जामताड़ा: 108 सेवा पर कॉल करते रहे परिजन, मदद नहीं मिली; ट्रैक्टर से अस्पताल ले जाते समय गई मजदूर की जान
झारखंड के जामताड़ा जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जामताड़ा प्रखंड के गोपालपुर पंचायत अंतर्गत शहरबेड़ा गांव में एक 40 वर्षीय आदिवासी दिहाड़ी मजदूर की तबीयत अचानक बिगड़ने

Jamtara: झारखंड के जामताड़ा जिले से स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकारी आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जामताड़ा प्रखंड के गोपालपुर पंचायत अंतर्गत शहरबेड़ा गांव में एक 40 वर्षीय आदिवासी दिहाड़ी मजदूर की तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद परिजन घंटों तक 108 एंबुलेंस सेवा का इंतजार करते रहे, लेकिन उन्हें कोई मदद नहीं मिल सकी. आरोप है कि बार-बार कॉल करने के बावजूद एंबुलेंस सेवा से संपर्क नहीं हो पाया. मजबूर होकर ग्रामीणों ने मरीज को ट्रैक्टर की ट्रॉली पर खटिया में लादकर अस्पताल पहुंचाया, लेकिन इलाज शुरू होने से पहले ही उसकी मौत हो गई. मृतक की पहचान मोनू टुडू के रूप में हुई है. इस घटना ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, सड़क संपर्क और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को एक बार फिर उजागर कर दिया है.
अचानक बिगड़ी तबीयत
जानकारी के अनुसार शहरबेड़ा गांव निवासी मोनू टुडू शुक्रवार रात करीब आठ बजे अपने घर पर थे, तभी उनकी तबीयत अचानक खराब हो गई. परिवार के लोगों ने शुरुआत में घरेलू स्तर पर प्राथमिक सहायता देने का प्रयास किया, लेकिन जब उनकी हालत लगातार बिगड़ने लगी तो उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाने की जरूरत महसूस हुई. ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश लोगों की तरह परिजनों ने भी सबसे पहले सरकारी 108 एंबुलेंस सेवा से मदद लेने का प्रयास किया. परिवार को उम्मीद थी कि कुछ ही समय में एंबुलेंस गांव पहुंच जाएगी और मरीज को अस्पताल पहुंचाया जा सकेगा. लेकिन हालात उम्मीद के बिल्कुल विपरीत निकले.
घंटों तक नहीं मिला 108 एंबुलेंस का जवाब
मृतक के परिजनों का आरोप है कि उन्होंने कई बार 108 एंबुलेंस सेवा पर फोन किया, लेकिन किसी ने कॉल रिसीव नहीं किया. बार-बार प्रयास के बावजूद उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. परिजनों के मुताबिक हर मिनट मरीज की हालत बिगड़ती जा रही थी. ऐसे में परिवार और ग्रामीणों की चिंता बढ़ती गई. ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर एंबुलेंस उपलब्ध हो जाती तो मरीज को जल्दी अस्पताल पहुंचाया जा सकता था. यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और उनकी प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाती है.
सरकारी व्यवस्था से निराश हुए ग्रामीण
जब घंटों इंतजार के बाद भी कोई सहायता नहीं पहुंची तो गांव के लोगों ने खुद ही मरीज को अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी उठाई. गांव में उपलब्ध एक ट्रैक्टर को तैयार किया गया और उसकी ट्रॉली में एक खटिया रखी गई. मोनू टुडू को खटिया पर लिटाकर ट्रैक्टर ट्रॉली के माध्यम से अस्पताल ले जाया गया. यह दृश्य किसी आपदा या कई दशक पुराने दौर की याद दिलाने वाला था, जबकि आज स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक और सुलभ बनाने के दावे किए जाते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि मजबूरी में उन्हें ऐसा कदम उठाना पड़ा क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था. गांव से जामताड़ा सदर अस्पताल तक का सफर आसान नहीं था. रास्ते की खराब स्थिति और वाहन की सीमित गति के कारण मरीज को अस्पताल पहुंचाने में काफी समय लग गया. ट्रैक्टर ट्रॉली चिकित्सा आपात स्थिति के लिए उपयुक्त साधन नहीं माना जाता. ऐसे वाहन में न तो मरीज को आवश्यक चिकित्सा सहायता मिल सकती है और न ही सुरक्षित परिवहन की सुविधा उपलब्ध होती है. इसके बावजूद ग्रामीणों ने पूरी कोशिश की कि किसी तरह मरीज को अस्पताल तक पहुंचाया जा सके. लेकिन यह प्रयास अंततः सफल नहीं हो सका.
अस्पताल पहुंचते-पहुंचते बिगड़ चुकी थी स्थिति
जब मोनू टुडू को जामताड़ा सदर अस्पताल लाया गया तब उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी. अस्पताल में डॉक्टरों ने तत्काल उपचार शुरू करने का प्रयास किया. हालांकि चिकित्सकों की कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. इस खबर के बाद परिवार में कोहराम मच गया. परिजनों का कहना है कि यदि समय पर चिकित्सा सहायता मिल जाती और एंबुलेंस उपलब्ध होती तो संभवतः उनकी जान बचाई जा सकती थी. मोनू टुडू की मौत के बाद उनका परिवार गहरे संकट में आ गया है. वह एक दिहाड़ी मजदूर थे और रोज कमाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे. उनके निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर पड़ा है. वे अपने पीछे तीन छोटी बेटियां और एक लगभग 10 वर्षीय बेटे को छोड़ गए हैं. परिवार के सामने अब बच्चों की शिक्षा, पालन-पोषण और भविष्य की चिंता खड़ी हो गई है. ग्रामीणों का कहना है कि परिवार को सरकारी सहायता और आर्थिक सहयोग की तत्काल आवश्यकता है.


