हाथ में हसिया, कैमरे में ड्रामा: झारखंड बंद के दौरान निशा भगत की सड़क पर नौटंकी
सोमा मुंडा हत्याकांड को लेकर बुलाए गए झारखंड बंद के दौरान रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर आदिवासी नेत्री निशा भगत का हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला. हाथ में हसिया, तीखे बयान और समर्थकों की गाली-गलौज ने आंदोलन की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए.

Ranchi: सोमा मुंडा हत्याकांड को लेकर आज झारखंड में बंद बुलाया गया. विभिन्न आदिवासी संगठनों ने बंद को सफल बनाने के लिए सड़कों पर उतरने का आह्वान किया, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे अलग दिखी. रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर बंद का असर न के बराबर था. दुकानें खुली थीं, गाड़ियों का आवागमन सामान्य रूप से जारी था. इसी बीच आदिवासी नेत्री निशा भगत की एंट्री ने पूरे माहौल को अचानक हाई-वोल्टेज बना दिया. हाथ में हसिया लेकर सड़क के बीच उतरना, राहगीरों पर चिल्लाना और कैमरे के सामने तीखे बयान देना—ये सब दृश्य कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया और न्यूज़ कैमरों पर छा गए. सवाल ये उठने लगे कि क्या ये विरोध था या कैमरे के लिए किया गया प्रदर्शन?
अल्बर्ट एक्का चौक पर बंद बेअसर, फिर भी हाई-वोल्टेज ड्रामा
रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर बंद का असर साफ़ तौर पर नहीं दिखा. रोज़मर्रा की ज़िंदगी सामान्य थी. इसी दौरान निशा भगत ने बीच सड़क उतरकर गाड़ियों को रोकने की कोशिश की और लोगों से तीखी भाषा में सवाल करने लगीं. उनका कहना था कि सोमा मुंडा की हत्या को मज़ाक बना दिया गया है और जनता बेपरवाह बनी हुई है. लेकिन जिस जगह पर बंद का असर नहीं था, वहां इस तरह का उग्र प्रदर्शन कई लोगों के लिए असहज और डर पैदा करने वाला बन गया.
हसिया, बयान और आरोप: विरोध या पब्लिसिटी स्टंट?
निशा भगत ने कांग्रेस और बीजेपी—दोनों सरकारों पर जमकर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन जनता को मूर्ख बना रहा है. धार्मिक तुलना करते हुए दिए गए बयानों ने भी विवाद को और गहरा किया. सवाल ये उठा कि क्या इस तरह की भाषा और हाथ में हथियार लहराना किसी आंदोलन को मज़बूत करता है, या फिर उसे मज़ाक बना देता है. कैमरे के सामने दिया गया हर बयान आंदोलन से ज़्यादा ड्रामेटिक प्रदर्शन जैसा दिखा.
समर्थकों की गाली-गलौज और धमकी, आंदोलन की साख पर सवाल
मौके पर मौजूद निशा भगत के समर्थकों द्वारा राहगीरों को गालियां देने और धमकी देने के दृश्य भी कैमरे में कैद हुए. सोमा मुंडा की हत्या का दर्द और इंसाफ़ की मांग जायज़ है, लेकिन जिस तरह से विरोध को सड़क पर तमाशे में बदला गया, उसने आंदोलन की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए. अब बड़ा सवाल यही है—क्या इस तरह की नौटंकी से न्याय मिलेगा, या फिर असली मुद्दा शोर में दबकर रह जाएगा?

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