आदिवासी सड़कों पर: हेमंत सोरेन ने बंगाल में उठाया झारखंड-छत्तीसगढ़-ओडिशा का मुद्दा, काशीपुर रैली में बीजेपी पर जमकर निशाना
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार सक्रिय रूप से एंट्री की. पुरुलिया जिले की आदिवासी बहुल काशीपुर विधानसभा सीट पर टीएमसी प्रत्याशी सोमेन बेलथोरिया के समर्थन में आयोजित चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी पर तीखा हमला बोला.

Purulia : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार सक्रिय रूप से एंट्री की. पुरुलिया जिले की आदिवासी बहुल काशीपुर विधानसभा सीट पर टीएमसी प्रत्याशी सोमेन बेलथोरिया के समर्थन में आयोजित चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी पर तीखा हमला बोला. हेमंत ने कहा कि झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा हर जगह आदिवासी सड़कों पर उतर आए हैं. डैम, उद्योग और खनन के नाम पर पहाड़-जंगल छीन लिए जा रहे हैं. जल-जंगल-जमीन चले गए तो आदिवासी कहां जाएंगे? उन्होंने पश्चिम बंगाल में भी आदिवासी, दलित, पिछड़े और गरीबों की चिंता जताई और ममता बनर्जी को बीजेपी के खिलाफ अकेली लड़ाई लड़ने वाली नेता बताया.
आदिवासी बहुल क्षेत्र में दिलचस्प मुकाबला
पुरुलिया जिले की काशीपुर सीट आदिवासी बहुल इलाका है. यहां संथाल, भुमिज, ओरांव समेत कई आदिवासी समुदायों की अच्छी-खासी आबादी है. पश्चिम बंगाल में कुल अनुसूचित जनजाति (एसटी) आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 52.97 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का 5.8% है. पुरुलिया, बांकुरा, पश्चिम मेदिनीपुर जैसे पश्चिमी जिलों में आदिवासी आबादी सबसे ज्यादा केंद्रित है. 2021 में यहां बीजेपी के कमलाकांत हंसदा विधायक चुने गए थे, जबकि टीएमसी के सोमेन बेलथोरिया इस बार फिर मैदान में हैं. हेमंत सोरेन की रैली ने इस सीट पर आदिवासी वोट को केंद्र में ला दिया है.
विकास के नाम पर जंगल-जमीन छीनने का आरोप
हेमंत सोरेन ने कहा कि विकास के नाम पर जहां डैम बनाए जा रहे हैं, वहीं उद्योग लगाने के बहाने पहाड़ और जंगल साफ किए जा रहे हैं. झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में आदिवासी सड़कों पर हैं क्योंकि उनकी आजीविका का आधार ही छीना जा रहा है. उन्होंने सवाल किया, “जल-जंगल खत्म हो जाएगा तो आदिवासी आखिर कहां जाएंगे?” सोरेन ने बीजेपी शासित राज्यों में आदिवासियों की स्थिति को बेहद खराब बताया. उन्होंने कहा कि ये लोग आदिवासी की बात तो करते हैं, लेकिन असल में शोषण ही कर रहे हैं.
असम में भी आदिवासी मुद्दे पर हेमंत की सक्रियता
यह पहली बार नहीं है जब हेमंत सोरेन ने पड़ोसी राज्यों में आदिवासी हितों के लिए आवाज उठाई हो. इससे पहले असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए जेएमएम ने चाय बागान क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाई. हेमंत ने बिस्वनाथ, डिब्रुगढ़, टिनसुकिया और कोकराझार में रैलियां कीं. वहां लाखों चाय मजदूर (जो मूल रूप से छोटानागपुर के आदिवासी हैं) महज 250 रुपये दैनिक मजदूरी पर काम करते हैं. हेमंत ने “अबुआ दिशुम, अबुआ राज” का नारा लगाया और चाय जनजातियों को एसटी दर्जा दिलाने का वादा किया. असम में भी उन्होंने आदिवासी शोषण का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया था.
बीजेपी पर व्यापारी-प्रधान शासन और संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग
हेमंत सोरेन ने चाणक्य के एक प्रसिद्ध उद्धरण का हवाला देते हुए कहा, “जिस देश का राजा व्यापारी होता है, उस देश की प्रजा हमेशा भिखारी रहती है.” उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी देने वाली नहीं, सिर्फ लेने वाली पार्टी है. नोटबंदी के जरिए लोगों का पैसा बैंकों में डलवाकर अपने व्यापारी मित्रों को विदेश भेज दिया. साथ ही उन्होंने कहा कि डबल इंजन वाली सरकारों में आदिवासियों की हालत सबसे बुरी है. बीजेपी पर संवैधानिक संस्थाओं (खासकर चुनाव आयोग) को आगे करके चुनाव लड़ने और जीतने का षड्यंत्र रचने का आरोप भी लगाया.
ममता बनर्जी के साथ खड़े होने का संदेश
हेमंत सोरेन ने ममता बनर्जी को बीजेपी के खिलाफ अकेली डटी हुई नेता बताया और कहा, “मैं उनके साथ खड़ा हूं.” उन्होंने केंद्र सरकार के नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर भी सवाल उठाया. कहा कि जैसे ही संसद में बिल पास हुआ, टीएमसी कार्यकर्ताओं के घरों पर छापेमारी शुरू हो गई. उन्होंने मोदी सरकार को किसान विरोधी भी करार दिया. इस रैली से साफ संदेश गया कि झारखंड के मुख्यमंत्री अब बंगाल के आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में भी विपक्षी एकता का प्रतीक बनकर उभर रहे हैं.

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