महागठबंधन में सब खत्म? भरोसा टूटा, गुस्सा फूटा... अब होगा नया खेला!
क्या झारखंड में महागठबंधन का भरोसा टूट गया है? राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस, राजद और माले के बीच खुली बयानबाजी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या यह सिर्फ नाराजगी है या फिर किसी नए राजनीतिक खेला की शुरुआत? जानिए बदलते समीकरणों का पूरा विश्लेषण.

Ranchi: क्या झारखंड में महागठबंधन टूट जाएगा? क्या कांग्रेस को अब अपने ही सहयोगियों पर भरोसा नहीं रहा? क्या राज्यसभा चुनाव के बाद गठबंधन के भीतर शुरू हुई जंग आने वाले दिनों में सरकार की सेहत पर असर डालेगी? या फिर यह सिर्फ कुछ दिनों की नाराजगी है, जिसके बाद सब फिर एक मंच पर नजर आएंगे? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद महागठबंधन के भीतर पहली बार खुलकर आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया है. कांग्रेस प्रभारी के. राजू ने राजद और माले पर धोखा देने का आरोप लगाया, तो राजद ने कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दे दी. माले ने भी कांग्रेस को आईना दिखाया. सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक चुनावी हार का गुस्सा है या फिर झारखंड की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की आहट सुनाई देने लगी है?
महागठबंधन के भीतर भरोसा खत्म हो गया है?
राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों और विधायकों के गणित से नहीं चलता, बल्कि भरोसे से चलता है. राज्यसभा चुनाव के बाद सबसे बड़ा संकट इसी भरोसे पर दिखाई दे रहा है. कांग्रेस ने खुलकर राजद और माले पर क्रॉस वोटिंग का आरोप लगाया है. जवाब में दोनों दलों ने आरोपों को खारिज करते हुए कांग्रेस की राजनीतिक और संगठनात्मक कमजोरी पर सवाल खड़े कर दिए. यह पहली बार नहीं है जब गठबंधन के भीतर असहमति सामने आई हो, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि सार्वजनिक तौर पर एक-दूसरे पर धोखा देने का आरोप लगाया गया. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या महागठबंधन के भीतर भरोसे की नींव कमजोर पड़ने लगी है?
क्या कांग्रेस इस हार का राजनीतिक हिसाब बराबर करेगी?
राज्यसभा चुनाव में मिली हार कांग्रेस के लिए सिर्फ एक सीट हारने का मामला नहीं है. पार्टी के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई थी. ऐसे में अगर कांग्रेस को लगता है कि सहयोगी दलों ने उसका साथ नहीं दिया, तो इसका असर भविष्य की राजनीति पर पड़ सकता है. आने वाले समय में सीट बंटवारे, संगठन विस्तार और सरकार में हिस्सेदारी के सवाल पर कांग्रेस पहले से ज्यादा आक्रामक हो सकती है. हालांकि फिलहाल कांग्रेस के पास सरकार को अस्थिर करने की स्थिति नहीं है, लेकिन राजनीति में नाराजगी अक्सर लंबे समय तक जिंदा रहती है. इसलिए यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि राज्यसभा चुनाव का अध्याय यहीं खत्म हो गया.
राजद और माले क्या करेंगे?
राजद और माले ने जिस आक्रामक अंदाज में कांग्रेस के आरोपों का जवाब दिया है, उससे साफ है कि दोनों दल खुद को कटघरे में खड़ा किया जाना पसंद नहीं कर रहे. राजद नेताओं ने कांग्रेस पर ही सवाल उठाए हैं, जबकि माले ने कांग्रेस के अपने विधायकों पर नियंत्रण को लेकर टिप्पणी की है. हालांकि दोनों दलों के लिए सरकार से बाहर निकलना आसान विकल्प नहीं है. भाजपा को सत्ता से दूर रखना उनकी राजनीतिक प्राथमिकता है. इसलिए संभावना यही है कि वे अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे, दबाव की राजनीति करेंगे, लेकिन गठबंधन छोड़ने का जोखिम फिलहाल नहीं उठाएंगे.
क्या सरकार गिरने का कोई खतरा है?
राजनीतिक बयानबाजी और सरकार गिरने की संभावना, दोनों अलग-अलग बातें हैं. झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन के पास अभी भी बहुमत का स्पष्ट आंकड़ा है. ऐसे में सिर्फ बयानबाजी के आधार पर सरकार पर खतरा मानना जल्दबाजी होगी. लेकिन यह भी सच है कि जब गठबंधन के भीतर भरोसा कमजोर होता है, तब सरकारें भले न गिरें, लेकिन फैसले लेने की प्रक्रिया प्रभावित होने लगती है. सरकार चलती रहती है, लेकिन सहयोगी दलों के बीच दूरी बढ़ती जाती है. झारखंड की राजनीति में आने वाले दिनों में यही देखने वाली बात होगी.
सब भड़ास निकालकर फिर साथ आ जाएंगे?
झारखंड की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां स्थायी दोस्त और स्थायी दुश्मन जैसी कोई चीज नहीं होती. कई बार तीखी बयानबाजी के बाद भी दल साथ बने रहते हैं, क्योंकि सत्ता की राजनीति समझौतों पर चलती है. संभव है कि कुछ दिनों तक आरोप-प्रत्यारोप चलता रहे, दिल्ली और रांची में बैठकों का दौर चले और फिर सब सामान्य हो जाए. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राज्यसभा चुनाव ने महागठबंधन के भीतर एक ऐसा सवाल छोड़ दिया है, जिसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है. क्या यह सिर्फ नाराजगी है... या फिर झारखंड की राजनीति में किसी नए "खेला" की शुरुआत हो चुकी है? यही सवाल आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगा.

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