हरिवंश नारायण सिंह की राज्यसभा में तीसरी पारी: राष्ट्रपति मनोनयन और सियासी समीकरण
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के पूर्व उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को मनोनीत सांसद बनाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. उनका कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हुआ था, लेकिन जेडीयू ने उन्हें तीसरी बार टिकट नहीं दिया. नीतीश कुमार खुद इस सीट पर जा रहे हैं और आज दोपहर 12.30 बजे शपथ लेंगे.

New Delhi: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के पूर्व उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह को मनोनीत सांसद बनाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया. उनका कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हुआ था, लेकिन जेडीयू ने उन्हें तीसरी बार टिकट नहीं दिया. नीतीश कुमार खुद इस सीट पर जा रहे हैं और आज दोपहर 12.30 बजे शपथ लेंगे. हरिवंश को मनोनीत कर राष्ट्रपति ने न केवल उनके अनुभव को सराहा, बल्कि सभी दलों में उनकी स्वीकार्यता को भी मान्यता दी. अब सवाल यह है कि क्या वे दोबारा उपसभापति बनेंगे? 2032 तक चलने वाला यह कार्यकाल संसद की स्थिरता और हरिवंश की 'न्यूट्रल' इमेज का प्रतीक है. पत्रकार से राजनेता बने इस 69 वर्षीय नेता की वापसी बिहार और राष्ट्रीय राजनीति दोनों के लिए अहम है.
जेडीयू की 'नो रिपीट' नीति का अनोखा ट्विस्ट
हरिवंश नारायण सिंह का 9 अप्रैल 2026 को कार्यकाल खत्म होते ही राष्ट्रपति ने 10 अप्रैल को गजट नोटिफिकेशन जारी कर उन्हें मनोनीत कर दिया. यह सीट पूर्व CJI रंजन गोगोई के रिटायरमेंट से खाली हुई थी. जेडीयू ने राज्यसभा चुनाव में हरिवंश का नाम ही नहीं लिया क्योंकि नीतीश कुमार का नियम है- किसी नेता को दो से ज्यादा बार नहीं भेजना. लेकिन राष्ट्रपति कोटे से मनोनयन ने इस नियम को बायपास कर दिया. गृह मंत्रालय के नोटिफिकेशन में साफ है कि यह संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत हुआ. राजनीतिक गलियारों में इसे 'साइलेंट वफादारी' का इनाम माना जा रहा है.
उपसभापति पद पर दोबारा संभावना
संविधान के अनुच्छेद 89 के मुताबिक राज्यसभा अपने सदस्यों में से उपसभापति चुनती है. इसमें मनोनीत या निर्वाचित सदस्य दोनों योग्य हैं. हरिवंश 2018 और 2020 में दो बार यह पद संभाल चुके हैं. मनोनीत सदस्य वोट दे सकते हैं और उम्मीदवार भी बन सकते हैं. सरकार-विपक्ष की सहमति से चुनाव होता है. बीजेपी, जेडीयू और यहां तक कि विपक्षी दलों ने पहले भी उनका समर्थन किया था. अब 2032 तक कार्यकाल मिलने से वे दोबारा उपसभापति बन सकते हैं. संसद सत्र में उनकी तटस्थता और कुशल संचालन की तारीफ हर दल करता है.
नीतीश कुमार की शपथ और हरिवंश-नीतीश रिश्ते की नई कड़ी
आज दोपहर नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद की शपथ लेंगे. कुछ समय पहले हरिवंश को नीतीश का करीबी माना जाता था, लेकिन हाल में दूरी दिखी. फिर भी नीतीश ने हरिवंश को जेडीयू महासचिव बनाया था. 2022 में नीतीश के महागठबंधन में जाने के बावजूद हरिवंश ने संवैधानिक पद नहीं छोड़ा. मनोनयन के बाद दोनों आज शपथ ले सकते हैं. यह घटनाक्रम बिहार की सियासत में स्थिरता का संकेत देता है. नीतीश दिल्ली में रहकर काम करने की बात कर रहे हैं, जबकि हरिवंश संसद में निरंतरता बनाए रखेंगे.
पत्रकारिता से राजनीति तक: हरिवंश की संघर्षपूर्ण यात्रा
30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सिताब दियारा (दलजीत टोला) में जन्मे हरिवंश ने गांव के स्कूल से पढ़ाई शुरू की. जेपी इंटर कॉलेज से हाईस्कूल, वाराणसी से इंटर और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर व पत्रकारिता डिप्लोमा किया. इमरजेंसी में बीएचयू छात्र संघ महामंत्री रहे और जेपी आंदोलन में सक्रिय थे. 1977 में टाइम्स ऑफ इंडिया के 'धर्मयुग' से पत्रकारिता शुरू की. बैंक ऑफ इंडिया में नौकरी की, लेकिन छोड़ दी. 1984-89 तक 'रविवार' में सहायक संपादक रहे. 1989 में 'प्रभात खबर' को चारा घोटाले की जांच से मशहूर बनाया और इसे भारत के टॉप अखबारों में शामिल किया.
एक तटस्थ नेता की मिसाल
हरिवंश जेडीयू से हैं, लेकिन 2018 में उपसभापति पद के लिए बीजेपी ने प्रस्ताव लाया. नीतीश, नवीन पटनायक और जगन मोहन रेड्डी ने समर्थन किया. 2020 में दोबारा चुनाव में भी यही सहमति बनी. 2022 के गठबंधन बदलाव के बावजूद उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया. विपक्ष भी उनकी निष्पक्षता की तारीफ करता है. पीएम मोदी ने 18 मार्च 2026 के विदाई समारोह में कहा था कि हरिवंश की जिम्मेदारियां अभी खत्म नहीं हुईं. मनोनयन इसी 'हिंट' का नतीजा माना जा रहा है.
2032 तक संसद में
मनोनयन के साथ हरिवंश का तीसरा कार्यकाल 2032 तक चलेगा. 12 मनोनीत सदस्यों में कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा में योगदान के आधार पर चुने जाते हैं. हरिवंश पत्रकारिता और राजनीति दोनों में मील का पत्थर हैं. उपसभापति के रूप में सदन का संचालन कुशलता से किया. अब वे संसदीय समितियों और नीति-निर्माण में और सक्रिय रहेंगे. बिहार-झारखंड की क्षेत्रीय पत्रकारिता को मजबूत करने वाले इस नेता की वापसी राष्ट्रीय राजनीति को संतुलन देगी.
हरिवंश नारायण सिंह कौन हैं?
हरिवंश नारायण सिंह बलिया (यूपी) के सिताब दियारा गांव के रहने वाले हैं, लेकिन बिहार-झारखंड की राजनीति और पत्रकारिता से गहरा जुड़ाव रखते हैं. पत्नी आशा सिंह, एक बेटा और एक बेटी. पत्रकारिता में 40 साल से ज्यादा का अनुभव- 'प्रभात खबर' के एडिटर-इन-चीफ रहे. 35 से ज्यादा किताबें लिखीं/संपादित कीं, जिनमें 'चंद्रशेखर: द लास्ट आइकॉन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स' (2019), 'दिल से मैंने दुनिया देखी', 'शब्द संसार', झारखंड सीरीज और हाल में 10-खंड लेखन संग्रह शामिल. सम्मान: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी पत्रकारिता सम्मान (1996), माधव राव सप्रे पुरस्कार (2008) और विश्व हिंदी सम्मेलन सम्मान. राजनीति में 2014 से राज्यसभा सांसद, 2018 से उपसभापति. सभी दलों में स्वीकार्य, तटस्थ और कुशल संसद संचालक के रूप में जाने जाते हैं.

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