Video: प्रोजेक्ट भवन के अंदर घुसे JSSC-CGL अभ्यर्थी, फूट-फूटकर रोए; बोले- भीड़तंत्र जीत गई, लोकतंत्र हार गई
प्रोजेक्ट भवन के अंदर घुसकर JSSC-CGL अभ्यर्थी फूट-फूटकर रोए. कल तक इसी ऑफिस में काम करने वाले युवा आज पुलिस की मौजूदगी में आंसू बहा रहे हैं. उन्होंने जयराम महतो, कुणाल प्रताप सिंह, कोचिंग माफिया और भीड़तंत्र पर तीखे सवाल उठाए.

Ranchi: प्रोजेक्ट भवन के अंदर बुधवार को एक मार्मिक नजारा देखने को मिला. JSSC-CGL के उन अभ्यर्थियों ने, जो कल तक इसी परिसर में कर्मी थे, आज बड़ी संख्या में पुलिस की मौजूदगी के बीच अंदर घुसकर फूट-फूटकर रोना शुरू कर दिया. कई युवा उसी ऑफिस के गलियारों में खड़े होकर आंसू पोंछ रहे थे, जहां कल तक वे ड्यूटी करते थे. एक साथी ने रोते हुए दूसरे को सांत्वना देते कहा, “रो मत भाई, हम फिर आएंगे.” अभ्यर्थियों का आक्रोश अब खुलकर सामने आ गया है. वे सरकार के फैसले, कोचिंग माफिया, भीड़तंत्र और कुछ राजनीतिक बयानों पर तीखे सवाल उठा रहे हैं. कई ने अपनी पुरानी नौकरियां छोड़कर इस पद को जॉइन किया था. अब EMI का बोझ, खाली जेब और अंधकारमय भविष्य का दर्द उनके चेहरे पर साफ दिख रहा है.
प्रोजेक्ट भवन के अंदर घुसते ही छलके आंसू
सोमवार रात परीक्षा रद्द होने के बाद से प्रोजेक्ट भवन के बाहर धरना दे रहे अभ्यर्थी बुधवार को परिसर के अंदर पहुंच गए. पुलिस बल की भारी तैनाती के बावजूद वे कैंपस में घुस गए. अंदर पहुंचते ही कई युवा भावुक हो गए. “कल तक हम यहीं काम करते थे, आज हमें रोकने की कोशिश हो रही है,” एक अभ्यर्थी ने आंसू भरी आवाज में कहा. कुछ तो उसी कमरे के बाहर खड़े होकर रो रहे थे, जहां उनकी सीट हुआ करती थी. यह दृश्य सिर्फ गुस्से का नहीं, टूटे हुए सपनों का था. रात भर बारिश में टेंट लगाकर बैठे ये युवा अब अंदर आकर अपनी पीड़ा जाहिर कर रहे थे.
जयराम महतो और कुणाल प्रताप सिंह पर तीखे सवाल
अभ्यर्थियों का गुस्सा जयराम महतो के उस बयान पर भी फूटा जिसमें कहा गया था कि भीड़ जो मांगे, उसे दे देना चाहिए. एक छात्र ने तंज कसते हुए पूछा, “अगर हम सब अनशन करते-करते मर जाएं और मांग करें कि हमें IAS बना दो, तो क्या सरकार हमें IAS बना देगी? क्या एक विधायक को ऐसा बयान देना चाहिए?” जेपीएससी-जेएसएससी रिफॉर्म मंच के नेता कुणाल प्रताप सिंह पर भी आरोप लगे. अभ्यर्थियों का कहना है कि भीड़तंत्र के दबाव में लोकतंत्र की हत्या कर दी गई. वे पूछ रहे हैं कि क्या मेहनत से पास करने वाले युवाओं को सड़क पर धकेलना जायज है.
कोचिंग माफिया और भीड़तंत्र का आरोप
कई अभ्यर्थियों ने साफ कहा कि सरकार कोचिंग मक्खियों के दबाव में आकर यह फैसला लिया है. उन्होंने 35-40 लाख रुपये की लेनदेन वाली अफवाहों का जिक्र करते हुए कहा कि ये बातें फैलाने वाले यह नहीं बताते कि उनमें से कितने पहले से नौकरी में थे या JAM जैसी परीक्षाएं क्वालीफाई कर चुके हैं. कुछ युवा बीआईटी सिंदरी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पढ़े हैं. उनका तर्क है कि कोर्ट के आदेश के बाद उन्होंने नियमों के मुताबिक जॉइन किया था. अब एक झटके में सब कुछ छिन गया. वे जांच के खिलाफ नहीं, लेकिन सभी को एक साथ सजा देने के खिलाफ हैं.
पुरानी नौकरी छोड़कर आए, अब EMI और अंधेरा
कई अभ्यर्थियों ने बताया कि उन्होंने केंद्र या अन्य विभागों की स्थिर नौकरियां छोड़कर झारखंड की सेवा करने का फैसला लिया था. बेहतर भविष्य की उम्मीद में आए थे, लेकिन अब जेब खाली है, EMI चल रही है और भविष्य पूरी तरह अंधकार में दिख रहा है. एक युवा ने भावुक होकर कहा, “अब मेरे सामने मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.” यह दर्द सिर्फ नौकरी जाने का नहीं, बल्कि उस विश्वास टूटने का है जो उन्होंने राज्य सरकार और प्रक्रिया पर किया था. वे कह रहे हैं कि सरकार का फैसला बदलवाने के लिए लड़ते रहेंगे.
लोकतंत्र हारा या भीड़तंत्र जीता?
अभ्यर्थियों का आक्रोश अब सिर्फ परीक्षा रद्द होने तक सीमित नहीं रहा. वे पूरी भर्ती व्यवस्था, पारदर्शिता और राजनीतिक बयानबाजी पर सवाल उठा रहे हैं. “भीड़तंत्र जीत गई, लोकतंत्र हार गई,” यही उनका सबसे marक बयान बन गया है. वे न्याय की मांग कर रहे हैं, व्यक्तिगत जांच की मांग कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जब तक उनका पक्ष नहीं सुना जाएगा, वे नहीं हटेंगे. प्रोजेक्ट भवन के अंदर और बाहर का यह मंजर झारखंड की भर्ती व्यवस्था की उस गहरी दरार को दिखा रहा है, जिसमें एक तरफ छात्र आंदोलन है तो दूसरी तरफ पहले से नियुक्त युवाओं का टूटा हुआ सपना.


