Video: प्रोजेक्ट भवन के बाहर JSSC-CGL सफल अभ्यर्थियों का धरना जारी, बारिश और रात में भी डटे; बोले- न्याय तक नहीं हटेंगे
JSSC CGL परीक्षा और परिणाम रद्द किए जाने के विरोध में सफल व नियुक्त अभ्यर्थियों का प्रोजेक्ट भवन के बाहर धरना बुधवार को भी जारी है. बारिश के बीच टेंट लगाकर बैठे अभ्यर्थी बोले- न्याय मिलने तक नहीं हटेंगे.


Ranchi: प्रोजेक्ट भवन के बाहर JSSC-CGL के सफल और नियुक्त अभ्यर्थियों का धरना मंगलवार से लगातार जारी है. सोमवार देर रात सरकार के परीक्षा रद्द करने के फैसले के बाद अभ्यर्थी सचिवालय के बाहर जुट गए थे. बुधवार को भी वे वहीं डटे हुए हैं. भारी बारिश के बावजूद अभ्यर्थी छाते और तिरपाल के सहारे धरना दे रहे हैं. अब धरना स्थल पर टेंट भी लगा दिया गया है. अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक सरकार उनका पक्ष नहीं सुनती और उन्हें न्याय नहीं मिलता, वे यहां से नहीं हटेंगे. “कल तक हम सचिवालय कर्मी थे, आज सड़क पर खड़े हैं”—यह उनके आंदोलन का सबसे बड़ा संदेश बन गया है. प्रोजेक्ट भवन के बाहर स्थिति तनावपूर्ण है. पुलिस बल तैनात है, हालांकि अभ्यर्थी शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्होंने केंद्र और दूसरे विभागों की नौकरियां छोड़कर झारखंड में सेवा करने का फैसला लिया था. अब सरकार के फैसले के बाद उनके सामने अचानक रोजगार और भविष्य का संकट खड़ा हो गया है.
सरकार के फैसले से करीब 2 हजार नियुक्त अभ्यर्थियों पर संकट
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में सोमवार देर रात हुई कैबिनेट बैठक में JSSC-CGL परीक्षा और TDPL एजेंसी के जरिए 2014 से कराई गई सभी परीक्षाओं और उनके परिणामों को रद्द करने का फैसला लिया गया. सरकार का यह फैसला 24 दिनों से जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में चल रहे छात्र आंदोलन की प्रमुख मांगों में से एक को स्वीकार करने के तौर पर देखा गया. लेकिन इसी फैसले ने पहले से नियुक्त करीब 1,975 से 2,000 अभ्यर्थियों के सामने नई मुश्किल खड़ी कर दी है. इन अभ्यर्थियों को दिसंबर 2025 के आसपास नियुक्ति पत्र मिला था और वे वित्त, गृह, श्रम, सचिवालय समेत अलग-अलग विभागों में काम कर रहे थे. कई अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने इस नौकरी को स्थायी भविष्य मानकर केंद्र सरकार, दूसरे राज्यों या अन्य विभागों में उपलब्ध नौकरी के विकल्प तक छोड़ दिए थे. अब परीक्षा और परिणाम रद्द होने के बाद उनकी नियुक्ति और सेवा की स्थिति को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है. सरकार का तर्क है कि परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को देखते हुए व्यापक कार्रवाई जरूरी थी. मामले की जांच के लिए CID जांच और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए समिति का गठन भी किया गया है.
सफल अभ्यर्थियों का सवाल- हमारी गलती क्या है?
धरने पर बैठे अभ्यर्थियों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसके लिए सफल अभ्यर्थियों को जिम्मेदार क्यों माना जा रहा है. अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा दी, चयनित हुए और न्यायिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद नियुक्तियां मिलीं. उनका दावा है कि कुछ मामलों में CID की जांच में भी पेपर लीक नहीं होने की बात सामने आई थी. वे जांच के विरोध में नहीं हैं. उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि अगर किसी व्यक्ति या एजेंसी की भूमिका संदिग्ध है तो दोषी को सजा दी जाए, लेकिन सभी सफल और नियुक्त अभ्यर्थियों को एक ही नजर से न देखा जाए. कई अभ्यर्थियों ने यह भी बताया कि नौकरी पक्की होने के भरोसे उन्होंने दस्तावेज सत्यापन या दूसरी सरकारी नौकरियों से जुड़े अवसर छोड़ दिए थे. अब उनका कहना है कि बिना उनका पक्ष सुने इतना बड़ा फैसला लेना नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर भी सवाल खड़ा करता है.
एक फैसले से आमने-सामने आए दो पक्ष
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि सरकार के एक फैसले से आंदोलन कर रहे छात्र और पहले से नियुक्त अभ्यर्थी दो अलग-अलग मोर्चों पर खड़े नजर आ रहे हैं. एक तरफ छात्र संगठन पेपर लीक, TDPL की भूमिका और परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. वे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और जांच की मांग उठा रहे थे. सीबीआई जांच की मांग भी इसी आंदोलन का हिस्सा रही है. दूसरी तरफ वे अभ्यर्थी हैं, जिन्हें इसी प्रक्रिया के बाद नियुक्ति मिल चुकी थी और जो अब अपनी नौकरी बचाने के लिए सड़क पर हैं. दिलचस्प यह है कि नियुक्त अभ्यर्थी भी जांच के विरोध में नहीं हैं. वे भी चाहते हैं कि अगर किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो. उनका विरोध इस बात को लेकर है कि जांच पूरी होने और व्यक्तिगत दोष तय होने से पहले उनकी नियुक्तियों को ही संकट में डाल दिया गया. यानी विवाद अब सिर्फ परीक्षा में गड़बड़ी बनाम परीक्षा रद्द करने का नहीं है. सवाल यह भी है कि व्यवस्था की गलती का खामियाजा उन युवाओं को कितना भुगतना पड़ेगा, जिन्होंने चयन प्रक्रिया पूरी कर नौकरी हासिल की है.
अब अदालत की ओर देख रहे अभ्यर्थी
धरने पर बैठे अभ्यर्थियों का कहना है कि वे सरकार से बातचीत चाहते हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता भी अपनाएंगे. वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं. अभ्यर्थियों का तर्क है कि सिर्फ मौखिक आदेश के आधार पर उनकी सेवा खत्म नहीं की जा सकती. उनका कहना है कि नियुक्ति रद्द करने जैसे फैसले से पहले उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए. दूसरी ओर सरकार का पक्ष है कि जांच के दौरान गंभीर तथ्य सामने आए हैं और पूरी परीक्षा व्यवस्था से जुड़े बड़े नेटवर्क की आशंका की जांच जरूरी है. ऐसे में आने वाले दिनों में कानूनी लड़ाई अहम हो सकती है. अंतिम तस्वीर अदालत और सरकार के औपचारिक फैसलों से ही साफ होगी. लेकिन तब तक करीब दो हजार युवाओं का भविष्य अनिश्चितता में रहेगा.
सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती- सुधार के साथ राहत कैसे?
JSSC-CGL विवाद ने झारखंड की भर्ती व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सरकार परीक्षा प्रक्रिया में सुधार, वार्षिक परीक्षा कैलेंडर और तकनीक आधारित व्यवस्था की बात कर रही है. लेकिन इन सुधारों का असर भविष्य की परीक्षाओं पर पड़ेगा. मौजूदा संकट का समाधान इससे अलग सवाल है. सचिवालय और दूसरे विभागों में नियुक्त इन अभ्यर्थियों की स्थिति प्रशासनिक स्तर पर भी असर डाल सकती है, क्योंकि वे अलग-अलग पदों पर काम कर रहे हैं. ऐसे में सरकार के सामने एक साथ दो मोर्चे हैं—परीक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करना और पहले से नियुक्त अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर स्पष्ट रास्ता निकालना. फिलहाल प्रोजेक्ट भवन के बाहर टेंट लग चुका है. बारिश के बीच भी अभ्यर्थी धरने पर बैठे हैं और उनका कहना है कि वे बिना समाधान के नहीं हटेंगे.
यह विवाद अब सिर्फ एक परीक्षा को रद्द करने का मामला नहीं रह गया है. एक तरफ भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता और उसमें कथित गड़बड़ियों की जांच का सवाल है, तो दूसरी तरफ उन युवाओं का भविष्य है, जिन्होंने चयन के बाद नौकरी ज्वाइन कर ली थी. सरकार के फैसले के बाद दोनों सवाल एक-दूसरे के सामने खड़े हैं. अब देखना यह है कि सरकार जांच और भर्ती सुधार के साथ-साथ इन नियुक्त अभ्यर्थियों के लिए क्या रास्ता निकालती है.

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