नेपाल में सैलाब से 469 मौतें, 1,400+ लापता; ऊपर बनी झीलें फूटीं तो दूसरी तबाही का खतरा
नेपाल में सैलाब ने भारी तबाही मचाई है. 469 लोगों की मौत और 1,400 से ज्यादा लोगों के लापता होने के बीच राहत-बचाव अभियान जारी है. टूटी सड़कें और पुल मुश्किल बढ़ा रहे हैं, जबकि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों से एक और बड़े सैलाब का खतरा मंडरा रहा है.

नेपाल में हिमालय से उतरी बाढ़ ने पानी की शक्ल में नहीं, एक चलती हुई तबाही की तरह दस्तक दी. 26 अगस्त की सुबह नेपाल-चीन सीमा से उठी पानी, बर्फ, चट्टान और मलबे की दीवार ने कुछ ही घंटों में गांव, सड़कें, पुल, पावर प्रोजेक्ट और बाजार निगल लिए. 28 अगस्त की सुबह तक नेपाल में 469 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी. तिब्बत में तीन मौतें जोड़ने पर त्रासदी का आंकड़ा 472 पहुंचता है. इससे भी भयावह तस्वीर उन लोगों की है जो अब तक मिल नहीं पाए हैं—विभिन्न एजेंसियां 1,400 से ज्यादा लोगों के लापता होने की बात कह रही हैं. इनमें सैकड़ों विदेशी नागरिक और बड़ी संख्या में भारतीय शामिल हैं. बचाव दल मलबे में जिंदगी तलाश रहे हैं, लेकिन हर घंटे के साथ उम्मीद और कठिन होती जा रही है.
48 घंटे में 469 मौतें, लेकिन असली त्रासदी का आंकड़ा अभी अधूरा
नेपाल पुलिस के मुताबिक शुक्रवार सुबह तक फ्लैश फ्लड में 469 लोगों की मौत हो चुकी थी. शव नेपाल के कम-से-कम आठ जिलों से बरामद किए गए हैं. इससे संकेत मिलता है कि यह किसी एक घाटी या कस्बे की आपदा नहीं, बल्कि नदी तंत्र के बड़े हिस्से पर टूटे विनाश की कहानी है. एपी के अनुसार नेपाल में 977 लोग अब भी लापता थे, जबकि तिब्बत में चीन ने 558 लोगों के लापता होने की सूचना दी. चीन में तीन मौतें अलग से दर्ज हुईं. इस तरह नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में कुल मृतक संख्या कम-से-कम 472 और लापता लोगों की संख्या 1,500 से अधिक बैठती है. आंकड़े लगातार बदल रहे हैं क्योंकि दुर्गम इलाकों तक बचाव दल अभी भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाए हैं. यही इस आपदा की सबसे भयावह परत है—मलबे में मिले शवों की गिनती हो रही है, लेकिन जिनका कोई पता नहीं, उनके परिवार अभी भी खबर का इंतजार कर रहे हैं.
बर्फ, चट्टान और पानी की दीवार ने नदी को बना दिया विनाश का हथियार
बाढ़ की शुरुआत नेपाल-चीन सीमा के ऊंचे हिमालयी क्षेत्र से हुई. प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों में ग्लेशियर या बर्फ-चट्टान के अचानक खिसकने और उससे भारी मात्रा में पानी-मलबा नीचे आने की आशंका जताई गई है. इसी ने ल्हेंदे और भोटेकोशी नदी तंत्र में असाधारण वेग पैदा किया, जो आगे त्रिशूली नदी तक पहुंचा. रॉयटर्स ने इसे ग्लेशियर के ढहने से पैदा हुई विनाशकारी फ्लैश फ्लड बताया है. अमेरिकी भूगर्भीय विशेषज्ञों ने शुरुआती स्तर पर भूकंपीय गतिविधि की आशंका को खारिज करते हुए इसे ग्लेशियर के पतन से जोड़ा. विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि जलवायु परिवर्तन ऊंचे पहाड़ों में बर्फ और चट्टानों की स्थिरता को कमजोर करने वाली परिस्थितियां पैदा कर रहा है—हालांकि इस खास घटना का सीधा कारण जलवायु परिवर्तन घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी. यानी हिमालय में खतरा केवल बादल फटने या बारिश से नहीं है. अब ऊंचाई पर जमा बर्फ और अस्थिर पर्वतीय ढांचे भी नीचे बसे जीवन के लिए अचानक चल पड़ने वाले हथियार बन सकते हैं.
सड़कें गईं, पुल बहे, बिजली ढही—नेपाल का संपर्क तंत्र टूटा
बाढ़ ने सिर्फ घर नहीं बहाए; उसने उन रास्तों को भी काट दिया जिनसे राहत पहुंचनी थी. रासुवा, नुवाकोट और धादिंग जैसे इलाकों में सड़कें और पुल भारी मलबे की चपेट में आए. शुरुआती सरकारी आकलनों में दर्जनों पुलों और सस्पेंशन ब्रिज के बहने की जानकारी सामने आई है. हाइड्रोपावर सेक्टर को भी बड़ा झटका लगा है. नेपाल की बिजली व्यवस्था के कई महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान प्रभावित हुए हैं. ट्रांसमिशन लाइनें टूटी हैं और 13 से 15 तक जलविद्युत परियोजनाओं के प्रभावित होने की प्रारंभिक जानकारी सामने आई है. त्रिशूली-3बी हब का 220 केवी सबस्टेशन पूरी तरह क्षतिग्रस्त होने की रिपोर्ट भी है. रासुवागढ़ी सीमा क्षेत्र में तबाही का मतलब सिर्फ स्थानीय कारोबार का नुकसान नहीं है. यह नेपाल-चीन व्यापार और पर्यटन के महत्वपूर्ण गलियारे पर भी सीधा प्रहार है. जिस रास्ते से काठमांडू और तिब्बत के बीच आवाजाही होती है, वही रास्ता अब मलबे और टूटे बुनियादी ढांचे से जूझ रहा है.
लापता लोगों में सैकड़ों विदेशी, 290 भारतीयों से संपर्क नहीं
इस त्रासदी का अंतरराष्ट्रीय चेहरा भी बेहद गंभीर है. नेपाल के बाढ़ प्रभावित इलाके ट्रेकिंग, पर्यटन और कैलाश-मानसरोवर यात्राओं के प्रमुख रास्तों से जुड़े हैं. इसलिए लापता लोगों में बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की है. एपी के मुताबिक नेपाल और तिब्बत में 30 से ज्यादा देशों के नागरिक इस आपदा से प्रभावित हुए हैं. भारतीय नागरिकों की स्थिति सबसे ज्यादा चिंता पैदा कर रही है. भारतीय पक्ष से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक 290 भारतीयों से संपर्क नहीं हो पा रहा है, जबकि कई भारतीयों को बचाया जा चुका है. इससे पहले नेपाल पर्यटन बोर्ड के आंकड़ों में 133 भारतीय पर्यटकों के संपर्क से बाहर होने की बात सामने आई थी—यानी सूची और आंकड़े लगातार सत्यापित एवं अपडेट किए जा रहे हैं. त्रिशूली क्षेत्र में हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में फंसे मजदूरों का मामला भी बचाव अभियान की जटिलता दिखाता है. नेपाली सेना ने सैकड़ों लोगों को सुरंग से बाहर निकाला है, जबकि कुछ लोगों तक पहुंचने के लिए अभी भी ऑपरेशन चल रहा है.
रेस्क्यू के सामने दूसरा खतरा- ऊपर पहाड़ों में फिर बन रही तबाही
सबसे बड़ी चिंता यह है कि पहली बाढ़ के बाद खतरा खत्म नहीं हुआ. हिमालयी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भूस्खलन से पानी रुकने और अस्थायी झीलें बनने की खबरों ने बचाव अभियान को और मुश्किल कर दिया है. चीन ने तिब्बत में बढ़ते जोखिम के कारण कुछ बचाव गतिविधियां रोकने तक का फैसला किया. इसका अर्थ साफ है—राहत दलों को एक साथ दो लड़ाइयां लड़नी हैं. पहली, मलबे में फंसे लोगों को निकालने की; दूसरी, अगली बाढ़ की आशंका से बचने की. नेपाल ने सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल को बड़े पैमाने पर लगाया है. शुरुआती अभियानों में 3,253 लोगों को हेलीकॉप्टर से निकाले जाने की जानकारी सामने आई. हजारों लोगों को अलग-अलग माध्यमों से सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया है. लेकिन जहां सड़क ही गायब हो गई हो, पुल नदी में समा गए हों और हेलीकॉप्टरों के लिए मौसम चुनौती बना हो, वहां हर बचाव एक दौड़ बन जाता है—समय के खिलाफ.
यह सिर्फ नेपाल की बाढ़ नहीं- हिमालयी जोखिम का बड़ा अलार्म
नेपाल की यह आपदा दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी है. हिमालय की नदियां सीमाओं को नहीं मानतीं. नेपाल में आई तबाही का असर भारत की तरफ बहने वाली नदियों और सीमावर्ती इलाकों में भी चिंता पैदा करता है. बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रशासन ने गंडक, नारायणी और अन्य नदियों के जलस्तर पर निगरानी बढ़ाई है. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल भविष्य का है. हिमालय में ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलें, भूस्खलन और अस्थिर पर्वतीय ढांचे एक-दूसरे से जुड़े जोखिम हैं. अगर शुरुआती चेतावनी व्यवस्था स्थानीय आबादी तक समय पर नहीं पहुंचती, तो कुछ मिनटों की देरी सैकड़ों जिंदगियों की कीमत बन सकती है. नेपाल में इस बार पानी ने सिर्फ बस्तियां नहीं बहाईं. उसने विकास के उन ढांचों की कमजोरी उजागर कर दी जो पहाड़ों की बदलती प्रकृति के सामने अब पर्याप्त सुरक्षित नहीं दिखते. 469 मौतें अभी एक आधिकारिक संख्या हैं; 1,400 से ज्यादा लापता लोग उस संख्या के पीछे छिपे अनगिनत परिवार हैं. और मलबे के नीचे दबे घरों, दुकानों, पुलों और यादों का हिसाब शायद आने वाले महीनों में भी पूरा न हो पाए. हिमालय इस बार सिर्फ टूटा नहीं है—उसने चेतावनी दी है.

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