झारखंड की सियासत का अजीब संयोग: रघुवर दास के बाद स्थिरता, हेमंत सोरेन के दौर में 4 मंत्रियों की मौत
झारखंड की राजनीति ने पिछले 26 वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में जहां सरकारों के लगातार बदलने और राष्ट्रपति शासन ने राजनीतिक अस्थिरता की तस्वीर पेश की, वहीं 2014 में रघुवर दास के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने पहली बार पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया।

Ranchi News: झारखंड की राजनीति ने पिछले 26 वर्षों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। राज्य गठन के शुरुआती वर्षों में जहां सरकारों के लगातार बदलने और राष्ट्रपति शासन ने राजनीतिक अस्थिरता की तस्वीर पेश की, वहीं 2014 में रघुवर दास के नेतृत्व में बीजेपी सरकार ने पहली बार पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया।
लेकिन इसी राजनीतिक स्थिरता के बाद झारखंड की सियासत में एक दूसरा और बेहद दुखद संयोग सामने आया है। हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकारों में 2019 से अब तक चार कैबिनेट मंत्रियों का पद पर रहते निधन हो चुका है।
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद यह आंकड़ा एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि, इन घटनाओं के बीच किसी एक राजनीतिक या स्वास्थ्य संबंधी कारण का दावा करना उचित नहीं होगा। अलग-अलग मंत्रियों की मृत्यु के कारण अलग रहे हैं और यह मुख्य रूप से एक दुखद राजनीतिक एवं सांख्यिकीय संयोग है।
14 साल में नौ सरकारें और तीन बार राष्ट्रपति शासन
झारखंड का गठन 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर हुआ था। खनिज संपदा से समृद्ध इस नए राज्य से राजनीतिक स्थिरता और विकास की बड़ी उम्मीदें थीं। लेकिन शुरुआती 14 वर्षों में तस्वीर इसके उलट रही।
2000 से 2014 के बीच झारखंड में नौ सरकारें बनीं और कोई भी पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। इस दौरान राज्य में तीन बार राष्ट्रपति शासन भी लगा।
बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन और मधु कोड़ा समेत कई नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। सरकारों के बदलने और गठबंधन के समीकरणों के बीच राजनीतिक अस्थिरता लगातार बनी रही।
2009 में पहली बार राष्ट्रपति शासन लगा। इसके बाद फिर शिबू सोरेन की सरकार बनी, लेकिन कुछ ही समय बाद दोबारा राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। 2010 में अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने और जनवरी 2013 में उनकी सरकार के जाने के बाद तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया।
यानी झारखंड गठन के शुरुआती 14 साल राजनीतिक अस्थिरता के दौर के रूप में दर्ज हुए।
रघुवर दास ने बदली राजनीतिक तस्वीर
2014 का विधानसभा चुनाव झारखंड की राजनीति में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
बीजेपी और आजसू गठबंधन को 81 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत मिला और रघुवर दास मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल ने झारखंड की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव किया।
रघुवर दास 28 दिसंबर 2014 से 29 दिसंबर 2019 तक मुख्यमंत्री रहे और पहली बार झारखंड में किसी मुख्यमंत्री ने पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया।
इस लिहाज से 2014 से 2019 का दौर झारखंड की राजनीतिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
जहां 2000 से 2014 के बीच लगातार सरकारें बदलती रहीं, वहीं रघुवर दास सरकार ने लगातार पांच साल पूरे किए।
2019 में फिर सत्ता में आए हेमंत सोरेन
2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता से बाहर हुई और झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद गठबंधन के नेतृत्व में हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।
29 दिसंबर 2019 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, उनका पहला कार्यकाल 31 जनवरी 2024 को उस समय समाप्त हुआ जब गिरफ्तारी के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा।
इसके बाद चंपाई सोरेन मुख्यमंत्री बने। जुलाई 2024 में हेमंत सोरेन दोबारा मुख्यमंत्री पद पर लौटे। नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद उन्होंने फिर सरकार का गठन किया।
हेमंत सोरेन के राजनीतिक दौर में कई बड़े घटनाक्रम हुए। लेकिन इसी अवधि में एक ऐसा आंकड़ा सामने आया जिसने झारखंड की राजनीति में एक अलग तरह की चर्चा को जन्म दिया है।
हेमंत सोरेन सरकार में चार मंत्रियों की मौत
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकारों में पद पर रहते निधन वाले मंत्रियों की संख्या चार हो गई है।
1. हाजी हुसैन अंसारी
सबसे पहला नाम हाजी हुसैन अंसारी का आता है। मधुपुर से विधायक और हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री रहे हाजी हुसैन अंसारी का अक्टूबर 2020 में निधन हुआ।
कोरोना संक्रमण के बाद उनकी तबीयत बिगड़ी थी और इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
उनके निधन के बाद उनके बेटे हफीजुल हसन सक्रिय राजनीति में आए और मधुपुर विधानसभा उपचुनाव में जीत हासिल की।
2. जगरनाथ महतो
इसके बाद अप्रैल 2023 में झारखंड ने अपने लोकप्रिय जमीनी नेता और शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो को खो दिया।
कोरोना संक्रमण के बाद उनके फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा था। लंबे इलाज और फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के बावजूद 6 अप्रैल 2023 को चेन्नई में उनका निधन हो गया।
जगरनाथ महतो डुमरी से विधायक थे और हेमंत सोरेन सरकार में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता मंत्री रहे।
3. रामदास सोरेन
15 अगस्त 2025 को घाटशिला के विधायक और तत्कालीन शिक्षा मंत्री रामदास सोरेन का निधन हुआ।
रामदास सोरेन हेमंत सोरेन सरकार में स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग संभाल रहे थे।
उनके निधन के बाद घाटशिला विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें उनके बेटे सोमेश सोरेन ने जीत दर्ज की।
4. सुदिव्य कुमार सोनू
अब 6 सितंबर 2026 को इस सूची में चौथा नाम सुदिव्य कुमार सोनू का जुड़ गया।
गिरिडीह के विधायक और हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री रहे सुदिव्य सोनू का अचानक निधन कार्डियक अरेस्ट के बाद हुआ।
उनके पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा के साथ नगर विकास एवं आवास, पर्यटन, कला-संस्कृति और खेलकूद से जुड़े महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी थी।
सुदिव्य सोनू का निधन राजनीतिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह हेमंत सोरेन के बेहद भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे और पार्टी के भीतर संकट के समय रणनीतिक भूमिका निभाते थे।
चार में तीन मंत्रियों का शिक्षा विभाग से कनेक्शन
इन चार घटनाओं में एक दिलचस्प पहलू यह है कि चार में से तीन मंत्रियों का शिक्षा विभाग से सीधा संबंध रहा।
हाजी हुसैन अंसारी के पास अल्पसंख्यक कल्याण समेत अन्य विभागों की जिम्मेदारी थी, जबकि जगरनाथ महतो और रामदास सोरेन स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग संभाल चुके थे।
वहीं सुदिव्य कुमार सोनू के पास उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी थी।
इसी वजह से सुदिव्य सोनू के निधन के बाद यह आंकड़ा राजनीतिक और मीडिया चर्चाओं में फिर सामने आया।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन घटनाओं के बीच किसी एक कारण या राजनीतिक वजह का दावा करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। अलग-अलग मंत्रियों की मृत्यु के कारण अलग रहे हैं। इसलिए इसे फिलहाल एक दुखद संयोग के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
JPSC-JSSC विवाद से लेकर राजनीतिक संकट तक
सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक भूमिका केवल मंत्री पद तक सीमित नहीं रही।
झारखंड में छात्र आंदोलन, भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद और JPSC-JSSC जैसे मुद्दों पर सरकार और छात्रों के बीच संवाद की जरूरत पड़ने पर सुदिव्य सोनू की भूमिका सामने आती रही।
वह छात्रों की शिकायतें सुनने और सरकार का पक्ष रखने के लिए कई मौकों पर आगे आए।
इसी तरह पार्टी संगठन और सरकार से जुड़े संवेदनशील राजनीतिक मामलों में भी उनकी सक्रियता की चर्चा होती रही।
झारखंड की राजनीति: अस्थिरता से स्थिरता तक
झारखंड की राजनीतिक कहानी को अगर अलग-अलग चरणों में देखा जाए तो तस्वीर काफी दिलचस्प दिखाई देती है।
2000 से 2014: नौ सरकारें और तीन बार राष्ट्रपति शासन।
2014 से 2019: रघुवर दास के नेतृत्व में पहली पूर्ण पांच साल की सरकार।
2019 के बाद: हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन सरकार, गिरफ्तारी के बाद सत्ता परिवर्तन, चंपाई सोरेन का कार्यकाल और फिर हेमंत सोरेन की वापसी।
यानी झारखंड ने राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी देखा और पूर्ण पांच साल की स्थिर सरकार का दौर भी।
लेकिन इसी दौरान अब एक अलग तरह का आंकड़ा सामने आया है।
हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकारों में चार मंत्री पद पर रहते हुए दुनिया को अलविदा कह चुके हैं।
सवाल कई हैं, जवाब सिर्फ संयोग?
क्या यह सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग है?
या झारखंड की राजनीति के बदलते दौर की यह ऐसी तस्वीर है, जिस पर आने वाले समय में राजनीतिक विश्लेषक और इतिहासकार चर्चा करेंगे?
एक तरफ झारखंड ने सरकारों के गिरने और राष्ट्रपति शासन के दौर से निकलकर पांच साल की स्थिर सरकार देखी। दूसरी तरफ पिछले कुछ वर्षों में सत्ता के शीर्ष स्तर पर राजनीतिक संकटों के साथ अब मंत्रियों की असामयिक मौतों का यह सिलसिला भी चर्चा में है।
सुदिव्य सोनू के निधन के साथ एक बार फिर सवाल खड़ा है—
जिस झारखंड ने कभी स्थिर सरकार के लिए लंबा इंतजार किया था, उसकी मौजूदा सियासत अब एक अलग तरह के असामान्य आंकड़े की गवाह क्यों बन रही है?
इस सवाल का जवाब शायद आने वाले समय में झारखंड के राजनीतिक इतिहास के विश्लेषण का हिस्सा बनेगा।
निष्कर्ष
झारखंड की राजनीति ने पिछले ढाई दशकों में सत्ता परिवर्तन, गठबंधन की राजनीति, राष्ट्रपति शासन और स्थिर सरकार—हर दौर देखा है।
रघुवर दास का पांच साल का कार्यकाल राजनीतिक स्थिरता का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना, वहीं हेमंत सोरेन के दौर में चार मंत्रियों का पद पर रहते निधन एक बेहद दुखद संयोग के रूप में सामने आया है।
सुदिव्य कुमार सोनू का निधन न केवल झामुमो और गिरिडीह के लिए बल्कि झारखंड की राजनीति के लिए भी एक बड़ी क्षति है।
सुदिव्य कुमार सोनू को अंतिम जोहार।


