करीब दो दशकों की लंबी बातचीत, कई बार ठप पड़ी वार्ताओं और वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भारत और यूरोपीय संघ ने आखिरकार ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को अंतिम रूप दे दिया है. इस समझौते को यूरोपीय नेतृत्व ने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा व्यापार समझौता और “साझा समृद्धि का नया ब्लूप्रिंट” बताया है. 27 देशों वाले यूरोपीय संघ के साथ हुआ यह करार न सिर्फ व्यापार और निवेश को नई गति देगा, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन, मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार और रणनीतिक साझेदारी को भी मजबूती देगा. ऐसे समय में जब दुनिया व्यापारिक गुटों में बंटती दिख रही है, भारत-EU डील को स्थिरता और भरोसे का बड़ा संकेत माना जा रहा है.
भारत-EU FTA क्या है और क्यों है इतना अहम?
भारत-EU फ्री ट्रेड एग्रीमेंट एक ऐसा समझौता है, जिसके तहत दोनों पक्ष एक-दूसरे के बाजारों में व्यापार को आसान बनाएंगे. आयात-निर्यात शुल्क घटाए जाएंगे या समाप्त किए जाएंगे और निवेश के लिए नियमों को सरल किया जाएगा. यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि भारत यूरोप के लिए उभरता हुआ विशाल बाजार है. यह डील दुनिया की लगभग एक-चौथाई GDP और एक-तिहाई वैश्विक व्यापार को प्रभावित करने की क्षमता रखती है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समझौता केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक भरोसे, लोकतांत्रिक मूल्यों और नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था को भी मजबूत करता है.
यह सिर्फ डील नहीं, भविष्य की रूपरेखा- पीएम मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत के आर्थिक इतिहास का मील का पत्थर बताया. उनके अनुसार, यह FTA निवेश को बढ़ावा देगा, नई इनोवेशन पार्टनरशिप को जन्म देगा और वैश्विक सप्लाई चेन को अधिक मजबूत और भरोसेमंद बनाएगा. पीएम मोदी ने साफ कहा कि यह समझौता केवल टैरिफ घटाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि भारत और यूरोप के साझा भविष्य की योजना है. उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत-EU सहयोग इंडो-पैसिफिक, मैरीटाइम सिक्योरिटी, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद से निपटने में भी अहम भूमिका निभाएगा.
यूरोपीय नेतृत्व की प्रतिक्रिया: ‘हमने कर दिखाया’
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि भारत और यूरोप मिलकर दो अरब से अधिक लोगों के लिए एक विशाल मुक्त बाजार बना रहे हैं. उनका कहना है कि यह डील यूरोपीय कंपनियों को भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार तक आसान पहुंच देगी और साथ ही भारतीय निर्यातकों के लिए यूरोप के दरवाजे और खोल देगी. यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने इसे रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय बताया और कहा कि वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत और यूरोप भरोसेमंद भागीदार के रूप में साथ खड़े हैं.
किन सेक्टरों को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?
इस FTA का असर कई प्रमुख उद्योगों पर साफ दिखाई देगा. खासतौर पर इन सेक्टरों को लाभ मिलने की उम्मीद है:
• टेक्सटाइल और गारमेंट
• जेम्स एंड ज्वैलरी
• लेदर और फुटवियर
• फार्मास्यूटिकल्स
• आईटी और सर्विस सेक्टर
• ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स
भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को यूरोपीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी, जबकि यूरोपीय कंपनियां भारत में उत्पादन और निवेश बढ़ा सकती हैं. इससे रोजगार सृजन और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को भी बढ़ावा मिलेगा.
5. भारत में क्या-क्या हो सकता है सस्ता?
FTA के बाद भारत में कई यूरोपीय उत्पादों की कीमतों में कमी आने की संभावना है:
कार और कमर्शियल व्हीकल
मशीनरी और इंडस्ट्रियल इक्विपमेंट
दवाएं और मेडिकल डिवाइस
केमिकल और स्पेशलिटी प्रोडक्ट्स
वाइन, बीयर और अन्य पेय पदार्थ
एयरक्राफ्ट और एयरोस्पेस पार्ट्स
टैरिफ में कटौती या समाप्ति से उपभोक्ताओं और उद्योग दोनों को फायदा मिलेगा.
यूरोपीय संघ को क्या मिलेगा इस डील से?
यूरोपीय संघ के लिए भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है. इस डील से यूरोपीय निर्यातकों को भारतीय बाजार में बड़ी राहत मिलेगी. अनुमान है कि यूरोपीय कंपनियों को हर साल अरबों यूरो की टैरिफ बचत होगी. खासकर छोटे और मध्यम उद्यमों (SMEs) के लिए यह डील नए अवसर खोलेगी. इसके अलावा, बौद्धिक संपदा अधिकार, ट्रेडमार्क और डिजाइन सुरक्षा को लेकर भी मजबूत ढांचा तैयार किया गया है, जिससे यूरोपीय निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा.
भू-राजनीति और ग्लोबल संदर्भ में क्यों अहम है यह समझौता?
यह डील ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक व्यापार तनाव, टैरिफ युद्ध और सप्लाई चेन में अनिश्चितता बनी हुई है. भारत और यूरोप दोनों ही अमेरिका और चीन पर अत्यधिक निर्भरता कम करना चाहते हैं. ऐसे में यह समझौता एक वैकल्पिक, संतुलित और भरोसेमंद व्यापारिक धुरी तैयार करता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह करार भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में मदद करेगा और यूरोप को एशिया में एक स्थिर साझेदार देगा.
चुनौतियां और संभावनाएं
हालांकि यह समझौता ऐतिहासिक है, लेकिन इसका असली असर जमीन पर लागू होने के बाद दिखेगा. चुनौतियां भी कम नहीं हैं—घरेलू उद्योगों की सुरक्षा, नियमों का पालन और राज्यों के साथ समन्वय अहम रहेगा. फिर भी, अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो यह भारत-EU रिश्तों को सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि रणनीतिक, तकनीकी और सामाजिक सहयोग को भी नई ऊंचाई देगा. यह डील संकेत देती है कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में केवल भागीदार नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाला खिलाड़ी बन रहा है.

