कभी भीड़ में... कभी कतार में, क्योंकि राजनीति अभी बाकी है!
क्या आपने कभी सुना है कि किसी इंसान ने मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद फिर से पहली क्लास में एडमिशन लिया हो. नहीं न, लेकिन झारखंड की राजनीति में इस तरह की कोशिश 2 राजनेता कर रहे हैं. राजनीति में हर कोई सत्ता के शिखर पर नहीं पहुंच पाता, जो किस्मत के धनी होते हैं वही सामान्य कार्यकर्ता से पार्टी का...


क्या आपने कभी सुना है कि किसी इंसान ने मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद फिर से पहली क्लास में एडमिशन लिया हो. नहीं न, लेकिन झारखंड की राजनीति में इस तरह की कोशिश 2 राजनेता कर रहे हैं. राजनीति में हर कोई सत्ता के शिखर पर नहीं पहुंच पाता, जो किस्मत के धनी होते हैं वही सामान्य कार्यकर्ता से पार्टी का पदाधिकारी, फिर विधायक-सांसद, मंत्री और केंद्रीय मंत्री के पद तक पहुंच पाते हैं, लेकिन यह राह भी संघर्ष से भरा होता है. सत्ता के शिखर यानी केंद्रीय मंत्री के पद तक पहुंचने में कई दशक बीत जाते हैं. किसी जमाने में झारखंड के दो राजनेताओं ने केंद्र की राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी. एक थे यशवंत सिन्हा और दूसरे सुबोधकांत सहाय. 80-90 के दशक में ये दोनों नेता झारखंड के दिग्गज नेता माने जाते थे. राजनीति का मैट्रिक इन्होंने 35 साल पहले ही पास कर लिया था, लेकिन फिर से परीक्षा देना चाह रहे हैं. दोनों दिग्गज आज राजनीति में अपनी पहचान बताने और बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं
1990-91 में चंद्रशेखर की सरकार में यशवंत सिन्हा वित्त मंत्री बनाये गये थे. उधर सुबोधकांत को 1990-91 में केंद्र में गृह मंत्रालय जैसा विभाग मिला. इसके बाद भी दोनों नेताओं को 2000 के दशक में फिर से केंद्रीय मंत्री का पद मिला. मतलब राजनीति में जो मुकाम हासिल करने की हर राजनेता की इच्छा होती है. वह इच्छा इन दोनों नेताओं की भगवान ने दो बार पूरी कर दी, लेकिन राजनीति का चस्का ऐसा लगा है कि ये दोनों नेता आज भी भाग रहे हैं. पद, पहचान और पावर के लिए. यशवंत सिन्हा पार्टियां बदल-बदल कर चर्चा में आने की कोशिश करते रहते हैं, वहीं सुबोधकांत सहाय कांग्रेस के सीनियर नेताओं की भीड़ में कभी-कभार एकदम पीछे दिखाई दे जाते हैं.
यशवंत सिन्हा 88 वर्ष के हो चुके हैं. वहीं सुबोधकांत सहाय 74 साल पूरे कर चुके हैं. यशवंत सिन्हा ने 41 साल और सुबोधकांत सहाय ने करीब 50 साल तक राजनीति-राजनीति खेली है, लेकिन अब भी इनका मन भरा नहीं है. राजनीति का चस्का है ही ऐसा. इनकी उम्र के नेता रिटायरमेंट ले चुके हैं, लेकिन राजनीति में इनका स्ट्रगल अब भी जारी है. हालांकि अधिक उम्र की वजह से यशवंत सिन्हा की राजनीतिक गतिविधियां थोड़ी कम दिखाई पड़ती है, लेकिन सुबोधकांत सहाय कांग्रेस दफ्तर में जयंती, पुण्यतिथि, बड़े नेताओं के आगमन और प्रेस कॉन्फ्रेंस जैसी गतिविधियों नें अक्सर नजर आ जाते हैं. कभी नेताओं के साथ अगली पंक्ति में सबसे किनारे उन्हें जगह मिल पाती है, तो कभी दूसरी या तीसरी पंक्ति में नजर आते हैं. कभी-कभार तो सीट भी नहीं मिलता तो बेचारे खड़े रहकर भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं.
ऐसा नहीं है कि जीवन भर किसी का राजयोग चलता ही रहेगा. राजनीति में भी हर शख्स का एक दौर आता है, लेकिन समय के साथ वह दौर खत्म हो जाता है. कई राजनेता इस बात को समझते हैं. उम्र और राजनीतिक हालत को देखते हुए खुद को राजनीति से दूर कर लेते हैं. बीजेपी-कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने ऐसा किया है. पार्टी और नये नेताओं के बीच अपनी इज्जत बचाये रखने के लिए भी नेताओं को ऐसा फैसला लेना पड़ता है. कुछ नेता ऐसे भी हैं जो आजीवन पार्टी में बने रहे हैं, लेकिन अपनी गरिमा बरकरार रखी. पार्टी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हमेशा अगली पंक्ति में नजर आये.
23 अगस्त की एक तस्वीर सामने आई. कांग्रेस नेता राहुल गांधी बिहार आये थे. झारखंड के मंत्री इरफान अंसारी, दीपिका पांडेय सिंह, शिल्पी नेता तिर्की समेत झारखंड के कई नेता राहुल गांधी के कार्यक्रम में मौजूद थे. भीड़ में दूर कहीं सुबोधकांत सहाय भी नजर आये. सुबोधकांत सहाय पिछली पीढ़ी के सीनियर लीडर हैं. कई लोग राजनीति में उन्हें अपना आईडल मानते हैं. अब जरा सोचिये इतने सीनियर लीडर को झारखंड की नई पीढ़ी के नेताओं के पीछे खड़ा होना शोभा देता है क्या. नये नेताओं को भी क्या अच्छा लगता होगा सुबोधकांत सहाय को इस तरह नेताओं के आगे-पीछे डोलता देख, लेकिन बेचारे कर भी क्या सकते हैं. बस इग्नोर कर सकते हैं और वही कर भी रहे हैं. सुबोधकांत सहाय को कांग्रेस ने रांची से चुनाव लड़ने का कम मौका दिया है क्या. पार्टी की लंबे समय तक सेवा करने के बदले बेटी को भी लोकसभा चुनाव का टिकट दे दिया. अब सुबोधकांत न खुद जीत पाते हैं और न बेटी को जिता पाते हैं तो कांग्रेस आखिर करे क्या.

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