झारखंड के 350 से ज्यादा बच्चों की होगी हार्ट सर्जरी, सरकार उठाएगी 15 लाख रुपये तक का खर्च
झारखंड सरकार जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित गरीब बच्चों के इलाज और हार्ट सर्जरी का खर्च उठाएगी. 'गिफ्ट ऑफ लाइफ' अभियान के तहत रिम्स में 380 बच्चों की स्क्रीनिंग की गई है. गंभीर मामलों में 15 लाख रुपये तक का इलाज मुफ्त होगा.

Ranchi:- झारखंड में दिल की गंभीर बीमारी से जूझ रहे गरीब परिवारों के बच्चों के लिए राहत की खबर है. जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के इलाज और ऑपरेशन का पूरा खर्च अब राज्य सरकार उठाएगी. गंभीर मामलों में एक बच्चे के इलाज पर 15 लाख रुपये तक खर्च किए जाएंगे. इसके लिए स्वास्थ्य विभाग ने कोच्चि के अमृता हॉस्पिटल के साथ मिलकर 'गिफ्ट ऑफ लाइफ' अभियान शुरू किया है.रिम्स ऑडिटोरियम में स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने इस अभियान का उद्घाटन किया. कार्यक्रम के दौरान राज्य के अलग-अलग जिलों से पहुंचे करीब 380 बच्चों की स्क्रीनिंग की गई. विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम जांच के बाद उन बच्चों को चिह्नित करेगी, जिन्हें आगे इलाज, कैथेटर आधारित प्रक्रिया या हार्ट सर्जरी की जरूरत है.
15 लाख तक का खर्च उठाएगी सरकार, परिवार पर नहीं पड़ेगा बोझ
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने कहा कि आर्थिक तंगी के कारण किसी बच्चे का इलाज नहीं रुकना चाहिए. उन्होंने बताया कि सामान्य मामलों में 5 से 10 लाख रुपये और गंभीर मामलों में 10 से 15 लाख रुपये तक के इलाज का खर्च सरकार उठाएगी. इसमें जरूरी जांच, ऑपरेशन, दवाइयां, अस्पताल में रहने और भोजन की सुविधा के साथ बच्चों और उनके अभिभावकों की यात्रा का खर्च भी शामिल होगा. ऑपरेशन के बाद फॉलोअप की व्यवस्था भी अभियान का हिस्सा है.मंत्री ने कहा कि उन्होंने गरीबी और लाचारी को करीब से देखा है. कई परिवार अपने बच्चों का इलाज कराने के लिए जमीन-जायदाद तक बेचने को तैयार हो जाते हैं. उनका संकल्प है कि झारखंड में किसी गरीब बच्चे की जान पैसों के अभाव में नहीं जाए.
380 बच्चों की स्क्रीनिंग, अमृता हॉस्पिटल के विशेषज्ञ करेंगे इलाज
इस अभियान में अमृता हॉस्पिटल, कोच्चि के विशेषज्ञ डॉक्टर बच्चों की जांच और उपचार करेंगे. स्क्रीनिंग के बाद बीमारी की गंभीरता के आधार पर बच्चों का चयन किया जाएगा. सभी बच्चों को ऑपरेशन की जरूरत नहीं होगी. कुछ को दवाइयों और नियमित निगरानी की आवश्यकता हो सकती है, जबकि गंभीर मामलों में कैथेटर के जरिए इलाज या ओपन हार्ट सर्जरी की जा सकती है. जन्मजात हृदय रोग में बच्चे के दिल की बनावट जन्म से ही असामान्य हो सकती है. कई मामलों में दिल की दीवार में छेद, वाल्व की गड़बड़ी या रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्या होती है. समय पर पहचान और इलाज नहीं होने पर बीमारी गंभीर रूप ले सकती है.
दूध पीते समय थकना, सांस फूलना भी हो सकता है दिल की बीमारी का संकेत
बच्चों में जन्मजात हृदय रोग के लक्षणों को अक्सर सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. दूध पीते समय जल्दी थक जाना, सांस तेज चलना, पसीना आना, वजन नहीं बढ़ना और बार-बार निमोनिया होना इसके संकेत हो सकते हैं. कुछ बच्चों के होंठ, जीभ और नाखून भी नीले पड़ने लगते हैं. स्वास्थ्य मंत्री ने अभिभावकों से अपील की कि ऐसे लक्षण दिखाई देने पर बच्चों की जांच जरूर कराएं. समय पर बीमारी की पहचान होने से गंभीर खतरे को कम किया जा सकता है.
रिम्स में ही शुरू होगी हार्ट ट्रीटमेंट की स्थायी व्यवस्था
सरकार की योजना सिर्फ बच्चों का इलाज कराने तक सीमित नहीं है. स्वास्थ्य मंत्री ने रिम्स में जन्मजात हृदय रोग के इलाज और ऑपरेशन की स्थायी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया है. इसके लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति, आधुनिक उपकरण, ऑपरेशन थिएटर, आईसीयू और प्रशिक्षित मेडिकल टीम तैयार करने पर काम होगा. स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने बताया कि अगले एक वर्ष में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति और आधुनिक उपकरणों की खरीद की दिशा में काम किया जाएगा. लक्ष्य है कि झारखंड के बच्चों को गंभीर हृदय रोग के इलाज के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर न रहना पड़े. कार्यक्रम में रिम्स निदेशक डॉ. डी.के. सिन्हा, एनएचएम अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा, अमृता हॉस्पिटल के डॉ. ब्रजेश सहित स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और चिकित्सक मौजूद रहे. अब इस अभियान के तहत स्क्रीनिंग में चिह्नित बच्चों के इलाज की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि जांच के बाद चयनित बच्चों को समय पर इलाज और सर्जरी की सुविधा मिल सके.

