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. यदि यह दावा सही साबित होता है, तो विवाद केवल रैली के आयोजन तक सीमित नहीं रहेगा. इसके पीछे झारखंड की आदिवासी राजनीति में नेतृत्व की प्राथमिकताओं और राजनीतिक प्रभाव के सवाल भी जुड़ जाएंगे. हेमंत सोरेन राज्य की आदिवासी राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हैं. ऐसे में बंधू तिर्की के नेतृत्व में आयोजित किसी बड़े आदिवासी जुटान में उनकी गैरमौजूदगी को महज संयोग मानना या इसके पीछे राजनीतिक संदेश देखना—दोनों ही अपने-अपने मायने रखते हैं.
क्या आदिवासी राजनीति में बन रहा है नया शक्ति-संतुलन?
यही वह बिंदु है जहां यह विवाद एक सामान्य रैली के आयोजन से आगे निकलकर राजनीतिक विश्लेषण का विषय बन जाता है. क्या बंधू तिर्की आदिवासी राजनीति में अपनी अलग और बड़ी पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं? क्या महाजुटान के जरिए एक ऐसा राजनीतिक मंच तैयार करने की कोशिश हुई, जिसमें मौजूदा आदिवासी नेतृत्व से अलग शक्ति केंद्र दिखाई दे? दूसरी तरफ, बीजेपी पहले ही रैली की फंडिंग और राजनीतिक उद्देश्य को लेकर सवाल उठा रही है. अब आयोजन से जुड़े व्यक्ति के आरोपों ने विवाद को एक और आयाम दे दिया है.



