MMDR संशोधन पर रघुवर दास का तर्क: खनिज संपदा का लाभ बढ़ाने और वैध खनन को मजबूत करने पर जोर
पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने MMDR संशोधन अधिनियम 2026 को झारखंड और देश के हित में बताया. उन्होंने खनन क्षेत्र में वैध गतिविधियां बढ़ाने, डीएमएफटी राशि के बेहतर इस्तेमाल, बंद खदानों को शुरू करने और राज्य के राजस्व व रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया.


Ranchi: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने MMDR (खान और खनिज विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 को राज्य और देश के हित में बताया है. उन्होंने कहा कि संशोधन को लेकर झामुमो और कांग्रेस की ओर से जिस तरह की आपत्तियां उठाई जा रही हैं, उनमें कई प्रावधानों की गलत व्याख्या की जा रही है. दास के मुताबिक खनन क्षेत्र में वैध और पारदर्शी गतिविधियां बढ़ने से राज्य को रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डीएमएफटी, रोजगार और औद्योगिक निवेश के रूप में व्यापक आर्थिक लाभ मिल सकता है. उन्होंने कहा कि मौजूदा व्यवस्था में भी खनन से जुड़े वैधानिक भुगतानों का बड़ा हिस्सा राज्यों को मिलता है. प्रेसवार्ता में उन्होंने डीएमएफटी राशि के उपयोग, बंद पड़े खदानों, कम होते खनिज उत्पादन और खनिजों की बढ़ती लागत का मुद्दा उठाते हुए कहा कि राज्य को खनिज संपदा का अधिकतम और स्थानीय स्तर तक सीधा लाभ सुनिश्चित करने पर ध्यान देना चाहिए.
11 हजार करोड़ के सेस से आगे आर्थिक लाभ का तर्क
रघुवर दास ने कहा कि MMDR संशोधन को केवल करीब 11 हजार करोड़ रुपये के उपकर के नजरिए से देखना उचित नहीं होगा. उनके अनुसार बड़ा सवाल यह है कि खनन क्षेत्र में निवेश, उत्पादन, रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को किस तरह बढ़ाया जाए. उन्होंने दावा किया कि माइनिंग सेक्टर से जुड़े कुल टैक्स और वैधानिक भुगतान का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे राज्यों को मिलता है और संशोधन के बाद भी यह व्यवस्था जारी रहेगी. उन्होंने कहा कि वैध खनन को बढ़ावा मिलने पर रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम और डीएमएफटी के साथ स्थानीय रोजगार और खनिज आधारित उद्योगों को भी फायदा होगा. उनके मुताबिक इससे बनने वाली आर्थिक गतिविधियां केवल सेस की राशि तक सीमित नहीं रहेंगी.
डीएमएफटी की राशि के इस्तेमाल पर उठाए सवाल
दास ने डीएमएफटी को खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए कहा कि 2015 में केंद्र सरकार ने रॉयल्टी के अतिरिक्त इस व्यवस्था को लागू किया था. उनका कहना है कि इसका उद्देश्य खनन प्रभावित जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और बुनियादी ढांचे को मजबूत करना था. उन्होंने दावा किया कि झारखंड में डीएमएफटी के कुल संग्रह करीब 18,250 करोड़ रुपये में से 7,915 करोड़ रुपये से अधिक खर्च नहीं हो सके हैं और 2,487 परियोजनाएं ठप या रद्द पड़ी हैं. उनके अनुसार धनबाद, चाईबासा, चतरा, पाकुड़ और रामगढ़ जैसे खनन प्रभावित जिलों में भी बड़ी राशि खर्च नहीं हुई है. उन्होंने डीएमएफटी की राशि के पारदर्शी और प्रभावी इस्तेमाल की जरूरत बताई.
खदानें शुरू हों तो बढ़ सकता है राज्य का राजस्व
पूर्व मुख्यमंत्री ने राज्य में खनन गतिविधियों की रफ्तार को लेकर भी आंकड़े रखे. उन्होंने कहा कि केंद्र से 34 कोल ब्लॉक शुरू करने की मंजूरी मिलने के बावजूद अब तक चार ही चालू हो पाए हैं. इसी तरह लौह अयस्क की 15 में से छह और बॉक्साइट की 37 में से 17 खदानों के संचालन का दावा उन्होंने किया. दास ने कहा कि अधिक खदानों के संचालन से राज्य को रॉयल्टी और अन्य वैधानिक भुगतान के जरिए अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है. उन्होंने पिछले छह वर्षों में 26 खदानों के पट्टे समाप्त होने का जिक्र करते हुए समय पर नीलामी और संचालन प्रक्रिया पूरी करने की जरूरत बताई.
खनिजों की लागत और वैध खनन की चुनौती
दास ने दावा किया कि सेस और अन्य लागत के कारण झारखंड के कोयले और लोहे की कीमत पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक हो गई है. उन्होंने ग्रेड 8 से 12 के कोयले और समान गुणवत्ता के लोहे की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा कि लागत बढ़ने का असर बाजार की मांग पर पड़ सकता है. उन्होंने कहा कि वैध खनन को आर्थिक रूप से मजबूत करने और सप्लाई चेन को पारदर्शी बनाने से अवैध खनन के लिए मौजूद आर्थिक गुंजाइश कम की जा सकती है. उनके अनुसार खनिज संपदा का लाभ तभी व्यापक रूप से राज्य तक पहुंचेगा, जब खनन, राजस्व संग्रह, डीएमएफटी खर्च और नीलामी की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से संचालित हो. उन्होंने सरकार से बंद खदानों, लंबित मंजूरियों और खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर प्राथमिकता से काम करने की बात कही.

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