जब गंगा बनी मौत की गवाह, 38 साल पुरानी मनिहारी–साहिबगंज जल त्रासदी की दर्दनाक कहानी
6 अगस्त 1988 की मनिहारी–साहिबगंज जल त्रासदी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है. "जल तरंग" स्टीमर हादसे में सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. 38 साल बाद भी गंगा किनारे बसे लोगों को उस दिन की चीखें और अपनों को खोने का दर्द याद है.

साहिबगंज से अमान की रिपोर्ट -
Sahebganj: 6 अगस्त 1988 की सुबह गंगा की लहरें बिल्कुल सामान्य थीं. नदी अपने शांत अंदाज में बह रही थी, लेकिन कुछ ही देर बाद यही गंगा एक ऐसी दर्दनाक कहानी की गवाह बनने वाली थी, जिसे साहिबगंज और मनिहारी के लोग आज तक नहीं भूल पाए हैं. उस दिन मनिहारी घाट से "जल तरंग" स्टीमर यात्रियों को लेकर साहिबगंज के लिए रवाना हुआ था. इसमें सवार लोगों के मन में रोज की तरह अपने गंतव्य तक पहुंचने की उम्मीद थी. किसी को अंदाजा नहीं था कि यह सफर कई परिवारों के लिए जिंदगी का आखिरी सफर साबित होने वाला है.
कुछ ही समय बाद स्टीमर गंगा की तेज धाराओं में डूब गया. देखते ही देखते चारों तरफ चीख-पुकार मच गई. जो लोग कुछ देर पहले अपने घर पहुंचने की सोच रहे थे, वे अचानक जिंदगी और मौत के बीच जूझने लगे. गंगा किनारे खड़े लोग अपने अपनों को बचाने के लिए नदी में कूद पड़े. हर तरफ सिर्फ रोने की आवाजें थीं और अपनों को तलाशती आंखें. आज 38 साल बाद भी जब 6 अगस्त की तारीख आती है, तो साहिबगंज और मनिहारी के बुजुर्गों की आंखों के सामने वही खौफनाक मंजर ताजा हो जाता है.
"वो दिन आज भी नहीं भूल पाया हूं..."
साहिबगंज के बुजुर्ग जुगल किशोर बताते हैं कि उस दिन गंगा घाट पर ऐसा माहौल था, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. लोग अपने परिवार के लोगों को बचाने के लिए नदी में उतर रहे थे. कई लोग अपनों को पुकार रहे थे, लेकिन जवाब में सिर्फ गंगा की लहरों की आवाज सुनाई दे रही थी. उस दौर में गंगा पार करने के लिए फेरी सेवा ही लोगों का सबसे बड़ा सहारा थी. सड़क संपर्क सीमित था और रोजाना बड़ी संख्या में लोग मनिहारी से साहिबगंज आने-जाने के लिए स्टीमर का इस्तेमाल करते थे. लेकिन उस दिन एक आम सफर इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में शामिल हो गया.
हादसे के बाद कई दिनों तक गंगा घाट पर मातम पसरा रहा. परिवार अपने लापता लोगों की तलाश में दिन-रात भटकते रहे. किसी को उम्मीद थी कि उनका अपना वापस लौट आएगा, तो किसी की आंखें अपनों के शव मिलने का इंतजार कर रही थीं. मोहम्मद इस्माइल बताते हैं कि उस समय संचार के साधन आज जैसे नहीं थे. न मोबाइल था, न इंटरनेट. अगर कोई घायल व्यक्ति कहीं अस्पताल पहुंच भी जाता था, तो उसके परिवार तक खबर पहुंचने में कई दिन लग जाते थे. कई परिवारों ने तो उम्मीद छोड़ दी और अपने लोगों को हमेशा के लिए खोया हुआ मान लिया.
एक ऐसी कहानी, जिसने सबको चौंका दिया
इस हादसे में एक कहानी ऐसी भी थी, जिसने लोगों को हैरान कर दिया था. मजहर टोला निवासी मोहम्मद यासीन भी उसी स्टीमर में सवार थे. हादसे के बाद उनका कोई पता नहीं चला. परिवार ने उन्हें हर जगह तलाशा, लेकिन जब कई दिनों तक कोई खबर नहीं मिली तो उन्हें मृत मान लिया गया. यहां तक कि उनकी मौत से जुड़ी रस्में भी पूरी कर दी गईं. लेकिन करीब 15 दिन बाद अचानक मोहम्मद यासीन अपने घर लौट आए. उनके पोते मोहम्मद हकीम सरदार बताते हैं कि स्टीमर डूबने के बाद यासीन गंगा की तेज धारा में काफी दूर तक बह गए थे. उन्हें थोड़ी तैराकी आती थी, जिसकी वजह से वह खुद को बचाए रखने में कामयाब रहे. बाद में कुछ मछुआरों ने उन्हें नदी से बाहर निकाला और उनका इलाज कराया. जब वह घर पहुंचे तो परिवार और पूरा मोहल्ला उन्हें देखकर हैरान रह गया.
दिल्ली तक पहुंची थी गंगा की यह त्रासदी
मनिहारी–साहिबगंज जल त्रासदी सिर्फ बिहार और झारखंड तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी गूंज संसद तक पहुंची. हादसे के 10 दिन बाद 16 अगस्त 1988 को राज्यसभा में इस मामले को उठाया गया. तत्कालीन सतह परिवहन राज्य मंत्री राजेश पायलट ने घटना पर दुख जताते हुए सरकार की ओर से राहत कार्यों और जांच की जानकारी सदन में रखी. इस हादसे ने देश में जल परिवहन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.
जांच में उठे सुरक्षा पर सवाल
दुर्घटना के बाद मनिहारी थाने में स्टीमर मालिक, चालक और प्रबंधन से जुड़े लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. जांच में ओवरलोडिंग और सुरक्षा नियमों की अनदेखी जैसे मुद्दे सामने आए. इसके बाद फेरी सेवा और जल परिवहन में सुरक्षा मानकों को लेकर कई बदलाव किए गए. यात्रियों की क्षमता, नावों की फिटनेस और लाइफ जैकेट जैसी सुविधाओं पर जोर दिया गया.
गंगा बह रही है, लेकिन दर्द आज भी बाकी है
आज गंगा पहले की तरह बह रही है. घाटों पर फिर से लोगों की आवाजाही होती है. लेकिन 6 अगस्त 1988 की यादें अब भी उन परिवारों के दिलों में जिंदा हैं, जिन्होंने उस दिन अपने अपनों को खो दिया था. साहिबगंज और मनिहारी के बुजुर्ग आज भी उस हादसे को याद कर कहते हैं—वह सिर्फ एक नाव दुर्घटना नहीं थी, बल्कि सैकड़ों परिवारों की जिंदगी बदल देने वाली त्रासदी थी. 38 साल बाद भी गंगा की लहरों में उस दर्द की गूंज सुनाई देती है.

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