मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में झारखंड का खेल! लाइट हाउस प्रोजेक्ट में सत्ता का दखल, प्रबंध समिति का सामूहिक इस्तीफा
रांची के धुर्वा स्थित लाइट हाउस प्रोजेक्ट में विवाद गहरा गया है. परिसर की व्यवस्था संभाल रही प्रबंध समिति ने 31 अक्टूबर 2026 से सामूहिक इस्तीफे का ऐलान किया है. समिति ने सरकार और प्रशासन की कथित उपेक्षा, तकनीकी खामियों, राजनीतिक हस्तक्षेप, अवैध किराये और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को इसकी वजह बताया है.

Ranchi: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शहरी आवास के ड्रीम प्रोजेक्ट लाइट हाउस में अब अंदरूनी विवाद खुलकर सामने आ गया है. रांची के धुर्वा स्थित इस परिसर की व्यवस्था संभाल रही प्रबंध समिति ने 31 अक्टूबर 2026 से अपने सभी पदाधिकारियों और सदस्यों के सामूहिक इस्तीफे का ऐलान किया है. समिति ने इसके पीछे सरकार और प्रशासन की कथित उपेक्षा, सत्ताधारी दलों के नेताओं के हस्तक्षेप, भवनों में तकनीकी खामियों और सुरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दों को वजह बताया है. समिति के आरोप हैं कि फ्लैटों का पूरा भुगतान लेने के बावजूद जरूरी सामुदायिक-सह-व्यावसायिक भवन नहीं बनाया गया, जिससे रखरखाव के लिए स्थायी आय का रास्ता ही नहीं बन पाया. परिसर में अवैध रूप से फ्लैट किराये पर दिए जाने और शिकायतों पर कार्रवाई नहीं होने का भी दावा किया गया है. सवाल है कि जिस परियोजना को शहरी आवास की नई तस्वीर के तौर पर पेश किया गया, वहां व्यवस्था संभालने वाली समिति को आखिर सामूहिक इस्तीफे का फैसला क्यों लेना पड़ा?
पूरा भुगतान, लेकिन सामुदायिक और व्यावसायिक भवन का निर्माण नहीं
प्रबंध समिति का सबसे बड़ा सवाल उस सामुदायिक-सह-व्यावसायिक भवन को लेकर है, जिसका निर्माण लाइट हाउस प्रोजेक्ट के साथ प्रस्तावित था. समिति के मुताबिक, इस भवन से परिसर को नियमित और स्थायी आय मिलनी थी. उसी आय से कॉमन एरिया की देखरेख, साफ-सफाई, मरम्मत और दूसरी जरूरी सुविधाओं का खर्च चलाया जाना था. लेकिन आरोप है कि फ्लैटों का पूरा भुगतान सरकार को मिल जाने के बावजूद इस भवन का निर्माण नहीं कराया गया. ऐसे में परिसर के रखरखाव के लिए आर्थिक व्यवस्था कैसे चलेगी, यह बड़ा सवाल बन गया है. आखिर परियोजना की योजना बनाते समय मेंटेनेंस के लिए जिस व्यवस्था की कल्पना की गई थी, वह जमीन पर क्यों नहीं उतरी? क्या इस भवन के निर्माण को लेकर कोई समयसीमा तय थी और अगर थी, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ? समिति के इस्तीफे के पीछे यह मुद्दा एक अहम वजह बनकर सामने आया है.
भवनों की बनावट में तकनीकी खामियां, शिकायतों के बाद भी समाधान नहीं?
लाइट हाउस परिसर में रहने वाले लोगों की परेशानियां सिर्फ रखरखाव तक सीमित नहीं हैं. प्रबंध समिति का आरोप है कि भवनों की बनावट में कई तकनीकी त्रुटियां हैं, जिनके कारण निवासियों को रोजमर्रा की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. समिति का कहना है कि बार-बार संबंधित विभाग और सरकार का ध्यान इन खामियों की ओर दिलाया गया, लेकिन समाधान के लिए अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. यहां सवाल यह भी है कि जब फ्लैटों का आवंटन सरकारी स्तर पर हुआ और भुगतान भी सरकार को प्राप्त हुआ, तो निर्माण की गुणवत्ता और तकनीकी कमियों की जिम्मेदारी किसकी है? क्या इन खामियों की जांच कराई गई? अगर जांच हुई, तो उसकी रिपोर्ट और कार्रवाई का क्या हुआ? सरकारी परियोजना में रहने वाले लोगों को बुनियादी सुविधाओं और भवन की गुणवत्ता को लेकर खुद संघर्ष करना पड़े, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है. हालांकि, इन तकनीकी त्रुटियों की प्रकृति और उनकी स्वतंत्र जांच का विवरण समिति के बयान में नहीं दिया गया है.
परिसर के अंदर सत्ताधारी नेताओं का हस्तक्षेप!
प्रबंध समिति ने झारखंड सरकार में शामिल सत्ताधारी राजनीतिक दलों के नेताओं पर परिसर के आंतरिक और प्रशासनिक मामलों में लगातार अनावश्यक हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया है. समिति का दावा है कि इस दखल से उसकी स्वायत्तता प्रभावित हो रही है और स्वतंत्र रूप से कामकाज चलाना मुश्किल हो रहा है. यह आरोप इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि आवासीय परिसर की व्यवस्था के लिए बनी समिति की जिम्मेदारी और अधिकारों को लेकर सवाल खड़े होते हैं. आखिर कौन से मामले हैं जिनमें राजनीतिक हस्तक्षेप किया जा रहा है? क्या इस संबंध में कोई लिखित शिकायत प्रशासन को दी गई है? समिति ने परिसर के कई फ्लैटों को अवैध रूप से किराये पर दिए जाने का भी आरोप लगाया है. उसका कहना है कि शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने ठोस कार्रवाई नहीं की. यदि फ्लैटों के आवंटन की शर्तों का उल्लंघन हो रहा है, तो इसकी जांच कौन करेगा और कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी होगी? इन आरोपों पर संबंधित नेताओं और प्रशासन का पक्ष भी सामने आना बाकी है.
धमकियों का आरोप
समिति ने अपने इस्तीफे की वजहों में सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया है. आरोप है कि पदाधिकारियों और सदस्यों को असामाजिक तत्वों की ओर से जान-माल के नुकसान की धमकियां दी जा रही हैं. समिति का दावा है कि इस संबंध में स्थानीय पुलिस और प्रशासन को लिखित सूचना दी गई, लेकिन सुरक्षा या कार्रवाई के स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. अब समिति ने 31 अक्टूबर 2026 से अपने पदों से सामूहिक इस्तीफा देने का निर्णय लिया है. उसके मुताबिक, इसके बाद परिसर के रखरखाव, सुरक्षा, नागरिक सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी झारखंड सरकार तथा सहकारिता विभाग की होगी. यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—अगर समिति के हटने के बाद व्यवस्था प्रभावित होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सरकार नई प्रबंधन व्यवस्था बनाएगी या मौजूदा समस्याओं के समाधान के लिए कोई ठोस कदम उठाएगी? प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट से जुड़े इन गंभीर आरोपों पर अब सरकार और संबंधित विभाग का जवाब जरूरी है.

