बासी भात से Asia Cup Gold तक! खूंटी के जंगल से चीन पहुंची आदिवासी बेटी रौशनी आईंद की कहानी
खूंटी के सुदूर आदिवासी गांव से निकलकर चीन में भारत का तिरंगा ऊंचा करने वाली रौशनी आईंद की कहानी संघर्ष और सफलता की मिसाल है. बचपन में बासी भात और मड़ुआ की रोटी खाकर बड़ी हुई रौशनी अपने गांव में हॉकी खेलने वाली पहली लड़की बनीं.

खूंटी के सुदूर जंगलों में बसे एक आदिवासी गांव से निकलकर चीन में भारत का तिरंगा ऊंचा करने तक रौशनी आईंद का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. बचपन में बासी भात और मड़ुआ की रोटी खाकर बड़ी हुई रौशनी ने अपने गांव में हॉकी खेलने वाली पहली लड़की बनकर एक ऐसी राह चुनी, जिस पर आगे चलकर गांव की पहचान भी उनके साथ जुड़ गई. हॉकी ने उन्हें सिर्फ मैदान तक नहीं पहुंचाया, बल्कि ऐसी दुनिया दिखाई जिसकी कल्पना शायद उन्होंने कभी नहीं की थी. पहली बार हवाई जहाज में बैठकर चीन पहुंचीं रौशनी ने AHF Women Junior Asia Cup 2026 में भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम का हिस्सा बनकर पाकिस्तान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल में दो गोल दागे. इसके बाद भारत ने फाइनल में चीन को 1-0 से हराकर लगातार तीसरी बार खिताब जीत लिया.
गांव की पहली लड़की जिसने हाथ में थामी हॉकी
रौशनी आईंद के लिए हॉकी की शुरुआत किसी बड़े शहर की सुविधा से नहीं, बल्कि खूंटी के उस गांव से हुई, जहां खेल के लिए संसाधन सीमित थे. गांव की जिंदगी में पली-बढ़ी रौशनी ने जब हॉकी खेलना शुरू किया तो वह अपने गांव की पहली लड़की थीं, जिसने इस खेल को गंभीरता से अपनाया. घर-परिवार और आसपास के माहौल से निकलकर मैदान तक पहुंचना उनके लिए अपने आप में एक बदलाव था. बचपन में बासी भात और मड़ुआ की रोटी खाकर बड़ी हुई रौशनी ने धीरे-धीरे हॉकी को अपनी पहचान बना लिया. जिस गांव में उनकी शुरुआत हुई, वहीं से निकलकर वह भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम तक पहुंचीं. हॉकी उनके लिए सिर्फ खेल नहीं रहा, बल्कि इसी खेल ने उन्हें अपने गांव और खूंटी से बाहर एक नई पहचान दी.
पहली हवाई यात्रा से चीन तक, फिर पाकिस्तान के खिलाफ दो गोल
रौशनी के लिए भारतीय टीम के साथ चीन जाना इसलिए भी खास था क्योंकि यह उनकी पहली हवाई यात्रा थी. गांव से निकलकर हवाई जहाज में बैठना और फिर चीन की धरती पर भारत के लिए हॉकी खेलना उनके सफर का बड़ा पड़ाव बना. AHF Women Junior Asia Cup 2026 में रौशनी ने पाकिस्तान के खिलाफ क्वार्टर फाइनल मुकाबले में शानदार प्रदर्शन किया और दो गोल दागे. इस मुकाबले में भारतीय टीम ने पाकिस्तान को 19-0 से हराया. रौशनी के दो गोल इस बड़ी जीत का हिस्सा रहे. जिस खिलाड़ी ने खूंटी के गांव में हॉकी पकड़कर अपना सफर शुरू किया था, वही अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की जर्सी में गोल कर रही थी. यह उनके व्यक्तिगत सफर के साथ-साथ उस गांव के लिए भी एक ऐसा पल था, जिसने रौशनी को पहली बार अंतरराष्ट्रीय हॉकी के बड़े मंच पर अलग पहचान दी.
चीन को हराकर भारत बना चैंपियन, रौशनी के सफर को मिला गोल्डन मुकाम
पाकिस्तान के खिलाफ शानदार प्रदर्शन के बाद भारतीय जूनियर महिला हॉकी टीम का सफर खिताबी मुकाबले तक पहुंचा. फाइनल में भारत का सामना मेजबान चीन से हुआ. भारतीय टीम ने चीन को 1-0 से हराकर लगातार तीसरी बार AHF Women Junior Asia Cup का खिताब अपने नाम किया. इस ऐतिहासिक जीत के साथ रौशनी आईंद के सफर को भी एक बड़ा मुकाम मिला. खूंटी के सुदूर आदिवासी गांव से निकलकर हॉकी खेलने वाली लड़की अब एशिया कप चैंपियन टीम का हिस्सा थी. बासी भात और मड़ुआ की रोटी से शुरू हुई जिंदगी, गांव के मैदानों से गुजरती हुई भारतीय टीम की जर्सी तक पहुंची और फिर चीन में Asia Cup Gold तक जा पहुंची. रौशनी की कहानी इसी बदलाव की कहानी है—एक ऐसे सफर की, जिसमें हॉकी ने उन्हें सिर्फ खिलाड़ी नहीं बनाया, बल्कि उनके गांव से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान तक पहुंचने का रास्ता भी दिया.

