कभी दिल्ली की सड़कों पर चलाते थे कैब, अब Asian Games में भारत के लिए जीता मेडल
“कभी दिल्ली की सड़कों पर कैब चलाकर परिवार का पेट पालने वाले सलमान खान ने Asian Games में भारत के लिए ऐतिहासिक मेडल जीता. 18 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और फिर भारतीय सेना में शामिल होकर रोइंग में अपनी पहचान बनाई.”

Asian Games 2026: कभी दिल्ली की सड़कों पर कैब चलाकर परिवार का पेट पालने वाले सलमान खान ने अब अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर भारत का नाम रोशन किया है. जापान के नागोया में हुए एशियन गेम्स में सलमान खान और सतनाम सिंह की जोड़ी ने पुरुष डबल स्कल्स रोइंग में भारत के लिए ऐतिहासिक मेडल जीता. 2,000 मीटर की रेस में दोनों ने 6:13.25 का समय दर्ज किया. सलमान के लिए यह उपलब्धि सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष का नतीजा है. 18 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी. आर्थिक मजबूरी में कैब चलाने वाले सलमान बाद में भारतीय सेना में शामिल हुए और यहीं से उनकी जिंदगी ने नई दिशा ली.
18 साल की उम्र में पिता की मौत, परिवार की जिम्मेदारी आई कंधों पर
उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के पूरे धींगई गांव से आने वाले सलमान खान छह भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं. उनके पिता मोहम्मद कासिम खान हरियाणा के ताउरू में ट्रक की बॉडी बनाने का काम करते थे. सलमान बचपन से ही भारतीय सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना चाहते थे. लेकिन महज 18 साल की उम्र में उनके पिता की डेंगू से अचानक मौत हो गई. पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद मुश्किल हो गई और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी भी सलमान के कंधों पर आ गई. ऐसे समय में उन्हें अपना सेना में जाने का सपना कुछ समय के लिए छोड़ना पड़ा. परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए वह दिल्ली पहुंचे और कैब चलाने लगे. दिल्ली की सड़कों पर घंटों ड्राइविंग करते हुए उन्होंने परिवार के लिए कमाई की. हालांकि, मुश्किल हालात के बावजूद सेना में जाने का सपना उनके मन में बना रहा.
कैब की स्टीयरिंग से भारतीय सेना तक पहुंचने का सफर
दिल्ली में कैब चलाने के दौरान भी सलमान खान के भीतर सेना में भर्ती होने की इच्छा बनी रही. एक दोस्त ने उनकी लंबाई और मजबूत कद-काठी को देखते हुए उन्हें दोबारा आर्मी भर्ती की तैयारी करने की सलाह दी. इसके बाद सलमान ने पूरी मेहनत के साथ सेना में भर्ती होने की तैयारी शुरू की. बताया जाता है कि उन्होंने महज चार महीने तक दिन-रात मेहनत की और आखिरकार 25 सितंबर 2018 को बॉम्बे इंजीनियर ग्रुप, पुणे में भारतीय सेना में शामिल हो गए. सेना में भर्ती होना उनके लिए सिर्फ नौकरी हासिल करना नहीं था, बल्कि वर्षों पुराने सपने के पूरा होने जैसा था. इसके बाद उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया. सेना में रहते हुए सलमान की मुलाकात रोइंग खेल से हुई. कोचों ने उनके लंबे कद और शारीरिक क्षमता को देखते हुए उन्हें इस खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. शुरुआत मुश्किल रही, लेकिन सलमान ने हार नहीं मानी.
जिस खेल का नाम नहीं जानते थे, उसी में बनने लगे चैंपियन
सलमान खान के लिए रोइंग बिल्कुल नया खेल था. उन्होंने इससे पहले कभी इस खेल को गंभीरता से नहीं जाना था. नाव चलाने और तकनीक सीखने के शुरुआती दौर में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा. कई बार उन्हें लगा कि वह इस खेल को छोड़ देंगे. हालांकि, सेना के वरिष्ठ कोचों ने उन्हें लगातार प्रोत्साहित किया और प्रशिक्षण जारी रखने के लिए उनका हौसला बढ़ाया. धीरे-धीरे सलमान ने रोइंग की बारीकियां सीखनी शुरू कीं और उनकी मेहनत का परिणाम प्रतियोगिताओं में दिखाई देने लगा. उन्होंने नेशनल गेम्स से लेकर एशियन रोइंग कप तक में शानदार प्रदर्शन किया और पदक जीते. खेल में लगातार बेहतर प्रदर्शन के बाद सेना में भी उनकी पहचान एक बेहतरीन खिलाड़ी के तौर पर बनी. उनकी उपलब्धियों और प्रदर्शन को देखते हुए उन्हें नायब सूबेदार के पद पर पदोन्नत किया गया. इस तरह दिल्ली में कैब चलाने वाले सलमान ने सेना के जरिए खेल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई.
पार्टनर बदलने के बाद भी सलमान और सतनाम ने रचा इतिहास
एशियन गेम्स में सलमान खान और सतनाम सिंह के सामने चुनौती कम नहीं थी. प्रतियोगिता से कुछ समय पहले भारतीय रोइंग टीम में बदलाव हुआ और दोनों खिलाड़ियों को क्वाड्रपल स्कल्स के बजाय डबल स्कल्स में उतारने का फैसला किया गया. अचानक हुए इस बदलाव के बावजूद दोनों ने अपना ध्यान प्रतियोगिता पर बनाए रखा. 2,000 मीटर की रेस में सलमान और सतनाम ने शुरुआत से ही मजबूत प्रदर्शन किया. रेस के दौरान दोनों खिलाड़ी पदक की दौड़ में बने रहे. अंतिम चरण में भी उन्होंने अपनी गति बनाए रखी और 6:13.25 का समय दर्ज किया. इसके साथ ही दोनों ने पुरुष डबल स्कल्स में भारत के लिए ऐतिहासिक पदक हासिल किया. इस उपलब्धि के बाद सलमान की कहानी फिर चर्चा में आ गई, क्योंकि कुछ साल पहले तक वह परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए दिल्ली में कैब चलाते थे.
संघर्ष से मिली कामयाबी, सलमान की कहानी बनी मिसाल
सलमान खान की कहानी गरीबी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अपने सपने को जिंदा रखने की कहानी है. 18 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद उन्हें परिवार की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी. आर्थिक मजबूरी के कारण उन्होंने दिल्ली में कैब चलाई, लेकिन सेना में जाने का सपना पूरी तरह नहीं छोड़ा. भारतीय सेना में भर्ती होने के बाद उन्हें रोइंग का मौका मिला और उन्होंने इस नए खेल को सीखने के लिए लगातार मेहनत की. शुरुआती मुश्किलों और खेल छोड़ने के विचार के बावजूद उन्होंने प्रशिक्षण जारी रखा. धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन करते हुए उन्होंने अपनी पहचान बनाई. अब एशियन गेम्स में भारत के लिए पदक जीतना उनके सफर की बड़ी उपलब्धियों में शामिल हो गया है. सलमान की यात्रा यह दिखाती है कि कठिन परिस्थितियों के बीच भी इंसान अपने लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ सकता है और नए अवसर मिलने पर अपनी जिंदगी को नई दिशा दे सकता है.


