कमल, श्लोक और यज्ञकुंड… भोजशाला विवाद में ASI रिपोर्ट बनी निर्णायक आधार
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने ASI की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों को अहम आधार माना है. अदालत ने परिसर को हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा स्थल बताते हुए पूर्व में लागू कुछ प्रतिबंधों को हटाने का फैसला सुनाया है.


मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला विवाद में हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों को आधार मानते हुए परिसर को हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा स्थल माना है. कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध प्रमाण इस स्थान को राजा भोज कालीन संस्कृत अध्ययन और देवी वाग्देवी सरस्वती की आराधना से जोड़ते हैं. फैसले के साथ ही पूर्व में लागू कुछ प्रतिबंधों को भी हटाया गया है. लंबे समय से विवादों में रहे भोजशाला परिसर को लेकर यह निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ प्रत्यक्ष निरीक्षण और पुरातात्विक रिपोर्ट को भी महत्व दिया गया.
हाईकोर्ट ने ASI सर्वे रिपोर्ट को माना अहम आधार
भोजशाला मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कराए गए विस्तृत सर्वे को महत्वपूर्ण माना. यह सर्वे लगभग 98 दिनों तक चला था, जिसमें परिसर की संरचना, शिलालेख, प्रतीक और अन्य अवशेषों की जांच की गई थी. अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में सामने आए कई संकेत इस स्थान के ऐतिहासिक और धार्मिक स्वरूप को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. फैसले में उल्लेख किया गया कि उपलब्ध सामग्री से यह संकेत मिलता है कि यह स्थल प्राचीन काल में धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियों का केंद्र रहा हो सकता है.
सर्वे में किन प्रमाणों का जिक्र किया गया
ASI की रिपोर्ट के अनुसार परिसर में कई ऐसे स्थापत्य चिन्ह मिले, जिन्हें पारंपरिक हिंदू मंदिर वास्तुकला से जुड़ा माना गया. इनमें कमल आकृतियां, घंटियों के प्रतीक, अलंकरण, संस्कृत शिलालेख, धार्मिक चिह्न और देवी-देवताओं से संबंधित आकृतियों का उल्लेख किया गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परिसर के कुछ हिस्सों में ऐसे अवशेष मिले, जिन्हें यज्ञकुंड जैसी संरचनाओं से जोड़ा जा रहा है. साथ ही जमीन के भीतर मौजूद कुछ ढांचों को लेकर भी टिप्पणियां दर्ज की गईं. हालांकि इन निष्कर्षों का आधार वैज्ञानिक सर्वे और उपलब्ध अवशेष बताए गए हैं.
पूजा अधिकारों से जुड़ी रोक हटी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष 2003 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पूजा संबंधी अधिकारों को लेकर सीमाएं तय की गई थीं. अदालत ने कहा कि धार्मिक अधिकारों से जुड़े मामलों में समानता और संवैधानिक सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करना भी है. फैसले के बाद पूजा-अर्चना से जुड़े अधिकारों पर चर्चा तेज हो गई है.
विवाद का इतिहास और दोनों पक्षों के दावे
भोजशाला परिसर लंबे समय से विवाद का विषय रहा है. हिंदू पक्ष इसे देवी वाग्देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र मानता रहा है. वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद से जुड़ा धार्मिक स्थल बताता आया है. यह परिसर वर्ष 1904 से संरक्षित स्मारक के रूप में दर्ज है और बाद में पुरातात्विक संरक्षण कानूनों के दायरे में भी शामिल किया गया. इसी कारण यहां धार्मिक अधिकारों और ऐतिहासिक पहचान को लेकर लंबे समय से कानूनी विवाद जारी था.
वैकल्पिक व्यवस्था और अन्य मांगों पर कोर्ट की टिप्पणी
फैसले के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि यदि संबंधित पक्ष चाहें, तो मस्जिद के लिए वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर सरकार के समक्ष मांग रख सकते हैं. इस पर अंतिम निर्णय सरकार के स्तर पर लिया जा सकता है. सुनवाई के दौरान देवी वाग्देवी से जुड़ी प्राचीन प्रतिमा को विदेश से वापस लाने की मांग भी उठी. कोर्ट ने इस पर कहा कि संबंधित पक्ष सरकार के समक्ष औपचारिक प्रस्ताव रख सकते हैं. भोजशाला मामले पर आए इस फैसले के बाद अब आगे प्रशासनिक कदम, संभावित अपील और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर नजर बनी हुई है.

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