डेढ़ साल बाद आमने-सामने आए हेमंत और चंपई, गम के बीच पिघली राजनीति की बर्फ
सरायकेला में श्रद्धांजलि सभा के दौरान हेमंत सोरेन और चंपई सोरेन की मुलाकात ने राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है. डेढ़ साल बाद दोनों नेताओं के बीच भावनात्मक जुड़ाव दिखा, जिससे झारखंड की सियासत में नए समीकरणों की संभावनाएं तेज हो गई हैं।.

झारखंड की राजनीति में एक बेहद मार्मिक लेकिन गहरे राजनीतिक संकेतों से भरा दृश्य तब सामने आया, जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन लंबे समय बाद आमने-सामने आए. सरायकेला के जिलिंगगोड़ा में यह मुलाकात चंपई सोरेन के पोते वीर सोरेन के निधन के बाद आयोजित श्रद्धांजलि सभा के दौरान हुई. करीब डेढ़ साल तक दोनों नेताओं के बीच दूरियां रहीं, राजनीतिक बयानबाजी भी हुई, लेकिन इस मुलाकात में भावनाएं साफ दिखीं. कभी शिबू सोरेन परिवार के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले चंपई सोरेन और हेमंत सोरेन का रिश्ता निजी और राजनीतिक दोनों स्तर पर खास रहा है. ऐसे में यह मुलाकात सिर्फ शोक-संवेदना तक सीमित नहीं रही, बल्कि झारखंड की सियासत में नए समीकरणों की आहट भी देती दिखी.
रिश्तों की गर्माहट, सियासत की दूरी
श्रद्धांजलि सभा में जब दोनों नेता आमने-सामने हुए तो माहौल गमगीन था, लेकिन उस गम में भी अपनापन साफ झलक रहा था. एक समय ऐसा था जब चंपई सोरेन को झारखंड मुक्ति मोर्चा में संकटमोचक माना जाता था. हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद पार्टी ने जिस भरोसे के साथ उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, वह उनके रिश्तों की गहराई को दिखाता है. लेकिन बाद में राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और चंपई सोरेन ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. इसके बावजूद जेएमएम के नेताओं ने उनके प्रति सम्मान बनाए रखा. हेमंत सोरेन ने भी कभी सीधे तौर पर उन पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया. यही वजह रही कि इस मुलाकात में पुराने रिश्तों की गर्माहट फिर से दिखाई दी और दोनों नेताओं के बीच जमी बर्फ पिघलती नजर आई.
क्या सियासत में फिर बदलेंगे समीकरण?
इस मुलाकात के बाद झारखंड की राजनीति में अटकलों का दौर तेज हो गया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे चंपई सोरेन के लिए यह मुलाकात एक संभावित “री-एंट्री सिग्नल” हो सकती है. हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई बयान सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से हेमंत और चंपई के बीच भावनात्मक जुड़ाव दिखा, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या यह सिर्फ एक पारिवारिक मुलाकात थी या आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका? फिलहाल इतना जरूर है कि इस मुलाकात ने यह संकेत दे दिया है कि रास्ते भले अलग हो गए हों, लेकिन रिश्ते अब भी पूरी तरह टूटे नहीं हैं—और यही झारखंड की राजनीति में अगले बड़े बदलाव की शुरुआत भी बन सकता है.

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