JSSC-CGL रद्द, लेकिन प्रशांत कुमार की भूमिका पर जांच अब भी क्यों नहीं?
JSSC-CGL रद्द होने के बाद छात्रों को भले ही तत्काल राहत मिली हो, लेकिन झारखंड भर्ती घोटाले से जुड़े कई बड़े सवाल अब भी अनुत्तरित हैं. सचिव से पूछताछ और छापेमारी के बीच आयोग के प्रभारी अध्यक्ष IAS प्रशांत कुमार की भूमिका पर जांच की आंच क्यों नहीं पहुंची, यह सवाल लगातार उठ रहा है.

Ranchi: जेएसएससी-सीजीएल रद्द हो गई. टीडीपीएल से जुड़ी तमाम परीक्षाओं पर भी कैंची चल गई. भूख हड़ताल टूटी, कैबिनेट की आपात बैठक खत्म हुई और मुख्यमंत्री ने सुधार समिति बनाने का ऐलान कर दिया. ऊपर से तस्वीर यही दिखती है कि सरकार छात्रों के दबाव के आगे झुक गई है. लेकिन झारखंड के भर्ती घोटाले का सबसे असहज सवाल अब भी वहीं खड़ा है—आयोग के प्रभारी अध्यक्ष आईएएस प्रशांत कुमार तक जांच की आंच आखिर क्यों नहीं पहुंची? सचिव सुधीर गुप्ता के घर और दफ्तर पर छापे पड़े, उनसे पूछताछ हुई. जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष जेल तक पहुंच गए. बिचौलियों से लेकर एजेंसी से जुड़े लोगों पर भी कार्रवाई हुई. लेकिन जिस आयोग की सबसे ऊंची कुर्सी पर प्रशांत कुमार बैठे हैं, उस कुर्सी तक जांच की दस्तक क्यों नहीं पहुंची? उनसे अब तक एक औपचारिक सवाल तक दर्ज नहीं हुआ. परीक्षा रद्द कर देना तत्काल संकट को शांत करने का तरीका है. लेकिन जिम्मेदारी तय करना शासन की असली कसौटी है. यही दोनों के बीच का फर्क अब विपक्ष, छात्रों और पूरे मामले की विश्वसनीयता के केंद्र में है.
रद्दीकरण राहत है, सफाई नहीं
सीजीएल रद्द होना छात्रों की बड़ी मांग थी. इसे उनकी एक बड़ी जीत और तत्काल राहत माना जा सकता है. लेकिन परीक्षा रद्द होते ही घोटाले की पूरी कहानी खत्म नहीं हो जाती. असली सवाल तो अब भी सामने हैं—पेपर बाहर कैसे निकला? पैसे का खेल कहां चला? रैंकिंग कैसे बदली या तय हुई? और पूरी प्रक्रिया पर निगरानी किसकी थी? इन सवालों का जवाब सिर्फ एजेंसी या सचिवालय के निचले स्तर तक जाकर नहीं मिल सकता. आयोग का अध्यक्ष उसकी सबसे ऊंची प्रशासनिक कुर्सी पर बैठता है. फरवरी 2024 से जेएसएससी का अतिरिक्त प्रभार प्रशांत कुमार के पास है. सितंबर 2024 में हुई वह परीक्षा भी उनके कार्यकाल में हुई, जिसके लीक और सेटिंग से जुड़े खुलासे अब सीआईडी के बयानों में सामने आ रहे हैं. परीक्षा रद्द करना एक प्रक्रिया को रोक देना है. लेकिन उस प्रक्रिया की निगरानी किसने की, किस स्तर पर चूक हुई और किसने जवाबदेही निभाई—इन सवालों का जवाब देना अभी बाकी है. सरकार ने सुधार समिति बना दी है. वह समिति आने वाली भर्तियों की व्यवस्था सुधार सकती है. लेकिन मौजूदा विवाद में आयोग के शीर्ष पद की भूमिका पर जो सवाल खड़ा है, उसका जवाब अभी भी नहीं मिला है.
मरांडी के सवाल महज विपक्षी शोर नहीं
बाबूलाल मरांडी के 17 अगस्त के दोनों ट्वीट इसी अनुत्तरित सवाल को सीधे निशाना बनाते हैं. एक ट्वीट में वे सीआईडी जांच को दिखावा बताते हैं. उनका आरोप है कि सचिव से पूछताछ महज खानापूर्ति है और अध्यक्ष पर मेहरबानी बरती जा रही है. दूसरे ट्वीट में उनका हमला और ज्यादा सीधा है. खियांग्ते इस्तीफे के बाद जेल गए, नीरज सिन्हा इस्तीफे के बाद बचे रहे. एक आईएएस, एक आईपीएस. मरांडी का आरोप है कि पुलिस तंत्र अपने पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को बचा रहा है और अब उसी तर्ज पर प्रशांत कुमार भी जांच की पहुंच से बाहर रखे जा रहे हैं. मरांडी मुख्यमंत्री से सीधे सवाल करते हैं—पदमुक्ति और एफआईआर में आखिर कौन सी मजबूरी है? वायरल चयनितों को हटाने में कौन सी देरी है? और सीबीआई को जांच सौंपने में आखिर कौन सा डर है? ये सवाल राजनीतिक हैं, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन इन्हें सिर्फ विपक्षी शोर कहकर खारिज करना भी आसान नहीं है. क्योंकि जब जांच नीचे तक पहुंचती दिखाई दे और शीर्ष पद पर कार्रवाई या पूछताछ का कोई स्पष्ट संकेत न मिले, तो सवाल अपने आप बड़ा हो जाता है. यहां भी यही हो रहा है.
अतिरिक्त प्रभार कोई कवच नहीं
प्रशांत कुमार वित्त और जल संसाधन सचिव हैं. जेएसएससी का प्रभार उनके पास अतिरिक्त जिम्मेदारी के तौर पर है. प्रशासनिक तर्क के लिहाज से यही बात उनके लिए एक ढाल बन सकती है—वे पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं थे, इसलिए परीक्षा से जुड़ी परिचालन गड़बड़ियों की जिम्मेदारी सचिव और नियंत्रक स्तर तक सीमित मानी जाए. लेकिन सवाल यह है कि क्या अतिरिक्त प्रभार जिम्मेदारी को भी अतिरिक्त बना देता है? आयोग के पत्र, परीक्षा कैलेंडर, एजेंसी का चयन, परीक्षा की सुरक्षा और परिणाम की अंतिम प्रक्रिया उसी कुर्सी से जुड़ी होती है. अतिरिक्त प्रभार लेने का मतलब यह नहीं हो सकता कि जिम्मेदारी भी आधी हो जाए. बल्कि दो महत्वपूर्ण विभागों के साथ एक संवेदनशील भर्ती आयोग की जिम्मेदारी संभालना निगरानी और नियंत्रण को लेकर और गंभीर सवाल खड़े करता है. और अगर प्रशांत कुमार वाकई उन प्रक्रियाओं से दूर थे, जिनमें गड़बड़ी हुई, तो इसका सबसे साफ जवाब जांच में मिल सकता था. उनसे पूछताछ होती, उनका पक्ष रिकॉर्ड पर आता और जांच आगे बढ़ती. लेकिन अब तक ऐसा कुछ सामने नहीं आया है. यही खामोशी सवाल को और गहरा कर रही है.
एक आयोग जेल, दूसरा आयोग मौन
जेपीएससी में जांच की आंच अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंची. छापा पड़ा, इस्तीफा हुआ, रिमांड हुआ और गिरफ्तारी तक की कार्रवाई हुई. दूसरी तरफ जेएसएससी में कार्यालय पर छापा पड़ा, सचिव जांच के घेरे में आए, लेकिन अध्यक्ष अब तक जांच की उस सीधी रेखा में दिखाई नहीं देते. यह अंतर सिर्फ समय का नहीं है. इससे कार्रवाई की प्राथमिकता पर भी सवाल उठता है. नीरज सिन्हा का मामला इस असहजता को और बढ़ाता है. वे इस्तीफा देकर किनारे हो गए और उन पर भी वही चुप्पी बनी रही, जिसका फायदा अब उनके उत्तराधिकारी को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है. मरांडी इसी स्थिति को “चोर-चोर मौसेरा भाई” कहकर हमला कर रहे हैं. जांच एजेंसी इसे चाहे चरणबद्ध जांच की प्रक्रिया बताए, लेकिन जनता इसे किस नजर से देखेगी, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है. जब सचिव से पूछताछ हो सकती है, बिचौलियों और एजेंसी से जुड़े लोगों पर कार्रवाई हो सकती है, तो अध्यक्ष से सवाल क्यों नहीं? जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, संरक्षण की धारणा खत्म होना मुश्किल है.
सीआईडी की चुप्पी और विश्वास का संकट
छात्र सीबीआई जांच की मांग सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे कि मामला बड़ा है. उनकी सबसे बड़ी शिकायत राज्य की जांच एजेंसी पर भरोसे को लेकर है. जब जांच सचिव तक पहुंचती है, लेकिन अध्यक्ष की कुर्सी पर आकर रुकती दिखाई देती है, तो यही अविश्वास और मजबूत होता है. अगर प्रशांत कुमार निर्दोष हैं, तो उनके लिए भी सबसे बेहतर रास्ता यही था कि उनसे पूछताछ होती. सवाल पूछे जाते, उनका पक्ष रिकॉर्ड पर आता और अगर उनकी भूमिका नहीं होती तो जांच उसी आधार पर आगे बढ़ती. पूछताछ से सफाई का रास्ता भी खुलता है और जांच को नए सुराग भी मिल सकते हैं. लेकिन जब सवाल ही नहीं पूछा जाता, तो दो संभावनाएं खुली रह जाती हैं—या तो जांच अभी नीचे के स्तर पर अटकी हुई है, या फिर ऊपर जाने में कोई ऐसी वजह है जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया है. परीक्षा रद्द हो गई. भूख हड़ताल भी टूट गई. सरकार ने सुधार समिति भी बना दी. लेकिन सवाल खत्म नहीं हुए. क्योंकि विवाद सिर्फ परीक्षा का नहीं, पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का है.
कागज रद्द कर देने से व्यवस्था साफ नहीं होती. व्यवस्था तब साफ दिखाई देती है, जब जांच सबसे नीचे से लेकर सबसे ऊंची कुर्सी तक पहुंचे. और जब तक आयोग की सबसे ऊंची कुर्सी भी सवालों के घेरे में नहीं आती, तब तक जेएसएससी भर्ती विवाद का सबसे असुविधाजनक सवाल अपनी जगह कायम रहेगा.

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