ग्राम सभा की अनुमति के बिना न हो 'चंगाई सभा', IRS निशा उरांव ने प्रशासन से की अपील
IRS निशा उरांव ने झारखंड के लोहरदगा जिले में आदिवासी परंपराओं, ग्राम सभा के अधिकारों और धर्मांतरण से जुड़े मुद्दों को लेकर महत्वपूर्ण मांगें उठाई हैं. उपायुक्त को ज्ञापन सौंपने के बाद उन्होंने कहा कि बिना ग्राम सभा की अनुमति के किसी भी गांव में 'चंगाई सभा' आयोजित नहीं की जानी चाहिए.

Ranchi: भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी निशा उरांव ने झारखंड के लोहरदगा जिले में आदिवासी परंपराओं, ग्राम सभा के अधिकारों और धर्मांतरण से जुड़े मुद्दों को लेकर महत्वपूर्ण मांगें उठाई हैं. उपायुक्त को ज्ञापन सौंपने के बाद उन्होंने कहा कि बिना ग्राम सभा की अनुमति के किसी भी गांव में 'चंगाई सभा' आयोजित नहीं की जानी चाहिए. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और पेसा कानून की भावना के अनुसार ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में होने वाली धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों पर निर्णय लेने का अधिकार है. उन्होंने यह भी कहा कि धर्मांतरित आदिवासियों को पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक पदों पर बनाए रखना उचित नहीं है. निशा उरांव ने प्रशासन से आदिवासी समाज की पारंपरिक ग्राम सभा व्यवस्था, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की है.
ग्राम सभा की अनुमति के बिना न हो 'चंगाई सभा'
निशा उरांव ने कहा कि किसी भी गांव में 'चंगाई सभा' आयोजित करने से पहले संबंधित ग्राम सभा की अनुमति लेना अनिवार्य होना चाहिए. उन्होंने दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में भी ग्राम सभा को ऐसे आयोजनों पर निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है. उनके अनुसार ग्राम सभा स्थानीय समुदाय की सर्वोच्च संस्था है और उसकी सहमति के बिना किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि आयोजित नहीं की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ग्राम सभा की मंजूरी के बिना किसी भी चंगाई सभा को अनुमति न मिले. उनका मानना है कि इससे गांवों में सामाजिक सौहार्द बना रहेगा और स्थानीय परंपराओं तथा समुदाय की भावनाओं का सम्मान होगा. उन्होंने जिला प्रशासन से इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग भी की.
सर्वसम्मति से होता है ग्राम सभा का निर्णय
आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने कहा कि ग्राम सभा में निर्णय केवल बहुमत के आधार पर नहीं बल्कि सर्वसम्मति से लिया जाता है. उन्होंने बताया कि यदि ग्राम सभा के कुछ सदस्य भी किसी प्रस्ताव का विरोध करते हैं तो उस विषय पर पुनर्विचार किया जाता है. उनके अनुसार यदि किसी गांव में 5 से 10 लोग भी चंगाई सभा के आयोजन का विरोध करते हैं तो उस आयोजन को मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक शासन व्यवस्था सामूहिक सहमति और सामाजिक संतुलन पर आधारित है. इसलिए ग्राम सभा के निर्णयों का सम्मान करना आवश्यक है. उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि वह ग्राम सभाओं की संवैधानिक और पारंपरिक शक्तियों को कमजोर करने के बजाय उन्हें और मजबूत करने की दिशा में कार्य करे.
'मॉडल ग्राम सभा' व्यवस्था पर जताई आपत्ति
निशा उरांव ने जिले में लागू की जा रही 'मॉडल ग्राम सभा' व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि यह व्यवस्था पेसा कानून की मूल भावना और आदिवासी समाज की पारंपरिक ग्राम सभा प्रणाली के विपरीत है. उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही पारंपरिक संस्थाओं और रूढ़िजन्य कानूनों का सम्मान किया जाना चाहिए. संगठन की ओर से मांग की गई कि केवल ग्राम प्रधान, हातु मुंडा, महतो, पाहन और पाइनभरा जैसे पारंपरिक पदों वाली ग्राम सभाओं को ही मान्यता दी जाए. उन्होंने आरोप लगाया कि नई व्यवस्थाओं के जरिए पारंपरिक संस्थाओं की भूमिका को कमजोर किया जा रहा है. उनके अनुसार इससे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान और स्वशासन की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
धर्मांतरित आदिवासियों के पारंपरिक पदों पर उठाए सवाल
निशा उरांव ने धर्मांतरण के बाद भी पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक पदों पर बने रहने वाले लोगों को लेकर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि ग्राम प्रधान, पाहन, महतो और पड़हा राजा जैसे पद केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखते हैं. ऐसे में जो व्यक्ति पारंपरिक आदिवासी आस्था और धार्मिक परंपराओं का पालन नहीं करते, उन्हें इन पदों पर नहीं रखा जाना चाहिए. उनका तर्क है कि इन पदों का संबंध आदिवासी रीति-रिवाजों, पूजा-पद्धतियों और सामुदायिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है. इसलिए इन पदों पर वही लोग होने चाहिए जो पारंपरिक आदिवासी संस्कृति और आस्था के प्रति प्रतिबद्ध हों. उन्होंने इस विषय पर स्पष्ट नीति बनाने की मांग की है.
भुईहरी और पहनाई भूमि को लेकर भी उठी मांग
आईआरएस अधिकारी ने भुईहरी और पहनाई भूमि के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया. उन्होंने कहा कि ये भूमि पारंपरिक पदों और धार्मिक दायित्वों से जुड़ी होती है. यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है और पारंपरिक धार्मिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता है, तो ऐसी भूमि पर उसका अधिकार समाप्त माना जाना चाहिए. उन्होंने मांग की कि ऐसी भूमि को पुनः ग्राम सभा के नियंत्रण में सौंपा जाए ताकि उसका उपयोग सामुदायिक हित और पारंपरिक उद्देश्यों के लिए हो सके. इसके अलावा उन्होंने गैर-पारंपरिक पड़हा संगठनों को लेकर भी चिंता व्यक्त की. उनका कहना है कि धनबल या अन्य माध्यमों से गठित ऐसे संगठनों को सरकारी अथवा कानूनी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि इससे पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
क्या है 'चंगाई सभा'?
'चंगाई सभा' एक धार्मिक प्रार्थना सभा होती है, जिसका आयोजन मुख्य रूप से ईसाई समुदाय और विभिन्न मसीही संगठनों द्वारा किया जाता है. 'चंगाई' शब्द का अर्थ उपचार या स्वस्थ होना है. इन सभाओं में लोगों के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों को दूर करने के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाती हैं. आमतौर पर पास्टर या धार्मिक नेता लोगों के लिए प्रार्थना करते हैं, बाइबल के वचनों का पाठ करते हैं और विश्वास के माध्यम से रोगों तथा परेशानियों से मुक्ति मिलने की बात कहते हैं. कई लोग इन सभाओं में आध्यात्मिक शांति और चमत्कारी उपचार की उम्मीद लेकर शामिल होते हैं. हालांकि, ऐसे आयोजनों को लेकर विभिन्न क्षेत्रों में सामाजिक और कानूनी बहस भी होती रही है, विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों में जहां पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान को लेकर संवेदनशीलता अधिक है.

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