चाइल्ड पोर्न देखना और डाउनलोड करना अपराध, मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा, पढ़िये...
शीर्ष अदालत ने साफ किया है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़ी सामग्री डाऊनलोड करना और उसे अपने पास रखना अपराध है. अगर कोई व्यक्ति इस तरह की सामग्री को मिटाता नहीं है या पुलिस को इसके बारे में सूचना नहीं देता, तो पॉक्सो एक्ट की धारा 15 इसे अपराध करार देती है.


दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बच्चों से जुड़े पोर्नोग्राफी कंटेंट को देखना, प्रकाशित करना या डाउनलोड करना अपराध है. सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि बाल पॉर्नोग्राफी (चाइल्ड पॉर्न ,अश्लील सामग्री) देखना और डाउनलोड करना पॉक्सो कानून तथा आईटी कानून के तहत अपराध नहीं है. भारत के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि चाइल्ड पॉर्न देखना और डाउनलोड करना बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम के तहत अपराध हैं. कोर्ट ने केंद्र सरकार को सलाह दी है कि वह POCSO एक्ट में बदलाव कर चाइल्ड पोर्नोग्राफी शब्द की जगह child sexually abusive and exploitative material (CSAEM) लिखे.
'पॉक्सो एक्ट की 15 (1) पर्याप्त है
मद्रास हाईकोर्ट ने 11 जनवरी को 28 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी. उसपर अपने मोबाइल फोन पर बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री डाउनलोड करने का आरोप था. हाईकोर्ट ने कहा था कि आजकल बच्चे पॉर्नोग्राफी देखने की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और समाज को ‘इतना परिपक्व’ होना चाहिए कि वह उन्हें सजा देने के बजाय उन्हें शिक्षित करे. मद्रास हाई कोर्ट ने धारा 15 के उपधारा 2 और 3 को आधार बनाते हुए आरोपी को राहत दी थी. धारा 15 की उपधारा 2 में ऐसी सामग्री के प्रसारण और उपधारा 3 में व्यापारिक इस्तेमाल को अपराध कहा गया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि उपधारा 1 अपने आप में पर्याप्त है. पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस) एक्ट की धारा 15 की उपधारा 1 बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री रखने को अपराध करार देती है. इसके लिए 5 हज़ार रुपए के जुर्माने से लेकर 3 साल तक की सज़ा का प्रावधान है.
सरकार को POSCO में संशोधन लाने पर विचार करना चाहिए
मद्रास हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली कई संस्थाओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता संगठनों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच एस फुल्का की दलीलों पर गौर किया कि हाईकोर्ट का फैसला इस संबंध में कानून के विरोधाभासी है. कोर्ट ने कहा कि संसद को 'चाइल्ड पोर्नोग्राफी' शब्द के स्थान पर 'बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री' (सीएसईएएम) शब्द रखने के उद्देश्य से POCSO में संशोधन लाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. ताकि ऐसे अपराधों की वास्तविकता को ज्यादा सटीक रूप से दर्शाया जा सके. कोर्ट ने कहा कि इन धाराओं के तहत पुरुषों को एक्टस रीअस (दोषी कृत्य) से निर्धारित किया जाना चाहिए. यह देखा जाना चाहिए कि आइटम को किस तरह से संग्रहीत किया गया था या हटा दिया गया.

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.



Leave a comment