EPFO पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिवालिया कंपनी के नए मालिक को ब्याज और जुर्माना नहीं देना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने EPFO और IBC से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि दिवालिया प्रक्रिया (CIRP) शुरू होने से पहले यदि ब्याज और जुर्माने की राशि अंतिम रूप से तय नहीं हुई थी, तो कंपनी का नया मालिक उसका भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया (CIRP) शुरू होने से पहले EPFO द्वारा ब्याज और जुर्माने की राशि अंतिम रूप से निर्धारित नहीं की गई थी, तो कंपनी का नया मालिक उस अतिरिक्त राशि का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं होगा. हालांकि, कर्मचारियों के पीएफ का मूल बकाया पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और उसका भुगतान करना अनिवार्य होगा. यह फैसला दिवालिया कंपनियों, निवेशकों और लाखों कर्मचारियों के लिए अहम माना जा रहा है.
क्या था पूरा मामला, क्यों पहुंचा सुप्रीम कोर्ट?
मामला एक ऐसी कंपनी से जुड़ा था जिसके खिलाफ 1 मई 2023 को कॉरपोरेट इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) शुरू हुई थी. इसके बाद EPFO ने कुल 22.49 लाख रुपये का दावा पेश किया. इस दावे में 73,120 रुपये मूल पीएफ बकाया, लगभग 9.32 लाख रुपये ब्याज और करीब 12.44 लाख रुपये हर्जाना शामिल था. हालांकि, कर्जदाताओं की समिति (CoC) द्वारा मंजूर किए गए रिजॉल्यूशन प्लान में केवल मूल पीएफ बकाया का भुगतान शामिल किया गया, जबकि ब्याज और जुर्माने की राशि को स्वीकार नहीं किया गया. अदालत ने पाया कि ब्याज और हर्जाने से संबंधित कार्रवाई CIRP शुरू होने के बाद आरंभ हुई थी, इसलिए उस समय तक यह देनदारी अंतिम रूप से तय नहीं हुई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि किसी भी नए निवेशक या खरीदार को यह पहले से स्पष्ट होना चाहिए कि कंपनी पर कुल कितनी देनदारी है. यदि दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के बाद नई या अनिश्चित देनदारियां जोड़ी जाएंगी, तो कोई भी निवेशक ऐसी कंपनी को खरीदने या पुनर्जीवित करने में रुचि नहीं दिखाएगा. अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारियों के पीएफ का मूल बकाया पूरी तरह संरक्षित रहेगा और उसका भुगतान अनिवार्य होगा. लेकिन यदि ब्याज (धारा 7Q) और जुर्माना (धारा 14B) दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से पहले अंतिम रूप से निर्धारित नहीं किए गए थे, तो उन्हें संभावित देनदारी माना जाएगा और नया मालिक उन्हें चुकाने के लिए बाध्य नहीं होगा.
IBC और EPFO के बीच संतुलन पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) का उद्देश्य समयबद्ध तरीके से आर्थिक रूप से संकटग्रस्त कंपनियों का पुनर्गठन करना है. यदि रिजॉल्यूशन प्लान स्वीकृत होने के बाद नई वित्तीय देनदारियां जोड़ी जाती रहेंगी, तो पूरी प्रक्रिया प्रभावित होगी और कंपनी को दोबारा खड़ा करना मुश्किल हो जाएगा. अदालत ने यह भी कहा कि कर्जदाताओं की समिति (CoC) चाहे तो संभावित देनदारियों के लिए रिजॉल्यूशन प्लान में प्रावधान कर सकती है, लेकिन ऐसा करना अनिवार्य नहीं है. इसलिए CIRP शुरू होने के बाद शुरू की गई ब्याज या पेनल्टी संबंधी कार्रवाई का प्रभाव नए रिजॉल्यूशन प्लान पर नहीं पड़ेगा.
कर्मचारियों के PF पर क्या होगा असर?
इस फैसले का सबसे बड़ा प्रभाव उन कर्मचारियों पर पड़ेगा जिनकी कंपनियां दिवालिया प्रक्रिया से गुजर रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मचारियों के पीएफ का मूल पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और उसका भुगतान हर हाल में किया जाएगा. यानी कर्मचारियों के मूल पीएफ पर किसी तरह का खतरा नहीं है. हालांकि, यदि कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से पहले EPFO ने ब्याज और जुर्माने की राशि का अंतिम निर्धारण नहीं किया था, तो नया मालिक उन अतिरिक्त देनदारियों का भुगतान करने से इनकार कर सकता है. इससे कर्मचारियों के मूल पीएफ अधिकार सुरक्षित रहते हैं, जबकि नए निवेशकों को अनिश्चित वित्तीय बोझ से राहत मिलती है.

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