Nepal Flood: हिमालय की ग्लेशियर झीलों से भारत पर भी खतरा, 200 झीलें हाई रिस्क जोन में
नेपाल में ग्लेशियर से आई भीषण बाढ़ ने भारत के हिमालयी क्षेत्र में मौजूद हाई रिस्क ग्लेशियर झीलों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. करीब 195 से 200 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है, जिनसे GLOF की स्थिति में बिहार और पश्चिम बंगाल तक खतरा पहुंच सकता है.

नेपाल में ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में मौजूद खतरनाक ग्लेशियर झीलों को लेकर चिंता बढ़ा दी है. नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर टूटने के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों में अचानक आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है. इस घटना के बाद भारतीय हिमालयी क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 11 नदी घाटियों में हजारों ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं. इनमें करीब 195 से 200 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है. इन झीलों में अचानक पानी का दबाव बढ़ने या झील फटने की स्थिति में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा पैदा हो सकता है. इसका असर सिर्फ पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि कोसी, गंडक और तीस्ता जैसी नदियों के जरिए बिहार और पश्चिम बंगाल के मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है.
नेपाल की त्रासदी ने बढ़ाई चिंता
नेपाल में ग्लेशियर से जुड़ी घटना के बाद भोटेकोशी और त्रिशूली नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा. भारी बारिश और पहाड़ी इलाकों में अस्थायी जलस्रोत बनने से स्थिति और गंभीर हुई. इस आपदा ने यह सवाल खड़ा किया है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी की व्यवस्था कितनी जरूरी है.
भारत में हजारों ग्लेशियर झीलें मौजूद
विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय हिमालयी क्षेत्र की 11 नदी घाटियों में करीब 7,500 ग्लेशियर झीलें स्थित हैं. इनमें गंगा बेसिन में ही 4,700 से अधिक झीलों का उल्लेख किया गया है. इनमें से लगभग 195 से 200 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में चिन्हित किया गया है. अत्यधिक बारिश, भूस्खलन या ग्लेशियर में बदलाव से इन झीलों का पानी अचानक बाहर आने का खतरा रहता है.
इन राज्यों पर मंडरा रहा खतरा
उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलें हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड समेत कई हिमालयी क्षेत्रों में हैं. इनके अलावा ऐसी घटनाओं का असर नीचे स्थित मैदानी इलाकों में भी पड़ सकता है. नेपाल या सिक्किम क्षेत्र में किसी बड़ी ग्लेशियर झील के फटने से कोसी, गंडक और तीस्ता जैसी नदियों में अचानक पानी और मलबे की मात्रा बढ़ सकती है.
निगरानी और अर्ली वार्निंग पर जोर
संभावित खतरे को कम करने के लिए संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की मैपिंग और निगरानी पर जोर दिया जा रहा है. खतरे के दायरे वाले क्षेत्रों की पहचान के साथ निर्माण और बसावट को नियंत्रित करने की योजना पर काम किया जा रहा है. इसके अलावा पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए इंजीनियरिंग उपाय और झीलों पर ऑटोमैटिक अर्ली वार्निंग सेंसर लगाने की योजना भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.
बिहार और बंगाल के मैदानी इलाकों को भी खतरा
ग्लेशियर झील से अचानक पानी निकलने की स्थिति में पहाड़ों के नीचे बसे मैदानी क्षेत्रों पर भी असर पड़ सकता है. उत्तर बिहार के सुपौल, सहरसा, मधुबनी और चंपारण जैसे इलाके कोसी और गंडक नदी तंत्र के कारण संवेदनशील माने जाते हैं. इसी तरह उत्तर बंगाल में तीस्ता नदी से जुड़े इलाकों पर असर पड़ सकता है. ऐसे में हिमालयी ग्लेशियर झीलों की निगरानी सिर्फ पहाड़ी राज्यों के लिए नहीं, बल्कि नीचे बसे बड़े मैदानी इलाकों की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है.



