राधाकृष्ण किशोर की बगावत या JMM का प्लान-B? झारखंड राजनीति में बड़ा खेल शुरू!
झारखंड की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मुख्यमंत्री Hemant Soren बिना कांग्रेस के भी सरकार चला सकते हैं? और क्या कांग्रेस के अंदर चल रही कलह उसी बड़े राजनीतिक खेल का हिस्सा है? वित्त मंत्री Radhakrishna Kishore जिस तरह लगातार अपनी ही पार्टी के प्रदेश नेतृत्व पर हमला बोल रहे हैं

Ranchi: झारखंड की राजनीति में इस वक्त सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मुख्यमंत्री Hemant Soren बिना कांग्रेस के भी सरकार चला सकते हैं? और क्या कांग्रेस के अंदर चल रही कलह उसी बड़े राजनीतिक खेल का हिस्सा है? वित्त मंत्री Radhakrishna Kishore जिस तरह लगातार अपनी ही पार्टी के प्रदेश नेतृत्व पर हमला बोल रहे हैं, उसने महागठबंधन की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. सत्ता में रहते हुए कोई मंत्री खुलकर संगठन को चुनौती दे, यह सामान्य राजनीतिक नाराजगी नहीं मानी जा रही. यही वजह है कि अब झारखंड की राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या JMM किसी “प्लान-B” पर काम कर रही है? विधानसभा का गणित, कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई और बगावती सुर—इन सबने मिलकर राज्य की राजनीति को बेहद दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है.
विधानसभा का गणित क्यों बढ़ा रहा है सस्पेंस?
81 सीटों वाली झारखंड विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 41 है. फिलहाल महागठबंधन के पास 56 विधायक हैं. इनमें JMM के 34, कांग्रेस के 16, RJD के 4 और CPI(ML) के 2 विधायक शामिल हैं. लेकिन असली राजनीतिक चर्चा यहीं से शुरू होती है. अगर JMM कांग्रेस से अलग होकर सरकार चलाने की कोशिश करे, तो RJD और CPI(ML) के समर्थन के साथ उसका आंकड़ा 40 तक पहुंच जाता है. यानी बहुमत से सिर्फ एक विधायक कम. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ऐसे में JMM को सिर्फ एक अतिरिक्त विधायक की जरूरत होगी. अगर कुछ निर्दलीय या असंतुष्ट विधायक साथ आ जाएं, तो सरकार बिना कांग्रेस के भी चल सकती है. यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर बढ़ती बयानबाजी को अब सिर्फ संगठनात्मक विवाद नहीं माना जा रहा.
राधाकृष्ण किशोर के तेवर आखिर किस ओर इशारा कर रहे हैं?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर Radhakrishna Kishore इतने आक्रामक क्यों दिख रहे हैं? आमतौर पर सत्ता में बैठे मंत्री पार्टी लाइन से बाहर जाकर लगातार हमला करने से बचते हैं. लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल अलग है. राधाकृष्ण किशोर न सिर्फ संगठन पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि उनके तेवर ऐसे दिख रहे हैं जैसे उन्हें किसी राजनीतिक सुरक्षा का भरोसा हो. यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि क्या उन्हें किसी बड़े राजनीतिक समीकरण का संकेत मिला हुआ है? अगर कांग्रेस में टूट होती है, तो सबसे बड़ा फायदा JMM को ही हो सकता है. ऐसे में किशोर का खुला विरोध महज नाराजगी है या किसी बड़े ऑपरेशन की शुरुआत—यही चर्चा इस वक्त झारखंड की राजनीति के केंद्र में है.
कांग्रेस में ‘प्योर कांग्रेसी बनाम बाहरी नेता’ की लड़ाई
कांग्रेस के भीतर एक और बड़ा नैरेटिव तेजी से उभर रहा है—“प्योर कांग्रेसी बनाम बाहर से आए नेता”. विधानसभा चुनाव से पहले कई बड़े चेहरे कांग्रेस में शामिल हुए थे. Radhakrishna Kishore को मंत्री बनाया गया. Shilpi Neha Tirkey को भी अहम जिम्मेदारी मिली. जबकि Pradeep Yadav को विधायक दल का नेता बना दिया गया. यहीं से पुराने कांग्रेसी नेताओं के अंदर नाराजगी बढ़ने लगी. पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं को लगने लगा कि वर्षों की मेहनत के बावजूद संगठन में बाहरी नेताओं को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है. अब राधाकृष्ण किशोर की बगावती लाइन उस नाराजगी को और हवा दे रही है.
JMM के लिए कौन हो सकते हैं ‘सॉफ्ट टारगेट’?
अगर JMM सच में कांग्रेस के बिना सरकार चलाने के विकल्प पर काम कर रही है, तो उसके लिए सबसे आसान रास्ता कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों को साधना हो सकता है. राजनीतिक चर्चाओं में जिन नामों को “सॉफ्ट टारगेट” माना जा रहा है, उनमें Radhakrishna Kishore, Pradeep Yadav और Shilpi Neha Tirkey प्रमुख हैं. इसके अलावा 2022 कैश कांड में विवादों में आए कुछ विधायक भी राजनीतिक समीकरण बदलने में भूमिका निभा सकते हैं. यही वजह है कि कांग्रेस की अंदरूनी कलह को अब सीधे सरकार की स्थिरता से जोड़कर देखा जा रहा है.
क्या महागठबंधन में बड़े उलटफेर की आहट है?
पिछले कुछ समय से JMM और कांग्रेस के रिश्तों में दूरी की चर्चा लगातार होती रही है. बिहार चुनाव में JMM को ज्यादा तवज्जो नहीं मिली. इसके बाद असम चुनाव में Hemant Soren ने कांग्रेस से अलग राह चुनी. अब झारखंड में लगातार बढ़ती बयानबाजी ने इन अटकलों को और मजबूत कर दिया है. सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कांग्रेस में कलह क्यों बढ़ रही है. असली सवाल यह है कि क्या झारखंड में किसी बड़े राजनीतिक पुनर्गठन की जमीन तैयार हो रही है? फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है. लेकिन इतना तय है कि राधाकृष्ण किशोर की बयानबाजी ने झारखंड की राजनीति में एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब आने वाले दिनों में राज्य की सत्ता का भविष्य तय कर सकता है.

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