Ranchi: झारखंड में PESA नियमावली 2025 को लेकर आदिवासी समाज का विरोध खुलकर सामने आ गया है. आदिवासी समन्वय समिति ने राजभवन में राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा, राज्यपाल से मुलाकात के बाद पंचायती राज विभाग की पूर्व निदेशक. निशा उरांव ने कहा कि पेसा कानून 1996 का मूल उद्देश्य पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभा को सर्वोच्च अधिकार देना था, लेकिन नई नियमावली में उन्हीं अधिकारों को सीमित कर दिया गया है. निशा उरांव ने कहा कि PESA कानून 1996 आदिवासी स्वशासन की बुनियाद है. इस कानून के तहत ग्राम सभा को भूमि, जल, जंगल, खनिज संसाधनों, सामाजिक परंपराओं और विकास से जुड़े फैसलों में निर्णायक अधिकार दिए गए थे. उनका कहना है कि पेसा की आत्मा ग्राम सभा में निहित है, न कि प्रशासनिक ढांचे में.
नई नियमावली में अधिकारों की कटौती
निशा उरांव के मुताबिक PESA नियमावली 2025 में ग्राम सभा की भूमिका को सीमित कर दिया गया है. कई ऐसे अधिकार, जो सीधे ग्राम सभा के अधीन थे, उन्हें अब प्रशासनिक अधिकारियों से जोड़ दिया गया है. उन्होंने इसे पेसा कानून और संविधान की पाँचवीं अनुसूची की भावना के खिलाफ बताया. उन्होंने खास तौर पर अनुसूचित जनजाति की भूमि से अवैध कब्जा हटाने के अधिकार पर सवाल उठाया. निशा उरांव ने कहा कि यह अधिकार PESA कानून के तहत ग्राम सभा को प्राप्त है, लेकिन नई नियमावली में इसे जिला प्रशासन को सौंप दिया गया है. इससे आदिवासी समाज में असुरक्षा और अविश्वास बढ़ रहा है.
संशोधन नहीं हुआ तो बढ़ेगा टकराव
निशा उरांव ने चेतावनी दी कि यदि PESA नियमावली 2025 में संशोधन कर इसे पेसा कानून 1996 और पाँचवीं अनुसूची के अनुरूप नहीं बनाया गया, तो सरकार और ग्राम सभा के बीच टकराव और गहरा हो सकता है. आदिवासी संगठनों ने राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग की है. अब देखना होगा कि राजभवन और राज्य सरकार इस विरोध पर क्या रुख अपनाते हैं.

