विस्थापन पर कांग्रेस का नया दांव! बड़कागांव में रैयतों के बीच पहुंचे के. राजू, अपनी ही सरकार पर दबाव बनाएगी कांग्रेस?
ग्रामीणों ने जमीन अधिग्रहण, फर्जी मुकदमे, पुलिस कार्रवाई और पर्यावरणीय नुकसान के आरोप लगाते हुए कांग्रेस से विधानसभा और लोकसभा में इस मुद्दे को मजबूती से उठाने की मांग की. खास बात यह है कि कांग्रेस खुद राज्य की गठबंधन सरकार का हिस्सा है.

Barkagaon: झारखंड में विस्थापन और भूमि अधिग्रहण का मुद्दा एक बार फिर सियासी केंद्र में आ गया है. कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी के. राजू, मंत्री राधाकृष्ण किशोर समेत कई नेताओं ने बड़कागांव पहुंचकर गोंदलपुरा कोल ब्लॉक समेत विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित रैयतों की शिकायतें सुनीं. खास बात यह है कि कांग्रेस राज्य की गठबंधन सरकार का हिस्सा है, लेकिन अब पार्टी के नेता उन्हीं मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगते नजर आ रहे हैं, जिनको लेकर ग्रामीण लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं. के. राजू के सामने ग्रामीणों ने जमीन अधिग्रहण, पुलिस कार्रवाई, फर्जी मुकदमों और पर्यावरणीय नुकसान के आरोपों की लंबी सूची रखी. साथ ही कांग्रेस से विधानसभा और लोकसभा दोनों में इस मुद्दे को मजबूती से उठाने की मांग की.
रैयतों से सीधा संवाद
बड़कागांव दौरे के दौरान कांग्रेस प्रदेश प्रभारी के. राजू ने प्रभावित रैयतों से सीधे संवाद किया. ग्रामीणों ने बताया कि गोंदलपुरा कोल ब्लॉक समेत कई परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण का वे लगातार विरोध कर रहे हैं. उनका कहना था कि कांग्रेस केवल उनकी बात सुनकर न लौटे, बल्कि गठबंधन सरकार के भीतर भी इस मुद्दे को मजबूती से उठाए. राजनीतिक रूप से यह दौरा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि कांग्रेस खुद राज्य सरकार का हिस्सा है. ऐसे में विपक्ष की तरह जनता के बीच जाकर विस्थापन का मुद्दा उठाना पार्टी की नई रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
रैयतों ने सरकार और प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप
बैठक में ग्रामीणों ने दावा किया कि अब तक करीब 40 मामलों में 772 लोगों पर मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं, जबकि पिछले 180 दिनों से लगातार आंदोलन जारी है. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि विरोध करने वालों पर फर्जी एफआईआर दर्ज की जाती है, पुलिस शिकायत नहीं सुनती और ग्राम सभा के दौरान भी दबाव बनाया जाता है. महिलाओं ने आरोप लगाया कि परियोजना का विरोध करने पर स्वयं सहायता समूहों से उनके नाम तक हटाए जा रहे हैं.
2013 कानून, जंगल और एलिफेंट कॉरिडोर का मुद्दा भी उठा
रैयतों ने कहा कि बहुफसली कृषि भूमि के अधिग्रहण को लेकर 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों का पालन नहीं किया जा रहा है. इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि कोयला परियोजनाओं से बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे और हाथियों का प्राकृतिक मार्ग यानी एलिफेंट कॉरिडोर भी प्रभावित होगा. ग्रामीणों का कहना था कि विकास के नाम पर पूरे इलाके की खेती, जंगल और आजीविका खत्म हो जाएगी.
कांग्रेस से विधानसभा और संसद में लड़ाई लड़ने की मांग
ग्रामीणों ने के. राजू से साफ कहा कि केवल ज्ञापन लेने से काम नहीं चलेगा. कांग्रेस को इस मुद्दे को विधानसभा और संसद दोनों में उठाना चाहिए. रैयतों ने गोंदलपुरा समेत कई कोल ब्लॉक परियोजनाओं का आवंटन रद्द करने की मांग दोहराई और कहा कि "जान चली जाएगी, लेकिन जमीन नहीं देंगे." अब देखने वाली बात होगी कि क्या कांग्रेस इस मुद्दे को सिर्फ जनसुनवाई तक सीमित रखती है या गठबंधन सरकार के भीतर भी इस पर दबाव बनाती है. क्योंकि यदि पार्टी अपनी ही सरकार के फैसलों पर सवाल उठाती है, तो आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में विस्थापन का मुद्दा फिर से बड़ा राजनीतिक एजेंडा बन सकता है.

