Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने चौकीदार पद पर नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि बहाली के लिए उम्मीदवार का उसी निर्धारित “बीट” क्षेत्र का स्थायी निवासी होना अनिवार्य नहीं है. यह निर्णय पूरे राज्य के हजारों अभ्यर्थियों को राहत देने वाला है, जिनके आवेदन महज़ इस तकनीकी आधार पर खारिज कर दिए गए थे कि वे संबंधित बीट के निवासी नहीं हैं.
मामला गिरिडीह जिले के पवन कुमार राय से जुड़ा है, जिन्होंने चौकीदार पद के लिए आवेदन देकर परीक्षा, मेडिकल और फिजिकल टेस्ट तक सफलतापूर्वक पूरा किया था. मेरिट में स्थान पाने के बावजूद जिला प्रशासन ने उनकी उम्मीदवारी यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह संबंधित बीट के निवासी नहीं हैं. राज्य सरकार ने भी इसी आधार पर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया. इसके खिलाफ पवन कुमार राय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
डिवीजन बेंच का हवाला, एकल पीठ ने रद्द किया आदेश
न्यायमूर्ति आनंद सेन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर पहले ही डिवीजन बेंच WP (S) No.1498 of 2025 एवं अन्य मामलों में निर्णय दे चुकी है, जिसमें कहा गया था कि चौकीदार बहाली जिला स्तर की नियुक्ति है और इसके लिए “उसी बीट का निवासी होना अनिवार्य” नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने यह भी माना कि ग्रामीण स्तर की व्याख्या कर नियुक्ति रद्द करना न्यायसंगत नहीं है.
कोर्ट ने 13 सितंबर 2025 के विवादित आदेश को रद्द करते हुए मामला संबंधित अधिकारियों को पुनः विचार के लिए भेज दिया है. अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे हाईकोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुरूप चार सप्ताह के भीतर पवन कुमार राय के मामले पर निर्णय लें. यदि वे अन्य सभी योग्यता और मेरिट मानकों पर खरे उतरते पाए जाते हैं, तो उन्हें नियुक्ति पत्र जारी किया जाए.
अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने तर्क दिया कि चौकीदार नियुक्ति पूरी तरह जिला स्तरीय चयन है, इसलिए “बीट” की संकीर्ण परिभाषा लागू नहीं की जा सकती. उन्होंने अदालत को बताया कि नियमावली में भले 100–120 घरों वाले बीट का उल्लेख हो, लेकिन जिलास्तरीय रिक्ति पर पास के क्षेत्रों के उम्मीदवारों का दावा रोका नहीं जा सकता.
हाईकोर्ट के निर्णय से उन अभ्यर्थियों के लिए नए अवसर खुल गए हैं, जिनके आवेदन केवल इसलिए अटक गए थे क्योंकि वे अपने ही जिले के किसी अन्य बीट से आते थे. यह आदेश राज्य के जिलों में चल रही बहाली प्रक्रिया पर सीधा असर डालेगा और प्रशासन को अब चयन प्रक्रिया में व्यापक दायरा रखना होगा. अदालत का यह फैसला असमान अवसरों की बाधा समाप्त कर, मेरिट आधारित चयन को प्रोत्साहित करने वाला माना जा रहा है.

