बारामती विमान हादसा: 25 वर्षीय शांभवी पाठक की आखिरी उड़ान ने भारतीय एविएशन की नई पीढ़ी को झकझोर दिया
बारामती क्रैश में शांभवी पाठक का करियर और उड़ान अधूरी रह गई. उनकी मेहनत और साहस लाखों पायलटों के लिए प्रेरणा है.

महाराष्ट्र के बारामती में हुए चार्टर विमान हादसे ने देश को गहरे सदमे में डाल दिया. इस दुर्घटना में एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता के साथ-साथ भारतीय कॉर्पोरेट एविएशन की उभरती हुई युवा पायलट, 25 वर्षीय शांभवी पाठक भी हमेशा के लिए खो गईं. शांभवी उस नई पीढ़ी का चेहरा थीं, जो पारंपरिक एयरलाइंस के बाहर बिजनेस और चार्टर एविएशन में अपनी पहचान बना रही थीं. Learjet 45 जैसे हाई-परफॉर्मेंस जेट के कॉकपिट में बैठना किसी भी युवा पायलट के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है, और शांभवी इस मुकाम तक बेहद कम उम्र में पहुंच चुकी थीं. उनकी ट्रेनिंग, तकनीकी दक्षता और करियर ग्रोथ इंडस्ट्री में चर्चा का विषय बन रही थी. यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस युवा उड़ान का अंत भी है, जो अभी ऊंचाइयों की ओर बढ़ ही रही थी.
शुरुआती पढ़ाई और एविएशन की ओर झुकाव
शांभवी पाठक की शुरुआती शिक्षा भारत में हुई. बचपन से ही उनका रुझान साइंस और टेक्नोलॉजी की ओर था. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने तय कर लिया था कि उनका करियर किसी ऐसे क्षेत्र में होगा, जहां जिम्मेदारी और प्रिसिजन दोनों की जरूरत हो. मुंबई यूनिवर्सिटी से उन्होंने एयरोनॉटिक्स और एविएशन साइंस में ग्रेजुएशन किया. यह वही दौर था जब उन्होंने पायलट बनने के सपने को ठोस दिशा देना शुरू किया.
विदेश में ट्रेनिंग, अंतरराष्ट्रीय मानकों पर तैयारी
पायलट बनने के लिए शांभवी ने न्यूजीलैंड का रुख किया, जहां उन्होंने इंटरनेशनल कमर्शियल पायलट ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया. यहां उन्होंने उड़ान संचालन, नेविगेशन, इमरजेंसी हैंडलिंग और मौसम से जुड़ी जटिल परिस्थितियों में विमान नियंत्रण की ट्रेनिंग ली. न्यूजीलैंड से उन्हें कमर्शियल पायलट लाइसेंस (CPL) मिला, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य होता है और उच्च गुणवत्ता वाली ट्रेनिंग का संकेत माना जाता है.
भारत वापसी और DGCA से लाइसेंस
विदेश में ट्रेनिंग पूरी करने के बाद शांभवी भारत लौटीं और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) की सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कीं. उन्होंने भारतीय मानकों के अनुसार लाइसेंस वैलिडेशन कराया और प्रोफेशनल फ्लाइंग के लिए खुद को पूरी तरह तैयार किया. खास बात यह थी कि उनके पास फ्लाइट इंस्ट्रक्टर रेटिंग भी थी, यानी वे भविष्य में दूसरे पायलटों को ट्रेनिंग देने के योग्य थीं.
चार्टर एविएशन में करियर की शुरुआत
शांभवी ने अपने करियर की शुरुआत फ्लाइंग क्लब और ट्रेनिंग ऑपरेशंस से की, जहां उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में उड़ान का अनुभव मिला. इसके बाद वह कॉर्पोरेट और चार्टर एविएशन सेक्टर में आईं—एक ऐसा क्षेत्र जहां उड़ानें कम होती हैं, लेकिन जिम्मेदारी और प्रेशर कहीं ज्यादा होता है. अगस्त 2022 से वह VSR एविएशन से जुड़ीं और Learjet 45 जैसे बिजनेस जेट्स की को-पायलट बनीं.
Learjet 45: आसान विमान नहीं
Learjet 45 को उड़ाना किसी भी पायलट के लिए चुनौतीपूर्ण माना जाता है. यह हाई-स्पीड, शॉर्ट-रनवे जेट है, जो अक्सर वीआईपी और कॉर्पोरेट मिशनों में इस्तेमाल होता है. इस तरह के विमान में काम करने के लिए तकनीकी समझ, सिचुएशनल अवेयरनेस और टीम कोऑर्डिनेशन बेहद जरूरी होता है. एविएशन इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के मुताबिक, शांभवी इन सभी पहलुओं में तेजी से परिपक्व हो रही थीं.
इंडस्ट्री में कैसी थी पहचान
सहकर्मियों के अनुसार, शांभवी शांत स्वभाव की थीं, लेकिन कॉकपिट में पूरी तरह फोकस्ड रहती थीं. वह लॉन्ग-टर्म करियर को ध्यान में रखकर ट्रेनिंग ले रही थीं और फ्यूचर कमांड रोल्स के लिए तैयार की जा रही थीं. महिला पायलट के तौर पर कॉर्पोरेट एविएशन में उनका आगे बढ़ना कई युवतियों के लिए प्रेरणा बन सकता था.
आखिरी उड़ान और अधूरा रह गया सपना
बारामती में हुआ हादसा शांभवी पाठक के करियर की सबसे दुखद और आखिरी उड़ान बन गया. एक ऐसी पायलट, जो अभी सीख रही थी, आगे बढ़ रही थी और जिम्मेदारियां संभाल रही थी—उसका सफर अचानक थम गया. यह दुर्घटना सिर्फ एक तकनीकी जांच का मामला नहीं है, बल्कि उस सिस्टम पर भी सवाल खड़े करती है, जिसमें युवा पायलटों की ड्यूटी, ट्रेनिंग और सेफ्टी मॉनिटरिंग शामिल है.
एक उभरती उड़ान, जो इतिहास बन गई
शांभवी पाठक भारतीय कॉर्पोरेट एविएशन की उस पीढ़ी का हिस्सा थीं, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग लेकर देश में नई जगह बना रही थी. उनकी कहानी अधूरी जरूर रह गई, लेकिन यह उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो कॉकपिट में बैठकर आसमान छूने का सपना देखते हैं.

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.



Leave a comment