‘आपातकाल की झलक’— भैरव सिंह मामले में हाईकोर्ट ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया
झारखंड हाईकोर्ट में हिंदूवादी नेता भैरव सिंह से जुड़े मामले में अहम सुनवाई हुई. यह मामला झारखंड अपराध अधिनियम के तहत भैरव सिंह को निरुद्ध किए जाने से जुड़ा है, जिसे चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी.

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट में हिंदूवादी नेता भैरव सिंह से जुड़े मामले में अहम सुनवाई हुई. यह मामला झारखंड अपराध अधिनियम के तहत भैरव सिंह को निरुद्ध किए जाने से जुड़ा है, जिसे चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी. भैरव सिंह की ओर से सीनियर एडवोकेट अजीत कुमार और एडवोकेट अभय मिश्रा ने अदालत में पक्ष रखा. बचाव पक्ष ने स्पष्ट किया कि भैरव सिंह कोई पेशेवर अपराधी नहीं हैं और उनके खिलाफ पारित निरुद्धि आदेश संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है. वकीलों ने दलील दी कि भैरव सिंह पर दर्ज मामलों का संबंध सनातन धर्म के समर्थन में हुए धरना-प्रदर्शन से है, न कि किसी संगठित आपराधिक गतिविधि से.
अदालत को यह भी बताया गया कि पूर्व में भैरव सिंह पर जिला बदर की कार्रवाई की जा चुकी थी और उसी पुराने आधार पर दोबारा निरुद्धि आदेश पारित नहीं किया जा सकता. साथ ही यह तर्क दिया गया कि भैरव सिंह पर झारखंड अपराध अधिनियम लागू ही नहीं होता. पहले दर्ज मामले का उल्लेख करते हुए वकीलों ने कहा कि यह काली मंदिर और महावीर मंदिर में प्रतिबंधित मांस फेंके जाने के विरोध से जुड़ा था, लेकिन उस घटना के वास्तविक दोषियों को पकड़ने के बजाय तत्कालीन एसएसपी का ट्रांसफर कर दिया गया.
सरकार की ओर से बहस के दौरान कोई ठोस जवाब नहीं दिया गया और केवल जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा गया. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के भैरव सिंह को झारखंड अपराध अधिनियम के तहत निरुद्ध किया गया है. पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि महाबीर मंदिर और काली मंदिर से जुड़े मामलों में पूर्व में स्वयं न्यायालय द्वारा कई आदेश पारित किए गए हैं, इसके बावजूद क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर निरुद्धि आदेश पारित करना चिंताजनक है. न्यायालय ने यहां तक कहा कि ऐसी स्थिति से झारखंड में आपातकाल जैसे हालात का आभास होता है.
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि निरुद्धि आदेश के खिलाफ दिए गए आवेदन और बोर्ड के निर्णय की जानकारी वादी को नहीं दी गई तथा तीन सप्ताह बाद बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया गया. इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले को लेकर आगे की सुनवाई में सरकार को अपने निर्णय का ठोस आधार प्रस्तुत करना होगा.

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