Video: आदिवासी कौन है? सरना, सनातनी या ईसाई... झारखंड में पहचान पर महासंग्राम
झारखंड में सरना, सनातन, ईसाई पहचान और डिलिस्टिंग को लेकर बहस तेज हो गई है. चंपई सोरेन के बयान के बाद आदिवासी समाज के भीतर धर्मांतरण, आरक्षण, संवैधानिक अधिकार और सांस्कृतिक पहचान पर नए सवाल खड़े हो गए हैं. क्या यह आदिवासी अस्मिता बचाने की लड़ाई है या समाज के भीतर बढ़ती वैचारिक दरार?

झारखंड में इन दिनों सबसे बड़ी राजनीतिक बहस चुनाव, गठबंधन या सरकार नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान को लेकर चल रही है. सवाल यह है कि आदिवासी कौन है? वह जो सरना परंपरा का पालन करता है, वह जो खुद को सनातन संस्कृति से जुड़ा मानता है, या फिर वह जिसने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है लेकिन अपनी जनजातीय पहचान को बरकरार मानता है? यह बहस नई नहीं है, लेकिन पहली बार इतनी तीखी और व्यापक हो गई है कि आदिवासी समाज के भीतर ही वैचारिक खेमे बनते दिखाई दे रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के हालिया बयान और डिलिस्टिंग की मांग ने इस विवाद को और तेज कर दिया है. सवाल अब केवल धर्म का नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार, आरक्षण और आदिवासी समाज के भविष्य का बन गया है.
क्या आदिवासी समाज के भीतर नई वैचारिक रेखाएं खिंच रही हैं?
झारखंड का आदिवासी समाज लंबे समय तक अपनी सांस्कृतिक विविधता के बावजूद एक साझा राजनीतिक और सामाजिक पहचान के साथ खड़ा दिखाई देता था. लेकिन हाल के वर्षों में सरना धर्म, धर्मांतरण, डिलिस्टिंग और आदिवासी अस्मिता जैसे मुद्दों ने समाज के भीतर नए वैचारिक विभाजन पैदा कर दिए हैं. एक ओर ऐसे नेता हैं जो मानते हैं कि धर्मांतरण आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक संरचना के लिए सबसे बड़ा खतरा है. दूसरी ओर ऐसे नेता और संगठन हैं जो इसे धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार बताते हुए डिलिस्टिंग की मांग को आदिवासी समाज को बांटने वाला एजेंडा मानते हैं. यही कारण है कि बहस अब गांवों से लेकर सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है.
चंपई सोरेन के बयान ने क्यों बढ़ा दी बहस?
पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने अपने विस्तृत बयान में दावा किया कि आदिवासी और मूलवासी समाज सदियों से साथ रहते आए हैं. गांवों में सरना स्थल भी रहे, मंदिर भी रहे, लेकिन इसके बावजूद आदिवासी समाज की अलग पहचान बनी रही. चंपई का तर्क है कि यदि हजारों वर्षों के सामाजिक सह-अस्तित्व के बावजूद आदिवासी अपनी पारंपरिक पहचान बनाए रख सकते हैं, तो पिछले लगभग 180 वर्षों में बड़े पैमाने पर हुए धर्मांतरण को केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं माना जा सकता. उन्होंने इसे आदिवासी संस्कृति और परंपरा के सामने चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया है. यहीं से धर्मांतरण और आदिवासी अस्तित्व की बहस एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में आ गई है.
डिलिस्टिंग की मांग क्या है और विवाद क्यों है?
डिलिस्टिंग का मुद्दा इस बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा है. इसके समर्थकों का तर्क है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति के आरक्षण और विशेष संवैधानिक सुविधाओं का लाभ नहीं मिलना चाहिए. उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक समुदाय का हिस्सा है और साथ ही एसटी आरक्षण का लाभ भी ले रहा है, तो इससे मूल आदिवासी समुदाय के अवसर प्रभावित हो सकते हैं. वहीं विरोधी पक्ष का तर्क है कि संविधान में अनुसूचित जनजाति की पहचान धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि जनजातीय मूल, सामाजिक स्थिति और ऐतिहासिक परिस्थितियों के आधार पर तय की गई है. इसलिए धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी की जनजातीय पहचान समाप्त नहीं हो सकती. यही वह बिंदु है जहां कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक तर्क एक-दूसरे से टकराते हैं.
बहस का केंद्र धर्म नहीं, पहचान और नेतृत्व भी है
यह विवाद केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है. इसके पीछे आदिवासी नेतृत्व और राजनीतिक प्रभाव की लड़ाई भी दिखाई देती है. अलग-अलग दलों और संगठनों के नेता खुद को आदिवासी हितों का वास्तविक प्रतिनिधि साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. एक पक्ष बिरसा मुंडा की विरासत की रक्षा की बात कर रहा है, तो दूसरा पक्ष संविधान और आदिवासी अधिकारों की रक्षा का दावा कर रहा है. इस कारण मुद्दा और अधिक भावनात्मक तथा राजनीतिक बनता जा रहा है.
सबसे बड़ा सवाल: समाज मजबूत होगा या और बंटेगा?
झारखंड में आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सरना और सनातन का संबंध क्या है, या डिलिस्टिंग होनी चाहिए या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या इस बहस से आदिवासी समाज अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर अधिक जागरूक और संगठित होगा, या फिर वैचारिक विभाजन और गहरा होगा.
इतिहास बताता है कि किसी भी समुदाय की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक विभाजन होता है. ऐसे में सरना, सनातन, ईसाई और डिलिस्टिंग की बहस झारखंड के आदिवासी समाज के लिए केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि उसके भविष्य और सामाजिक एकता की परीक्षा बनती जा रही है.

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